केरल हाईकोर्ट ने कहा कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (SC/ST) का सदस्य अपनी जातीय पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाया केवल इस आधार पर उसे संविधान के तहत मिलने वाले लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता। इसके लिए राज्य को उसके दावे के विपरीत ठोस और स्वतंत्र साक्ष्य पेश करना होगा।

डॉ. जस्टिस ए.के. जयशंकरन नांबियार और जस्टिस प्रीता ए.के. की डिवीजन बेंच ने कहा कि केरल अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति सामुदायिक प्रमाणपत्र जारी करने के विनियमन अधिनियम 1996 के तहत जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को SC-ST सदस्यों से वही प्रमाण का बोझ पूरा करने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए, जो सामान्य परिस्थितियों में किसी नागरिक से उसकी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए की जाती है।

अदालत रिटायर्ड पोस्टल असिस्टेंट की अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल बेंच ने उस कार्रवाई को बरकरार रखा, जिसमें उन्हें मलई पंडारम अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं माना गया। अपीलकर्ता को 1980 में पोस्टमैन के पद पर और 1989 में पोस्टल असिस्टेंट के पद पर अनुसूचित जनजाति आरक्षण के तहत नियुक्ति और पदोन्नति मिली थी। यह लाभ तहसीलदार द्वारा जारी सामुदायिक प्रमाणपत्र के आधार पर मिला था, जिसमें उन्हें मलई पंडारम समुदाय का सदस्य बताया गया।

बाद में सतर्कता जांच में दावा किया गया कि वह मलई पंडारम नहीं, बल्कि पंडारम (वीर शैव) समुदाय से संबंधित हैं, जिसे अन्य पिछड़ा वर्ग में रखा गया। जांच के आधार पर स्क्रूटिनी कमेटी ने उनका सामुदायिक प्रमाणपत्र रद्द करने सहित कार्रवाई के निर्देश दिए। इसके बाद सरकार ने उनकी सेवा समाप्त करने और कथित झूठा जाति दावा करने के आरोप में अभियोजन चलाने का आदेश दिया।

अपीलकर्ता ने अधिकारियों द्वारा भरोसा किए गए दस्तावेजों और सामग्री में विसंगतियां होने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि सतर्कता रिपोर्ट में मुख्य रूप से उनके मामा के कथित बयान पर भरोसा किया गया, जबकि मामा खुद अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंधित बताए गए। उन्होंने यह भी बताया कि उनके परिवार के अन्य सदस्यों को अनुसूचित जनजाति की पहचान के आधार पर लाभ मिल चुके हैं। अपीलकर्ता ने अपने खिलाफ इस्तेमाल किए गए मूल दस्तावेज देखने की मांग की थी लेकिन प्रतिकूल आदेश पारित करने से पहले उन्हें ये दस्तावेज नहीं दिखाए गए।

डिवीजन बेंच ने पाया कि अपीलकर्ता की आपत्ति और उसके जवाब पर आदेश पारित करते समय विचार ही नहीं किया गया। अदालत ने राज्य की यह दलील भी खारिज की कि उपलब्ध सामग्री पर्याप्त होने के कारण आपत्ति पर विचार न करना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं है।

अदालत ने कहा कि 1996 के कानून के नजरिए से भी स्क्रूटिनी कमेटी का दृष्टिकोण सही नहीं था। जाति की गलत जानकारी देकर आरक्षण या अन्य संवैधानिक लाभ हासिल करने के आरोपों की जांच करते समय अधिकारियों को उन सामाजिक कठिनाइयों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए, जिनका सामना SC/ST समुदायों के सदस्यों को अपनी पहचान से जुड़े दस्तावेज हासिल करने में करना पड़ता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि ऐसे कई मामले सामने आते हैं, जिनमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के सदस्यों को पहचान संबंधी दस्तावेजों के अभाव में ही लाभों से वंचित कर दिया जाता है। अदालत ने कहा कि पहचान और जाति प्रमाणपत्र जैसे दस्तावेज हासिल करने में इन समुदायों के लोगों को होने वाली कठिनाइयों को वह अपने समक्ष आने वाले मामलों की संख्या के आधार पर न्यायिक संज्ञान में ले सकती है।

अदालत ने कहा कि जाति दावों की जांच करते समय अधिकारियों को समग्र परिस्थितियों पर विचार करते हुए उदार दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसमें परिवार के अन्य सदस्यों, यहां तक कि विस्तारित परिवार के सदस्यों को सामाजिक सुरक्षा या आरक्षण संबंधी लाभ दिए जाने जैसे पहलुओं को भी देखा जाना चाहिए।

डिवीजन बेंच ने कहा कि एक ओर राज्य यह स्वीकार करता है कि SC/ST समुदायों को अन्य नागरिकों के बराबर लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उन्हीं समुदायों के सदस्यों से अपनी पहचान साबित करने के लिए सामान्य नागरिकों के समान कठोर प्रमाण की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

अदालत ने स्पष्ट किया कि एससी-एसटी सदस्यों को संविधान से मिले लाभों से वंचित करना केवल असाधारण मामलों में उचित होगा, जहां स्पष्ट धोखाधड़ी स्वतंत्र रूप से उपलब्ध सरकारी सामग्री से साबित हो। जहां आवश्यक हो, इसमें उस अधिकारी द्वारा की गई कथित धोखाधड़ी का प्रमाण भी शामिल होना चाहिए, जिसने संबंधित जाति प्रमाणपत्र जारी किया था और जिसके आधार पर व्यक्ति को सेवा संबंधी लाभ मिले।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी दावेदार का अपनी सामुदायिक पहचान साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य पेश नहीं कर पाना, अपने आप में संवैधानिक लाभ छीनने का आधार नहीं हो सकता, जब तक राज्य उसके दावे के विपरीत सकारात्मक और ठोस साक्ष्य पेश न करे।

अदालत ने स्क्रूटिनी कमेटी की कार्यवाही और उसके आधार पर सरकार द्वारा पारित आदेश दोनों रद्द कर दिए। कमेटी को मामले पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश दिया गया है। उसे अपीलकर्ता की पहले दी गई आपत्ति और उसके द्वारा पेश की जाने वाली अतिरिक्त सामग्री पर विचार करना होगा तथा उसके खिलाफ इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों के मूल रिकॉर्ड का निरीक्षण करने का अवसर भी देना होगा।

नई कार्यवाही हाईकोर्ट के फैसले की प्रति प्राप्त होने से छह महीने के भीतर पूरी करनी होगी। अदालत ने कमेटी को यह भी निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता और उसके परिवार के सदस्यों पर लागू प्रमाण के बोझ को लेकर हाईकोर्ट की टिप्पणियों को ध्यान में रखे। नई कार्यवाही पूरी होने तक अपीलकर्ता को अस्थायी पेंशन लेते रहने की भी अनुमति दी गई है।

डिवीजन बेंच ने इस निर्देश के साथ रिट अपील मंजूर की।

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