देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (17 अगस्त, 2026 से 21 अगस्त, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

अलग रह रहे पिता की सहमति न होने पर नाबालिग को पासपोर्ट देने से मना नहीं किया जा सकता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने पासपोर्ट अथॉरिटी को नाबालिग बच्चे को पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ इसलिए कि एप्लीकेशन में पिता की सहमति नहीं थी, बच्चे के विदेश जाने के संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन नहीं किया जा सकता।

जस्टिस अनूप कुमार ढांड की बेंच ने कहा: "याचिकाकर्ता का भविष्य और करियर उसके माता-पिता में से किसी एक की इच्छा या मर्जी पर निर्भर नहीं छोड़ा जा सकता। पासपोर्ट के लिए एप्लीकेशन पर पिता की सहमति न होने के कारण याचिकाकर्ता के महत्वपूर्ण संवैधानिक अधिकार को नुकसान नहीं पहुंचाया जा सकता और न ही उसे छीना जा सकता है। याचिकाकर्ता को उस एप्लीकेशन पर सहमति पाने के लिए अपने पिता से संपर्क करने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।"

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PC-PNDT नियम डॉक्टर को दो अलग-अलग ज़िलों के क्लीनिक में अल्ट्रासाउंड करने से नहीं रोकते: उड़ीसा हाईकोर्ट

उड़ीसा हाईकोर्ट ने कहा कि क्वालिफाइड रेडियोलॉजिस्ट को दो अलग-अलग ज़िलों में स्थित दो अलग-अलग क्लीनिक/मेडिकल सेंटर्स में अल्ट्रासोनोग्राफी करने से नहीं रोका जा सकता, खासकर तब जब उसकी स्थायी नौकरी में उसके सीनियर अधिकारियों ने उसे आधिकारिक काम के घंटों के बाद प्रैक्टिस करने के लिए 'नो-ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) जारी किया हो। [2026 LiveLaw (Ori) 97]

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ICC ने यौन तत्व न होने के आधार पर शिकायत खारिज की तो महिला औद्योगिक अदालत में कर सकती है अपील: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत पर आंतरिक शिकायत समिति (ICC) यदि बिना जांच किए ही यह कहते हुए शिकायत खारिज कर देती है कि उसमें कोई यौन तत्व नहीं है, तो भी उसका ऐसा निर्णय यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत सिफारिश माना जाएगा। ऐसी सिफारिश के खिलाफ पीड़ित महिला औद्योगिक अदालत में अपील कर सकती है।

जस्टिस संदीप मारणे ने कहा कि यदि जांच किए बिना ICC के फैसले को सिफारिश नहीं माना गया तो संबंधित महिला के पास उसके खिलाफ कोई कानूनी उपाय नहीं बचेगा।

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कानून से स्थापित यूनिवर्सिटी की पैरा-वेटरिनरी डिग्री को राज्य की अलग मान्यता जरूरी नहीं: हिमाचल हाईकोर्ट

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि कानून के तहत स्थापित यूनिवर्सिटी से हासिल पैरा-वेटरिनरी योग्यता को केवल इस आधार पर रजिस्ट्रेशन से वंचित नहीं किया जा सकता कि उस यूनिवर्सिटी को राज्य सरकार से अलग से मान्यता प्राप्त नहीं है या वह हिमाचल प्रदेश पैरा-वेटरिनरी परिषद में रजिस्टर्ड नहीं है।

जस्टिस विवेक सिंह ठाकुर और जस्टिस रंजन शर्मा की खंडपीठ ने हिमाचल प्रदेश पैरा-वेटरिनरी परिषद नियम 2011 के नियम 14 के उस हिस्से को असंवैधानिक और मूल कानून के विपरीत माना जिसमें ऐसी अतिरिक्त शर्तें लगाई गई थीं। कोर्ट ने संबंधित प्रावधान रद्द करते हुए राज्य परिषद को याचिकाकर्ता का रजिस्ट्रेशन करने का निर्देश दिया।

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जमानत में तय रकम नकद जमा करना जरूरी नहीं, स्थानीय जमानतदार की शर्त भी नहीं लगा सकते: गुवाहाटी हाईकोर्ट

गुवाहाटी हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जमानत या जमानतदार बांड में लिखी गई रकम को आरोपी की रिहाई के लिए नकद जमा करने की राशि नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि बांड में किसी रकम का उल्लेख होने मात्र से पुलिस या अदालत आरोपी से उस रकम को नकद जमा करने की मांग नहीं कर सकती।

जस्टिस बुदी हाबुंग ने यह टिप्पणी उस याचिका पर सुनवाई करते हुए की, जिसमें दापोरिजो के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा लगाई गई जमानत की शर्तों में बदलाव की मांग की गई।

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पैकेज/कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पॉलिसी में अनलिमिटेड पैसेंजर लायबिलिटी तब तक कवर नहीं होती, जब तक पॉलिसी में ऐसा प्रावधान न हो: एमपी हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि पैकेज या कॉम्प्रिहेंसिव इंश्योरेंस पॉलिसी अपने आप में अनलिमिटेड लायबिलिटी (असीमित दायित्व) को कवर नहीं करती है, जिसमें वाहन में सवार यात्रियों के लिए अनलिमिटेड रिस्क (असीमित जोखिम) भी शामिल है, जब तक कि पॉलिसी में ऐसा प्रावधान न किया गया हो। [2026 LiveLaw (MP) 334]

