POCSO | पीड़िता के योनि के मुहाने पर वाइब्रेटिंग मशीन रखना 'अंदरूनी यौन हमला' और बलात्कार के बराबर: केरल हाईकोर्ट

Update: 2026-07-31 04:53 GMT

केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में स्पष्ट किया कि पीड़िता की योनि के मुहाने पर वाइब्रेटिंग मशीन रखना POCSO Act के तहत सज़ा-योग्य 'पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट' (अंदरूनी यौन हमला) और भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत सज़ा-योग्य रेप के बराबर है। [2026 LiveLaw (Ker) 416]

जस्टिस ए. बदरुद्दीन ने POCSO Act [बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम] की धारा 3 का हवाला दिया, जो पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट को परिभाषित करती है, और IPC की धारा 375 का भी ज़िक्र किया।

उन्होंने कहा:

“यहां M.O2 वाइब्रेटर, जो M.O1 (लिंग जैसी संरचना) से जुड़ा है, उसे पीड़िता की योनि पर वाइब्रेटिंग मोड में रखा गया... योनि के मुहाने यानी लेबिया मेजोरा या वल्वा पर वाइब्रेटिंग मशीन रखना ही यह मानने के लिए काफ़ी है कि M.O1 को योनि में डाला गया। यह इस बात को साबित करने के लिए भी काफ़ी है कि व्यक्ति ने POCSO Act की धारा 3(b) के तहत परिभाषित और धारा 4 के तहत सज़ा-योग्य पेनिट्रेटिव सेक्सुअल असॉल्ट किया है। IPC की धारा 375(b) के तहत परिभाषित रेप के अपराध के मामले में भी स्थिति ऐसी ही है।”

कोर्ट एक दोषी की अपील पर विचार कर रहा था, जिसे 17 साल की लड़की के साथ रेप का दोषी पाया गया। ट्रायल कोर्ट ने पाया था कि उसने IPC की धाराओं 376(1), 375(b), 354B और 506(i) के साथ-साथ POCSO Act की धारा 4(1) और 3(b) के तहत अपराध किए। सज़ा और दोषसिद्धि को चुनौती देते हुए वह हाई कोर्ट पहुंचा था।

अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अपीलकर्ता ने दूसरे आरोपी के मैनेजर के तौर पर अपनी स्थिति का गलत इस्तेमाल किया। दूसरा आरोपी कॉस्मेटोलॉजी सेंटर चला रहा था। अपीलकर्ता ने पीड़िता को ज़बरदस्ती ट्रीटमेंट बेड पर लिटाया, उसके अंडरवियर उतारे और उसकी योनि पर लिंग जैसा एक उपकरण रखा, जो वाइब्रेटिंग मोड में था। उसने पीड़िता को धमकी भी दी ताकि वह किसी को इस बारे में न बताए।

हालाँकि, उसने दूसरे आरोपी को यह बात बताई, लेकिन उसने कहा कि यह मज़ाक था। दूसरे आरोपी को इसलिए आरोपी बनाया गया, क्योंकि उसने घटना की जानकारी नहीं दी थी, जबकि कानून के अनुसार ऐसा करना ज़रूरी था। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने उसे बरी कर दिया।

अपीलकर्ता ने कई तर्क दिए, जैसे FIR दर्ज करने में 2 साल की देरी, मेडिकल या वैज्ञानिक सबूतों की कमी, और यह बात कि घटना के कुछ समय बाद ही पीड़िता बालिग हो जाती, वगैरह। यह भी बताया गया कि पीड़िता ने पुलिस को यह नहीं बताया था कि वाइब्रेटर को कुछ देर तक दबाकर रखा गया।

हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता का यह तर्क कि पीड़िता जल्द ही बालिग हो जाती, कोई मायने नहीं रखता, क्योंकि वह 18 साल से कम उम्र की होने के कारण 'बच्चे' की परिभाषा में आती थी, और यह बात उसकी SSLC बुक और जन्म प्रमाण पत्र से साबित हो गई।

देरी के तर्क खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि पीड़िता ने इसकी वजह बताई; उसे धमकियां मिल रही थीं, इसलिए वह दूसरे मामले में दूसरे आरोपी की गिरफ्तारी के बाद ही इस बारे में बता पाई।

कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने पीड़िता की 'वोयर डायर' (योग्यता) जाँच की थी और पाया था कि वह गवाही देने में सक्षम है। कोर्ट ने यह भी पाया कि छोटी-मोटी विरोधाभासी बातों के बावजूद पीड़िता का बयान अडिग रहा और उसने यह भी बताया कि उसने वाइब्रेटर को कुछ देर तक दबाकर रखने या बेचैनी महसूस होने के बारे में क्यों नहीं बताया।

मामले के सभी सबूतों पर दोबारा विचार करने के बाद कोर्ट की राय थी कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने की ज़रूरत नहीं है। चूंकि अपीलकर्ता को कानून के तहत तय न्यूनतम सज़ा दी गई, इसलिए कोर्ट ने कहा कि कानून के तहत सज़ा कम करने की इजाज़त नहीं है।

इस तरह कोर्ट ने अपील खारिज की।

Case Title: Joshy K.J. v. State of Kerala

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