हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि NDPS (नारकोटिक ड्रग्स एंड साइकोट्रोपिक सब्सटेंस एक्ट) Act के तहत कई मामलों का सामना कर रहे आरोपी को जमानत दी जा सकती है, अगर उसके पास से नशीले पदार्थों की 'मध्यम मात्रा' (Intermediate Quantity) मिली हो। कोर्ट ने माना कि वह व्यक्ति कोई ड्रग तस्कर नहीं है और मुकदमे में देरी होने की संभावना है।

कोर्ट ने कहा कि इस मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए याचिकाकर्ता को खुद को सुधारने का एक मौका दिया जाना चाहिए, लेकिन इसके लिए कड़ी जमानत शर्तें लागू होंगी।

जस्टिस चिराग भानु सिंह ने टिप्पणी की:

“चूंकि पिछले मामलों में भी नशीले पदार्थों की 'मध्यम मात्रा' ही मिली थी और ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता खुद नशीले पदार्थों का आदी है, इसलिए न्याय और निष्पक्षता के हित में उसे जमानत दी जा सकती है, लेकिन कड़ी शर्तों के साथ। उसे खुद को सुधारने का मौका दिया जा सकता है। तीनों बार उसके पास से जो मात्रा बरामद हुई, उससे यह साफ है कि वह कोई तस्कर नहीं है।”

यह मामला 4 मार्च, 2026 को हमीरपुर के भोरंज पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR से जुड़ा है। याचिकाकर्ता लोकेश कुमार भेरवा के पास से कथित तौर पर 9 ग्राम हेरोइन (चिट्टा) बरामद होने के बाद उस पर NDPS Act, 1985 की धारा 21 और 29 के तहत मामला दर्ज किया गया।

अभियोजन पक्ष ने कोर्ट को यह भी बताया कि उसके खिलाफ NDPS Act के तहत दो अन्य मामले भी लंबित हैं, जिनमें कथित तौर पर 20 ग्राम और 6 ग्राम हेरोइन बरामद हुई।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 483 के तहत जमानत मांगते हुए याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि वह नशीले पदार्थों का आदी है और उसने ये पदार्थ अपने निजी इस्तेमाल के लिए रखे थे।

कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता के पास से बरामद 9 ग्राम हेरोइन 'मध्यम मात्रा' की श्रेणी में आती है। इस मामले की परिस्थितियों में NDPS Act की धारा 37 की सख्त शर्तें उसी तरह लागू नहीं होंगी।

कोर्ट ने ध्यान दिया कि याचिकाकर्ता ने खुद को नशीले पदार्थों का आदी बताया, पिछले दो मामलों में भी नशीले पदार्थों की मध्यम मात्रा ही शामिल थी, और मुकदमे की प्रक्रिया में काफी समय लगने की संभावना है। "जेल नहीं, ज़मानत" के सिद्धांत पर ज़ोर देते हुए अदालत ने कुछ कड़ी शर्तों के साथ ज़मानत दे दी। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता को खुद को सुधारने का एक मौका मिलना चाहिए।

साथ ही अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अगर भविष्य में वह ऐसी ही गतिविधियों में शामिल पाया जाता है। उसके खिलाफ NDPS Act के तहत FIR दर्ज होती है, तो उसकी ज़मानत रद्द की जा सकती है।

Case Title : Lokesh Kumar v/s State of HP

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