ट्रेन से गिरकर व्यक्ति की मौत पर टिकट नहीं मिलने के आधार पर मुआवजा देने से इनकार नहीं किया जा सकता: झारखंड हाईकोर्ट
झारखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि रेलवे दुर्घटनाओं में मुआवजे से जुड़े प्रावधानों की उदारतापूर्वक व्याख्या की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि रेलवे अधिनियम की संकीर्ण और तकनीकी व्याख्या करने से बड़ी संख्या में पीड़ितों, विशेषकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को मुआवजे से वंचित होना पड़ सकता है, जो अपनी आर्थिक स्थिति के कारण रेल यात्रा पर निर्भर हैं।
जस्टिस संजय कुमार द्विवेदी की एकल पीठ ने ट्रेन से गिरकर एक व्यक्ति की मौत के मामले में उसके परिवार को ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कहा कि मृतक के शव से रेलवे टिकट बरामद नहीं होने के आधार पर ही मुआवजे का दावा खारिज नहीं किया जा सकता, जब उपलब्ध साक्ष्य यह साबित करते हों कि वह वास्तविक यात्री था और उसकी मौत एक दुर्घटना में हुई।
हाईकोर्ट ने रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें मृतक बनमाली गोपे के परिवार का मुआवजा दावा खारिज कर दिया गया था।
क्या है मामला?
अपीलकर्ताओं के अनुसार, बनमाली गोपे 1 सितंबर 2017 को झींकपानी रेलवे स्टेशन से टाटा-बड़बिल पैसेंजर ट्रेन में सवार हुए थे। उन्हें केंदपोसी जाना था और उनके साथ एक अन्य यात्री भी था।
परिवार के मुताबिक, ट्रेन में काफी भीड़ थी, जिसके कारण बनमाली को डिब्बे के अंदर खड़े होकर यात्रा करनी पड़ रही थी। जब ट्रेन केंदपोसी स्टेशन के पास पहुंची, तो उतरने वाले यात्री दरवाजे की ओर बढ़ने लगे।
इसी दौरान यात्रियों की धक्का-मुक्की और ट्रेन के अचानक झटके के कारण बनमाली का संतुलन बिगड़ गया और वह चलती ट्रेन से नीचे गिर गए। हादसे में उनके दोनों पैर कट गए और घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई।
इसके बाद परिवार ने रेलवे अधिनियम के तहत ₹8 लाख मुआवजे की मांग की। हालांकि, रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2023 को यह दावा खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल ने मृतक के शव से रेलवे टिकट बरामद नहीं होने को आधार बनाया था।
इसके बाद परिवार ने ट्रिब्यूनल के आदेश को झारखंड हाईकोर्ट में चुनौती दी।
हाईकोर्ट ने किन साक्ष्यों पर भरोसा किया?
हाईकोर्ट ने मामले से जुड़े दस्तावेजों और गवाहों के बयानों की जांच की। कोर्ट ने पाया कि घटना के बाद अप्राकृतिक मृत्यु का मामला दर्ज किया गया था। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में ट्रेन दुर्घटना से संबंधित चोटों का उल्लेख था और बताया गया था कि मृतक का शरीर तीन हिस्सों में बंट गया था।
कोर्ट ने स्टेशन मैनेजर के उस पत्र पर भी गौर किया, जिसमें दर्ज था कि मृतक का शव रात करीब 8:25 बजे रेलवे लाइन के पास मिला था।
इसके अलावा, मृतक के भाई हरीश गोपे ने गवाही दी थी कि वह बनमाली के साथ रेलवे स्टेशन गया था और उसने उनके लिए टिकट खरीदा था।
हाईकोर्ट ने कहा कि इन दस्तावेजों और गवाह के बयान से यह पर्याप्त रूप से साबित होता है कि मृतक ट्रेन में यात्रा कर रहा था और उसकी मौत ट्रेन से गिरने के कारण हुई।
कोर्ट ने यह भी कहा कि रेलवे ने मृतक के भाई की गवाही को जिरह के दौरान चुनौती नहीं दी थी। इसके अलावा, रेलवे ने घटना से संबंधित डिविजनल रेलवे मैनेजर की रिपोर्ट भी पेश नहीं की, जबकि संबंधित नियमों के तहत ऐसी रिपोर्ट महत्वपूर्ण थी।
रेलवे अधिनियम के तहत दुर्घटना मानी जाएगी
हाईकोर्ट ने कहा कि यात्रियों की धक्का-मुक्की के कारण ट्रेन से गिरना रेलवे अधिनियम के तहत एक दुर्घटनाजन्य घटना यानी 'Untoward Incident' के दायरे में आता है।
कोर्ट ने यह भी पाया कि रेलवे अधिनियम की धारा 124A के तहत मुआवजा देने से इनकार करने के लिए लागू वैधानिक अपवाद इस मामले में साबित नहीं हुए।
इन अपवादों में आत्महत्या, खुद को जानबूझकर चोट पहुंचाना, आपराधिक कृत्य करना, नशे की स्थिति और प्राकृतिक कारणों से मौत जैसी परिस्थितियां शामिल हैं।
रेलवे यह भी साबित नहीं कर पाया कि मृतक की मौत उसकी अपनी लापरवाही के कारण हुई थी।
'संकीर्ण व्याख्या से गरीब और मध्यम वर्ग के यात्री मुआवजे से वंचित हो जाएंगे'
हाईकोर्ट ने कहा कि कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या ऐसी होनी चाहिए, जिससे उनका उद्देश्य पूरा हो सके। ऐसे कानूनों को अत्यधिक तकनीकी या संकीर्ण नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।
कोर्ट ने टिप्पणी की:
“एक ऐसे देश में, जहां करोड़ों लोग रेल से यात्रा करते हैं, क्योंकि हर कोई हवाई जहाज या निजी कार से यात्रा करने का खर्च नहीं उठा सकता, वहां इस प्रावधान की संकीर्ण और सीमित व्याख्या करने से बड़ी संख्या में ट्रेन दुर्घटनाओं के पीड़ितों, विशेषकर गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों को रेलवे अधिनियम के तहत मुआवजा पाने से वंचित करना होगा।”
कोर्ट ने कहा कि रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल ने उपलब्ध दस्तावेजों और गवाह की गवाही का सही तरीके से मूल्यांकन नहीं किया और अत्यधिक तकनीकी दृष्टिकोण अपनाते हुए मुआवजे का दावा खारिज कर दिया।
परिवार को ₹8 लाख मुआवजा देने का आदेश
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उपलब्ध साक्ष्यों से मृतक के वास्तविक यात्री होने और उसकी मौत दुर्घटनाजन्य घटना में होने की पुष्टि होती है। इसलिए, उसका परिवार रेलवे अधिनियम की धारा 124A के तहत मुआवजा पाने का हकदार है।
इसी आधार पर कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए रेलवे क्लेम ट्रिब्यूनल का आदेश रद्द कर दिया और मृतक के परिवार को रेलवे दुर्घटना एवं अप्रिय घटनाएं (मुआवजा) नियम, 1990 के तहत ₹8 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया।
कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि मुआवजे की राशि पर दावा आवेदन दाखिल करने की तारीख से भुगतान का आदेश दिए जाने तक 6% सालाना ब्याज दिया जाएगा।