नोएडा संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य', लेकिन CPC की धारा 80 के तहत सरकार नहीं, मुकदमे से पहले नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

  • नोएडा संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य, लेकिन CPC की धारा 80 के तहत सरकार नहीं, मुकदमे से पहले नोटिस देना जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि नोएडा (NOIDA) भले ही भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत 'राज्य' की परिभाषा में आता हो, लेकिन वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार। इसलिए नोएडा के खिलाफ मुकदमा दायर करने से पहले सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) की धारा 80(1) के तहत दो महीने का पूर्व नोटिस देना अनिवार्य नहीं है।

    जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने कहा,

    “यह स्पष्ट है कि नोएडा भारतीय संविधान के अनुच्छेद 12 के अर्थ में राज्य के अंतर्गत आता है, लेकिन वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार। इसलिए नोएडा के लिए धारा 80(1) की अनिवार्य शर्त लागू नहीं की जा सकती। वादी याचिकाकर्ताओं ने मुकदमा संख्या 306/2006 सही तरीके से दायर किया था। निचली अदालत मुनसरीम की पूरक रिपोर्ट स्वीकार कर दीवानी मुकदमा दर्ज करने से इनकार करने में सही नहीं है।”

    वादी याचिकाकर्ताओं ने तीन निजी प्रतिवादियों के खिलाफ घोषणा और स्थायी निषेधाज्ञा की मांग करते हुए मुकदमा दायर किया था। इसमें नोएडा को प्रतिवादी संख्या 4 बनाया गया। मुनसरीम की पूरक रिपोर्ट में नोएडा को राज्य बताया गया, जिसके बाद गौतम बुद्ध नगर के सिविल जज (सीनियर डिवीजन) ने आपत्तियां आमंत्रित कीं।

    निचली अदालत ने याचिकाकर्ताओं की इस दलील को खारिज किया कि नोएडा राज्य का एक अंग होने के बावजूद धारा 80(1) के दायरे में नहीं आता। इसके बाद अदालत ने मुकदमे पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया।

    याचिकाकर्ताओं के वकील ने दलील दी कि नोएडा का गठन उत्तर प्रदेश औद्योगिक क्षेत्र विकास अधिनियम, 1976 के तहत किया गया। वह न तो राज्य सरकार है और न ही केंद्र सरकार, इसलिए उस पर सीपीसी की धारा 80 लागू नहीं होती।

    नोएडा की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि वह राज्य का अंग है और संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत आता है। इसलिए मुकदमा दायर करने से पहले नोटिस देना अनिवार्य है।

    हाईकोर्ट ने कहा कि नोएडा का गठन वर्ष 1976 में गौतम बुद्ध नगर के सुनियोजित विकास के लिए विधायिका द्वारा किया गया। उस पर राज्य सरकार का केवल पर्यवेक्षण संबंधी नियंत्रण है और वह 'सरकार' की परिभाषा में नहीं आता।

    अदालत ने U.P.S.E.B. एवं अन्य बनाम संत कबीर सहकारी कताई मिल्स लिमिटेड मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी उल्लेख किया। उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत बोर्ड भले ही संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत राज्य हो, लेकिन वह राज्य सरकार नहीं है।

    हाईकोर्ट ने अपने समकक्ष पीठ और बॉम्बे हाईकोर्ट के उन फैसलों का भी हवाला दिया, जिनमें वैधानिक निगमों के संबंध में इसी तरह का दृष्टिकोण अपनाया गया। इसके अलावा, सिटी म्युनिसिपल काउंसिल, भालकी बनाम गुरप्पा (मृतक), विधिक उत्तराधिकारियों के माध्यम से मामले में दिए गए फैसले का उल्लेख किया, जिसमें नगर निगम के अधिकारी को सीपीसी की धारा 80 के दायरे से बाहर माना गया।

    हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने आपत्तियों को खारिज कर मुकदमा दर्ज करने से इनकार कर अवैध रूप से कार्य किया। अदालत ने 18 अगस्त 2026 का आदेश रद्द करते हुए रिट याचिका स्वीकार की।

    निचली अदालत को निर्देश दिया गया कि वह तुरंत मुकदमा दर्ज करे और प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर अस्थायी निषेधाज्ञा के आवेदन पर निर्णय ले।

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