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'BCI से एनरोलमेंट के लिए मान्यता प्राप्त UK लॉ डिग्री, भारत में 3-साल के LLB कोर्स में एडमिशन के लिए 'पहली डिग्री' नहीं मानी जा सकती': बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि किसी विदेशी यूनिवर्सिटी से मिली तीन साल की अंडरग्रेजुएट लॉ डिग्री, जिसे विदेशी लॉ डिग्री के रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत Bar Council of India (BCI) ने मान्यता दी है, उसे भारत में तीन साल के LL.B. कोर्स में एडमिशन के लिए ज़रूरी "पहली डिग्री" (First Degree) नहीं माना जा सकता।

कोर्ट ने यह भी कहा कि किसी कानूनी मकसद के लिए विदेशी लॉ डिग्री को मान्यता मिलने का मतलब यह नहीं है कि वह किसी दूसरे अलग कानूनी मकसद के लिए भी योग्यता देती है।

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'लिस पेंडेंस' ज़बरदस्ती या बिना मर्ज़ी के संपत्ति हस्तांतरण पर भी लागू होता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि 'लिस पेंडेंस' का सिद्धांत कोर्ट की नीलामी से हुई बिक्री (जो बिना मर्ज़ी के संपत्ति हस्तांतरण है) पर भी लागू होता है और नीलामी में खरीदने वाला व्यक्ति उस संपत्ति को इस शर्त के साथ खरीदता है कि उस पर पहले से चल रहे मुकदमे का नतीजा क्या होगा।

कोर्ट ने साफ़ किया कि इस सिद्धांत को लागू करने का आधार पहले से किए गए दावे या समझौते की जानकारी (नोटिस) नहीं है; यह सिद्धांत इसलिए लागू होता है, क्योंकि मुकदमा खुद लंबित होता है।

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वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर अनैतिक व्यापार रोकथाम कानून के तहत मुकदमा नहीं चल सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि वेश्यालय में ग्राहक के तौर पर जाने वाले व्यक्ति पर केवल पैसे देकर यौन संतुष्टि प्राप्त करने के आधार पर अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम 1956 की धारा 3, 5 और 7 के तहत मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

अदालत ने स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत संतुष्टि के लिए किसी यौनकर्मी को पैसे देना अधिनियम के तहत वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से किसी व्यक्ति को उपलब्ध कराने या वेश्यावृत्ति के व्यावसायिक शोषण के समान नहीं है।

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FIR दर्ज होने से पुलिसकर्मी की विभागीय जांच नहीं रुकेगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि किसी पुलिस अधिकारी के खिलाफ उसी घटना को लेकर FIR दर्ज होने मात्र से विभागीय जांच पर रोक नहीं लगती। आपराधिक मामला और विभागीय कार्रवाई अलग-अलग उद्देश्यों के लिए हैं और दोनों समानांतर चल सकते हैं।

जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की पीठ ने एक सब-इंस्पेक्टर की याचिका खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया। अधिकारी पर पुलिस हिरासत में मौजूद आरोपी बदन सिंह उर्फ बड्डो के फरार होने के मामले में लापरवाही का आरोप था।

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पत्नी का लगातार झगड़ना, पति के माता-पिता का विरोध और शारीरिक संबंध से इनकार 'क्रूरता': दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा है कि पत्नी का लगातार झगड़ना, पति द्वारा अपने माता-पिता की मदद का विरोध, अलग रहने के बावजूद विवाद जारी रखना और शारीरिक संबंधों से इनकार करना, परिस्थितियों के आधार पर वैवाहिक क्रूरता माना जा सकता है।

जस्टिस सी. हरि शंकर और जस्टिस विनोद कुमार की खंडपीठ ने पत्नी की अपील खारिज करते हुए फैमिली कोर्ट द्वारा पति को दिए गए तलाक को बरकरार रखा। तलाक हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ia) के तहत क्रूरता के आधार पर दिया गया था।

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जीविका का अधिकार अधिसूचित वेंडिंग जोन के बाहर सड़क किनारे कारोबार की अनुमति नहीं देता: राजस्थान हाईकोर्ट

राजस्थान हाईकोर्ट ने सड़क किनारे वाहन मरम्मत की अस्थायी दुकान चलाने वाले व्यक्ति की याचिका खारिज करते हुए कहा कि जीविका कमाने का अधिकार किसी व्यक्ति को ऐसे स्थान पर दुकान या अस्थायी ढांचा लगाने का असीमित अधिकार नहीं देता, जिसे राज्य सरकार ने वेंडिंग जोन के रूप में अधिसूचित नहीं किया।

