पीड़ित ट्रांसजेंडर महिला है, तब भी उस पर 'महिला की लज्जा भंग करने' का आरोप लागू हो सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

  • पीड़ित ट्रांसजेंडर महिला है, तब भी उस पर महिला की लज्जा भंग करने का आरोप लागू हो सकता है: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 75 के तहत 'महिला की लज्जा भंग करने' का अपराध तब भी माना जा सकता है, जब पीड़ित ट्रांसजेंडर व्यक्ति हो, जो खुद को महिला मानता हो।

    3 नवंबर को दिए गए आदेश में जस्टिस मेहरोज़ पठान ने भारतीय सेना में 'अग्निवीर' के तौर पर काम करने वाले विशाल इंगले को आरोप मुक्त करने से इनकार किया। उस पर शादी का झांसा देकर एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति के यौन शोषण का आरोप है। पुलिस ने इस मामले में BNS की धारा 75 (महिला की लज्जा भंग करना), धारा 296 (अश्लीलता) और 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' के संबंधित प्रावधानों के तहत मामला दर्ज किया।

    जज ने गौर किया कि शिकायतकर्ता खुद को महिला मानती है और इसके लिए वह अपने शरीर में हार्मोनल बदलाव लाने वाली दवाएं भी ले रही थी। वहीं, आरोपी इंगले ने इस आधार पर धारा 75 लगाए जाने का कड़ा विरोध किया कि पीड़ित एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति है, न कि महिला।

    जज ने कहा,

    "शिकायतकर्ता एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति है, जो खुद को महिला मानती है और अपनी जेंडर पहचान के लिए उसने हार्मोनल ट्रीटमेंट भी लिया... FIR देखने से पता चलता है कि आरोपी पर शिकायतकर्ता की लज्जा भंग करने के सीधे आरोप हैं, जो हार्मोन थेरेपी के बाद खुद को महिला मानती है। इस तरह प्रथम दृष्टया BNS की धारा 75 के तहत अपराध बनता है... मेरी राय में अगर पीड़ित एक ट्रांसजेंडर व्यक्ति है जो खुद को महिला मानता है, तब भी उस पर 'महिला की लज्जा भंग करने' का आरोप लागू हो सकता है।"

    इसके अलावा, जज ने आरोपी की इस दलील को भी खारिज किया कि 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति अधिनियम' की धारा 18(D) (किसी ट्रांसजेंडर व्यक्ति के मानसिक या शारीरिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाना या खतरे में डालना) लागू नहीं होती। आरोपी का तर्क था कि पीड़ित ने इस अधिनियम के तहत जरूरी 'पहचान प्रमाण पत्र' (Identity Certificate) नहीं लिया था, लेकिन कोर्ट ने इसे नहीं माना।

    जज ने बताया कि 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 2019' की धारा 2(k) के अनुसार, कोई व्यक्ति पहचान प्रमाण-पत्र न होने पर भी खुद को ट्रांसजेंडर (जिसमें ट्रांसजेंडर पुरुष या ट्रांसजेंडर महिला शामिल हैं) के रूप में बता सकता है। इसी अधिनियम की धारा 5 में पहचान प्रमाण-पत्र जारी करवाने के लिए जिला मजिस्ट्रेट के पास आवेदन करने की प्रक्रिया दी गई।

    बेंच ने कहा,

    "पीड़ित को ट्रांसजेंडर प्रमाण-पत्र 12 फरवरी 2026 को जारी किया गया, जबकि कथित हमला 28 अक्टूबर 2025 और 30 अक्टूबर 2025 को हुआ था। हालांकि, केवल इसलिए कि घटना के समय शिकायतकर्ता के पास अधिनियम की धारा 6 के तहत पहचान प्रमाण-पत्र नहीं था, इसका मतलब यह नहीं है कि आरोपी पर 'ट्रांसजेंडर अधिनियम, 2019' के दंडात्मक प्रावधान लागू नहीं किए जा सकते। FIR को देखने से पता चलता है कि इस अधिनियम की धारा 18(D) को सही तरीके से लागू किया गया। इसमें लगाए गए आरोप प्रथम दृष्टया उन प्रावधानों के दायरे में आते हैं जो आरोपी के खिलाफ लगाए गए।"

    इन टिप्पणियों के साथ जज ने आरोपी को आरोप मुक्त करने से इनकार किया।

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