केरल हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि क्रूरता का एक ही गंभीर कृत्य IPC की धारा 498A के तहत अपराध माना जा सकता है और इसके लिए कई कृत्यों की श्रृंखला ज़रूरी नहीं है।

जस्टिस जोबिन सेबेस्टियन ने कहा:

“पति-पत्नी के बीच हर तरह की परेशानी, असहमति या बुरे बर्ताव को IPC की धारा 498A के तहत 'क्रूरता' नहीं माना जा सकता... साथ ही यह भी नहीं कहा जा सकता कि क्रूरता साबित करने के लिए हमेशा कई कृत्यों की श्रृंखला ज़रूरी है। अगर कोई एक कृत्य काफ़ी गंभीर हो और क़ानूनी परिभाषा के दायरे में आता हो, तो उसे भी क्रूरता माना जा सकता है...”

कोर्ट ने एक महिला के ससुराल वालों के ख़िलाफ़ IPC की धारा 498A के तहत चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की, क्योंकि उनके ख़िलाफ़ क्रूरता का कोई ठोस कृत्य बताए बिना केवल अस्पष्ट और सामान्य आरोप लगाए गए। हालांकि, कोर्ट ने पति (पहले याचिकाकर्ता) के ख़िलाफ़ कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया, क्योंकि उस पर लगाए गए आरोप ठोस थे और प्रथम दृष्टया अपराध का संकेत देते थे।

अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि 2007 में पहले याचिकाकर्ता/पहले आरोपी से शादी के बाद से ही शिकायतकर्ता महिला को याचिकाकर्ताओं के कहने पर शारीरिक और मानसिक क्रूरता का शिकार बनाया गया। यह भी आरोप लगाया गया कि पहले याचिकाकर्ता/पति ने उसके सोने के गहने हड़प लिए थे। उनके ख़िलाफ़ IPC की धारा 406 [विश्वासघात के लिए सज़ा] और 498A [महिला के पति या पति के रिश्तेदार द्वारा क्रूरता] के साथ धारा 34 [साझा इरादा] के तहत मामला दर्ज किया गया।

पति और उसके रिश्तेदारों ने अपने ख़िलाफ़ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए हाईकोर्ट के असाधारण अधिकार क्षेत्र का सहारा लिया। उन्होंने तर्क दिया कि आरोप अस्पष्ट और सामान्य थे और उनमें कथित अपराधों के तत्व मौजूद नहीं थे। यह भी बताया गया कि शादी के 17 साल बाद मामला दर्ज करने में बहुत ज़्यादा देरी हुई। उन्होंने तर्क दिया कि उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया।

शिकायतकर्ता/पत्नी और अभियोजन पक्ष ने इस याचिका का विरोध किया। दोनों पक्षों की बात सुनने के बाद कोर्ट ने IPC की धारा 498A के तहत ज़रूरी शर्तों की जांच की और इस बात पर विचार किया कि क्या लगाए गए आरोप इस धारा के 'एक्सप्लेनेशन' (स्पष्टीकरण) के दो हिस्सों में से किसी एक के दायरे में आते हैं।

कोर्ट ने समझाया,

"एक्सप्लेनेशन का पहला हिस्सा ऐसे जानबूझकर किए गए व्यवहार को शामिल करता है जिससे महिला के आत्महत्या करने या उसे गंभीर चोट पहुँचने या उसकी जान, शरीर के अंगों या शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य को खतरा होने की संभावना हो। दूसरा हिस्सा महिला या उससे जुड़े किसी व्यक्ति पर संपत्ति या कीमती चीज़ की गैर-कानूनी माँग पूरी करने के लिए दबाव डालने के मकसद से परेशान करने, या ऐसी माँग पूरी न होने पर परेशान करने से संबंधित है।"

कोर्ट का मानना ​​था कि ससुराल वालों पर लगाए गए आरोप अस्पष्ट थे और वे दोनों हिस्सों में से किसी के भी दायरे में नहीं आत। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि ऐसा कोई खास आरोप नहीं था कि सोना उन्हें सौंपा गया या उन्होंने उसका गलत इस्तेमाल किया।

हालांकि, कोर्ट की राय थी कि चूँकि पति पर लगाए गए आरोप स्पष्ट थे, इसलिए ट्रायल के दौरान उनकी सच्चाई साबित होनी थी। इस प्रकार, कोर्ट के अनुसार, मौजूदा स्टेज पर पति के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग नहीं था।

इसलिए कोर्ट ने याचिका को आंशिक रूप से मंज़ूरी दी और ससुराल वालों के खिलाफ मामला रद्द किया, लेकिन पति के खिलाफ नहीं।

Case Title: Firoz Kunnumal and Ors. v. State of Kerala and Anr.

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