वकीलों की हड़ताल 'लिखित बयान' दाखिल करने की 120 दिन की समय-सीमा बढ़ाने का कोई असाधारण आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

  • वकीलों की हड़ताल लिखित बयान दाखिल करने की 120 दिन की समय-सीमा बढ़ाने का कोई असाधारण आधार नहीं: जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट

    जम्मू-कश्मीर एंड लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि वकीलों द्वारा काम बंद कर देने (हड़ताल) को 'लिखित बयान' दाखिल करने की समय-सीमा बढ़ाने का आधार नहीं माना जा सकता। किसी भी स्थिति में इसे ऐसी 'असाधारण कठिन परिस्थिति' नहीं कहा जा सकता, जिसके कारण प्रतिवादी (डिफेंडेंट) के लिए तय समय के भीतर लिखित बयान दाखिल करना असंभव हो जाए।

    हाईकोर्ट गुलशन कौर और एक अन्य व्यक्ति द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उन्होंने उधमपुर के मुंसिफ के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें लिखित बयान दाखिल करने के लिए 120 दिन की कानूनी समय-सीमा (CPC के आदेश VIII नियम 1 के तहत) से अधिक समय मांगने वाली उनकी अर्जी खारिज कर दी गई थी। यह नियम जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश में लागू है।

    जस्टिस संजय धर की एकल पीठ ने याचिका खारिज की। कोर्ट ने दोहराया कि कानूनी समय-सीमा केवल तभी बढ़ाई जा सकती है जब परिस्थितियां बेहद कठिन हों और प्रतिवादी के लिए तय समय के भीतर लिखित बयान दाखिल करना असंभव हो।

    कोर्ट ने कहा,

    "प्रतिवादी/याचिकाकर्ता लिखित बयान दाखिल करने के लिए समय बढ़ाने का कोई ठोस आधार पेश करने में विफल रहे हैं।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    प्रतिवादी डाली रानी ने उधमपुर के मुंसिफ कोर्ट में याचिकाकर्ताओं के खिलाफ 'स्थायी निषेधाज्ञा' (परमानेंट प्रोहिबिटरी इंजंक्शन) के लिए एक मुकदमा दायर किया।

    याचिकाकर्ता संख्या 1 को 29 अगस्त 2019 को समन भेजा गया था। अगले दिन, उनके वकील ने दोनों प्रतिवादियों की ओर से 'वकालतनामा' दाखिल किया। हालांकि, लिखित बयान 20 जनवरी 2020 को दाखिल किया गया, जो CPC के आदेश VIII नियम 1 के तहत तय 120 दिन की समय-सीमा के बाद था। इसके बाद प्रतिवादियों ने समय बढ़ाने के लिए एक आवेदन दिया। उन्होंने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता संख्या 1 लगभग 70 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला हैं, जिनकी नवंबर 2019 में मोतियाबिंद की सर्जरी हुई। उन्होंने यह भी बताया कि उनके एक करीबी रिश्तेदार का निधन हो गया, जिसके कारण उन्हें दिल्ली जाना पड़ा और वे वहां लगभग 15 दिनों तक रहीं।

    प्रतिवादियों ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता संख्या 1 बिस्तर पर थीं (चलने-फिरने में असमर्थ थीं) और वकील भी लगभग डेढ़ महीने तक काम से दूर रहे, जिस वजह से तय समय के भीतर लिखित बयान (रिटन स्टेटमेंट) दाखिल नहीं किया जा सका।

    आवेदन के समर्थन में ट्रायल कोर्ट के समक्ष मेडिकल रिकॉर्ड पेश किए गए। हालांकि, उधमपुर के मुंसिफ ने इस अनुरोध को खारिज किया। उन्होंने कहा कि बताई गई परिस्थितियां ऐसी असाधारण वजहें नहीं हैं, जिनके आधार पर समय बढ़ाया जा सके।

    इससे असंतुष्ट होकर प्रतिवादी हाईकोर्ट पहुंचे। उन्होंने तर्क दिया कि CPC के आदेश VIII नियम 1 (Order VIII Rule 1) के प्रावधान केवल दिशा-निर्देश (डायरेक्टरी) के रूप में हैं, और देरी के लिए पर्याप्त व उचित कारण बताए गए।

    Case Title : Gulshan Kour and Another v. Dali Rani

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