गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि जिन बैंक अधिकारियों पर ग्राहकों के पैसे की सुरक्षा की जिम्मेदारी होती है, यदि वे अपने अधिकारों का दुरुपयोग करते हैं तो यह उस बुनियादी ढांचे को ही चोट पहुंचाता है जिस पर वित्तीय संस्थान काम करते हैं। [2026 LiveLaw (Guj) 289]

इस मामले में कोर्ट ने एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। कोर्ट ने पाया कि उस पर विशेष भूमिका निभाने का आरोप है—एक बैंक अधिकारी के रूप में उस पर एक विधवा ग्राहक के साथ धोखाधड़ी करने का आरोप है। यह पैसा उसे एक सरकारी योजना के तहत मिला था। जांच के दौरान जुटाए गए सबूत "प्रथम दृष्टया" (prima facie) उसे इस कथित लेनदेन से जोड़ते हैं।

कोर्ट एक व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई कर रहा था। उस पर आरोप है कि उसने बैंक में 'क्लस्टर सेल्स हेड' के पद का दुरुपयोग किया। उसने विधवा के निष्क्रिय (Dormant) बैंक खाते को फिर से सक्रिय (Reactivate) करवाया और सह-आरोपी को उस अकाउंट से पैसे निकालने में मदद की। यह पैसा 'गंगा स्वरूप विधवा सहाय योजना' के तहत उस विधवा को आर्थिक सहायता के रूप में मिला था।

उस पर IPC की धारा 406 (विश्वासघात/Criminal Breach of Trust) और सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधन) अधिनियम की धारा 66-C (पहचान की चोरी/Identity Theft) के तहत मामला दर्ज किया गया।

आरोप है कि सह-आरोपी के अनुसार, आवेदक (याचिकाकर्ता) के निर्देश पर रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर बदलकर निष्क्रिय बैंक अकाउंट्स को सक्रिय किया गया। इसके बाद संबंधित ATM कार्ड का उपयोग करके अकाउंट से पैसे निकाल लिए गए। सह-आरोपी विश्वजीतसिंह ने बताया कि उसने शिकायतकर्ता के अकाउंट से कई बार पैसे निकाले, जिसमें से 15,000 रुपये अपने पास रखे और बाकी रकम आवेदक को सौंप दी।

शुरुआत में जस्टिस संजीव जे. ठक्कर ने कहा:

"ग्राहकों के पैसे की सुरक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाले व्यक्ति द्वारा अपने अधिकार का दुरुपयोग करना, उस भरोसे पर ही चोट करता है, जिस पर कोई भी बैंकिंग संस्थान काम करता है।"

अदालत ने आगे कहा,

"आवेदक की विशिष्ट भूमिका और अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों को देखते हुए यह अदालत उसे अग्रिम जमानत (Anticipatory Bail) देने के लिए तैयार नहीं है। अदालत इस बात को समझती है कि केवल आरोपों की गंभीरता के आधार पर ही अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती। लेकिन इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आवेदक की एक विशिष्ट भूमिका बताई। जांच के दौरान जुटाए गए सबूत प्रथम दृष्टया (prima facie) उसे कथित लेन-देन से जोड़ते हैं। आरोप यह हैं कि उसने बैंक में अपने पद का दुरुपयोग किया और शिकायतकर्ता के खाते से पैसे को दूसरी जगह भेजने (Diversion) में शामिल रहा। इन सभी परिस्थितियों को एक साथ देखने पर आवेदक को अग्रिम जमानत देने के पक्ष में कोई आधार नहीं बनता।"

अदालत ने यह भी कहा कि आवेदक की भूमिका पर विचार करते समय बैंक में उसके पद और उसके कथित कार्यों की प्रकृति को ध्यान में रखना जरूरी है।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष ने केवल उसके नौकरी पर होने या सह-आरोपियों के साथ जुड़े होने के कारण ही उसे दोषी नहीं माना है, बल्कि शिकायतकर्ता के खाते के संचालन में उसकी एक विशिष्ट भूमिका बताई।

अदालत ने कहा कि आरोपों से पता चलता है कि वह पैसे निकालने की प्रक्रिया में भी शामिल था, जिससे प्रथम दृष्टया यह सवाल उठता है कि क्या उसने अपने अधिकार का दुरुपयोग किया।

अदालत ने आगे कहा,

"जांच के दौरान जुटाए गए सबूतों को कुल मिलाकर देखा जाए तो वे प्रथम दृष्टया आवेदक को कथित लेन-देन से जोड़ते हैं। अभियोजन पक्ष का कहना है कि जिस तरह से अकाउंट को फिर से सक्रिय (Reactivate) किया गया और चलाया गया, और जिस तरह से निकाली गई रकम का बंटवारा हुआ, उससे साफ है कि आवेदक की इसमें सक्रिय भूमिका थी। इन परिस्थितियों को अलग-अलग करके नहीं देखा जा सकता, क्योंकि ये सभी एक ही कथित लेन-देन का हिस्सा हैं। साथ ही बताते हैं कि वह किस तरह से इसमें शामिल था।"

अदालत ने कहा कि सह-आरोपी का बयान भी एक ऐसी परिस्थिति है, जिसकी कानूनी अहमियत और स्वीकार्यता पर सही समय आने पर कानून के अनुसार विचार किया जाएगा। इसमें कहा गया कि फिलहाल, इस बयान की जांच जांच के दौरान जुटाई गई अन्य सामग्रियों के साथ की जानी चाहिए।

इसमें कहा गया,

"शिकायतकर्ता को एक सरकारी योजना के तहत आर्थिक सहायता मिल रही थी। इस सहायता के कथित तौर पर कहीं और इस्तेमाल (डायवर्जन) किए जाने के मामले को केवल बैंक लेनदेन से जुड़ा विवाद नहीं माना जा सकता। आवेदक बैंक में एक जिम्मेदार पद पर था और उससे यह उम्मीद की जाती थी कि वह यह सुनिश्चित करे कि ग्राहकों के अकाउंट तय प्रक्रियाओं के अनुसार ही संचालित हों। यदि ये आरोप साबित हो जाते हैं तो इससे पता चलेगा कि उसने अपने पद की शक्तियों का इस्तेमाल ग्राहक के हितों के खिलाफ किया। यह स्थिति आरोपों की गंभीरता को और बढ़ा देती है। इसमें उसकी विशिष्ट भूमिका को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए।"

इसमें आगे कहा गया कि अकाउंट में कुछ पैसे वापस आ जाने से पहले हुए लेनदेनों से जुड़े आरोप या आवेदक की कथित संलिप्तता अपने आप खत्म नहीं हो जाती।

इस प्रकार, अदालत ने अग्रिम जमानत याचिका खारिज की।

Case Title : YOGENDRA VIJAY BAHADUR SINGH v/s STATE OF GUJARAT

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