केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि 'माता-पिता और सीनियर सिटिज़न के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत बहू तब ज़िम्मेदार नहीं है, जब सीनियर सिटिज़न के बच्चे ज़िंदा हों। [2026 LiveLaw (Ker) 499]

जस्टिस हरिशंकर वी. मेनन ने कहा कि जब सीनियर सिटिज़न के दूसरे बच्चे हों तो बहू इस अधिनियम के तहत 'बच्चे' या 'रिश्तेदार' की परिभाषा में नहीं आएगी।

कोर्ट ने कहा,

“अधिनियम की धारा 9 को पढ़ने से पता चलता है कि केवल “बच्चों या रिश्तेदारों” को ही सीनियर सिटिज़न को मासिक भरण-पोषण का भुगतान करने का निर्देश दिया जा सकता है”…मेरी राय है कि बहू को इस कानून के प्रावधानों में शामिल नहीं किया गया। यह सच है कि अधिनियम की धारा 2(g) “रिश्तेदार” शब्द को बिना बच्चों वाले सीनियर सिटिज़न के कानूनी उत्तराधिकारी के रूप में परिभाषित करती है। हालाँकि, चूँकि यह माना गया कि दूसरे प्रतिवादी (respondent) के अन्य बच्चे भी हैं, जिनमें याचिकाकर्ता के दिवंगत पति भी शामिल हैं, इसलिए धारा 2(g) के प्रावधान भी लागू नहीं किए जा सकते।”

याचिकाकर्ता के पति की मृत्यु के बाद उसकी सास ने उसके पक्ष में एक सेटलमेंट डीड (समझौता विलेख) निष्पादित किया। इसके बाद सेटलमेंट डीड का हवाला देते हुए, सास/दूसरे प्रतिवादी ने भरण-पोषण न्यायाधिकरण (Maintenance Tribunal) का रुख किया और आरोप लगाया कि उसकी देखभाल नहीं की जा रही थी। न्यायाधिकरण ने याचिकाकर्ता को अपनी सास को हर महीने 10,000 रुपये का भुगतान करने का आदेश दिया। इससे व्यथित होकर याचिकाकर्ता हाई कोर्ट पहुंची।

याचिकाकर्ता ने बताया कि सास अपने चार अन्य जीवित बच्चों (प्रतिवादी 3 से 6) में से किसी एक के साथ रह रही थी। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि सेटलमेंट डीड को देखते हुए याचिकाकर्ता का यह कर्तव्य है कि वह सास का भरण-पोषण करे। इसके अलावा, यह भी तर्क दिया गया कि याचिकाकर्ता ने सास को उस संपत्ति में प्रवेश करने या उससे होने वाले लाभ का आनंद लेने की अनुमति भी नहीं दी। उन्होंने कहा कि चूँकि आदेश सुलह के बाद दिया गया, इसलिए कोर्ट को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

दोनों पक्षों को सुनने के बाद कोर्ट ने पाया कि न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही केवल याचिकाकर्ता के खिलाफ थी, न कि उसके किसी अन्य बच्चे के खिलाफ। कोर्ट ने इस बात पर भी ध्यान दिया कि प्रतिवादी पक्ष ने याचिकाकर्ता की इस बात का खंडन नहीं किया कि वे अपनी माँ का खर्च उठाने की आर्थिक स्थिति में थे।

इसके बाद कोर्ट ने धारा 9 और 2(a), (g) का ज़िक्र करते हुए यह निष्कर्ष निकाला कि मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल बहू के खिलाफ अपनी सास का खर्च उठाने का आदेश नहीं दे सकता। यह देखते हुए कि याचिकाकर्ता विवादित आदेश के बाद से ही अपनी सास को भुगतान कर रही थी, कोर्ट ने कहा कि उस पैसे को वापस करने की ज़रूरत नहीं है।

इस तरह,कोर्ट ने याचिका का निपटारा कर दिया।

Case Title: Hajara v. The Maintenance Tribunal and Ors.

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