जस्टिस आनंद शर्मा की पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19(1)(छ) के तहत जीविका कमाने के अधिकार से मनमाने ढंग से वंचित नहीं किया जा सकता लेकिन यह अधिकार निरंकुश और असीमित भी नहीं है। जहां राज्य सरकार ने विधिवत अधिसूचना जारी कर वेंडिंग जोन निर्धारित कर दिए, वहां गैर-अधिसूचित स्थानों पर अस्थायी दुकान या किसी तरह का अतिक्रमण करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

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लिव-इन रिलेशनशिप शादी जैसा ही, अपनी मर्ज़ी से साथ रहने वाले बालिग़ों को पुलिस सुरक्षा का अधिकार: दिल्ली हाईकोर्ट

दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप शादी के समान ही होते हैं, भले ही उन्हें कानूनी तौर पर शादी न माना गया हो। ऐसे रिश्तों में रहने वाले बालिग़ों को पुलिस सुरक्षा पाने का अधिकार है। जस्टिस सौरभ बनर्जी ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में रहने वाले लोगों को भारत के संविधान के आर्टिकल 19 और 21 के तहत आज़ादी, जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार मिलते हैं।

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अनुकंपा नियुक्ति पॉलिसी में लड़के-लड़की के बीच फ़र्क नहीं किया जाता, 'पहला बच्चा' का मतलब- सबसे पहले पैदा हुआ बच्चा: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य की अनुकंपा आधार पर नौकरी देने की पॉलिसी में मृतक कर्मचारी के बेटे और बेटी के बीच कोई भेदभाव नहीं किया जाता है और यह सख्ती से 'पहले बच्चे' पर लागू होती है। [2026 LiveLaw (MP) 325]

जस्टिस मिलिंद रमेश फड़के और जस्टिस पुष्पेंद्र यादव की डिवीज़न बेंच ने मृतक कर्मचारी के इकलौते बेटे की हमदर्दी के आधार पर नौकरी की मांग को खारिज करते हुए कहा: "ऊपर बताई गई क्लॉज़ (धारा) लड़कियों और लड़कों के बीच कोई भेदभाव नहीं करती या कोई अलग वर्ग नहीं बनाती; यह सख्ती से 'पहले बच्चे' का ज़िक्र करती है। ऐसा कोई भी भेदभाव भारत के संविधान के बुनियादी सिद्धांतों का उल्लंघन होगा, जो जेंडर के आधार पर भेदभाव को साफ तौर पर रोकता है।"

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Punjab Civil Service Rules | अनुशासनात्मक अधिकारी जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट होने पर आगे की जांच का आदेश दे सकता है, नई जांच का नहीं: हाईकोर्ट

पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई अनुशासनात्मक अधिकारी जांच रिपोर्ट से असंतुष्ट होता है, तो पंजाब सिविल सेवा (दंड और अपील) नियम, 1970 का नियम 9 उसे मामले को आगे की जांच के लिए भेजने की अनुमति देता है, लेकिन "यह उन्हीं आरोपों पर नई या 'डी नोवो' (शुरुआत से) जांच करने के लिए किसी नए जांच अधिकारी की नियुक्ति को अधिकृत नहीं करता है।" [2026 LiveLaw (PH) 283]।

एक रिटायर जिला कार्यक्रम अधिकारी की रिट याचिका स्वीकार करते हुए जस्टिस संदीप मौदगिल ने माना कि यह मुद्दा अब "रेस इंटेग्रा" (ऐसा मुद्दा जिस पर पहले कोई निर्णय न हुआ हो) नहीं रहा। उन्होंने 'के.आर. देब बनाम कलेक्टर ऑफ सेंट्रल एक्साइज, शिलांग (1971)' मामले का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि एक बार जांच पूरी हो जाने के बाद अनुशासनात्मक अधिकारी केवल इसलिए नई जांच का निर्देश नहीं दे सकता कि वह जांच अधिकारी के निष्कर्षों से असंतुष्ट है।

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अगर आर्थिक निर्भरता साबित हो जाए तो मृतक के ससुराल पक्ष के भाई-बहन 'आश्रित' के तौर पर दुर्घटना का मुआवज़ा दावा कर सकते हैं: सिक्किम हाईकोर्ट

सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मुआवज़े का दावा करने के लिए मृतक के ससुराल पक्ष के भाई-बहनों को 'आश्रित' माना जा सकता है, बशर्ते सबूतों से उनकी आर्थिक निर्भरता साबित हो जाए। कोर्ट ने कहा कि निर्भरता तय करने का कोई तय नियम नहीं है और हर मामले में फ़ैसला तथ्यों और सबूतों के आधार पर किया जाना चाहिए।

चीफ़ जस्टिस ए. मुहम्मद मुस्ताक ने कहा: “इसमें कोई शक नहीं कि दावा करने वाले 'कानूनी प्रतिनिधि' (लीगल रिप्रेजेंटेटिव) की परिभाषा में आते हैं। सवाल यह है कि क्या दावा करने वालों को मृतक भाभी/ननद (sister-in-law) पर निर्भर माना जा सकता है। 'निर्भर' (dependent) शब्द को परिभाषित करने के लिए कोई तय नियम नहीं है।”

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