CrPC की धारा 125 के तहत पहली पत्नी के भरण-पोषण के मामले में दूसरी पत्नी आवश्यक पक्षकार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

Update: 2026-05-09 15:45 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि CrPC की धारा 125 के तहत पहली पत्नी और बच्चों द्वारा शुरू की गई भरण-पोषण की कार्यवाही में दूसरी पत्नी न तो ज़रूरी पक्षकार है और न ही उचित पक्षकार। कोर्ट ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसी कार्यवाही को बेवजह उन सभी लोगों को शामिल करके नहीं बढ़ाया जा सकता, जो पति पर निर्भर होने का दावा करते हैं।

जस्टिस स्वर्णा कांता शर्मा ने यह टिप्पणी तब की, जब उन्होंने महिला द्वारा दायर अर्जी खारिज की, जिसमें उसने पहली पत्नी द्वारा अपने पति के खिलाफ दायर भरण-पोषण की पुनरीक्षण याचिका में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की थी।

पहली पत्नी ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसे भरण-पोषण देने से इनकार किया गया था, जबकि शादी से पैदा हुए दो बच्चों में से हर एक को ₹10,000 देने का आदेश दिया गया था।

कार्यवाही के दौरान, पति ने फैमिली कोर्ट से अपने पक्ष में तलाक की डिक्री मिलने के बाद दूसरी शादी की थी।

इसके बाद दूसरी पत्नी ने भरण-पोषण की कार्यवाही में खुद को पक्षकार बनाने की मांग की। उसने दलील दी कि वह प्रतिवादी की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी है। इस मामले में पारित कोई भी आदेश उसके अधिकारों और वित्तीय हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

इस अर्जी का विरोध करते हुए पहली पत्नी ने तर्क दिया कि यह विवाद केवल उसके, बच्चों और पति के बीच भरण-पोषण के दावों तक ही सीमित है। दूसरी पत्नी के खिलाफ कोई राहत नहीं मांगी गई।

हाईकोर्ट ने इस तर्क से सहमति जताई और "ज़रूरी पक्षकार" तथा "उचित पक्षकार" के बीच का अंतर स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि ज़रूरी पक्षकार वह होता है, जिसकी अनुपस्थिति में कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता, जबकि उचित पक्षकार वह होता है, जिसकी उपस्थिति विवादों के पूर्ण और प्रभावी निपटारे के लिए आवश्यक होती है।

कोर्ट ने फैसला सुनाया कि दूसरी पत्नी इन दोनों में से किसी भी कसौटी पर खरी नहीं उतरती।

कोर्ट ने कहा:

"CrPC की धारा 125 के तहत कार्यवाही याचिकाकर्ता और प्रतिवादी के बीच के अधिकारों और दायित्वों तक ही सीमित है। आवेदक की स्थिति या दावे (यदि कोई हों) का ऐसे अधिकारों के निपटारे पर कोई सीधा या ठोस प्रभाव नहीं पड़ता है।"

दूसरी पत्नी की पति पर वित्तीय निर्भरता के आधार पर उसे पक्षकार बनाने के तर्क को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि ऐसी अर्जी स्वीकार करने से हर उस आश्रित व्यक्ति के लिए भरण-पोषण की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का रास्ता खुल जाएगा, जो पति पर निर्भर है।

कोर्ट ने कहा,

"अगर ऐसी किसी अर्जी पर विचार किया जाए तो इससे हर उस व्यक्ति के लिए दरवाज़ा खुल जाएगा, जो यह दावा करता है कि वह उस व्यक्ति पर निर्भर है, जिससे भरण-पोषण की मांग की जा रही है। वह ऐसी कार्यवाही में खुद को पक्षकार बनाने की मांग कर सकता है। इससे CrPC की धारा 125 के तहत होने वाली संक्षिप्त कार्यवाही का दायरा बेवजह बढ़ जाएगा।"

कोर्ट ने आगे कहा,

"भले ही यह मान लिया जाए कि आवेदक आर्थिक रूप से प्रतिवादी-पति पर निर्भर है। फिर भी प्रतिवादी के पास हमेशा यह विकल्प खुला रहता है कि वह ऐसे सभी प्रासंगिक तथ्य इस कोर्ट के सामने पेश करे।"

इसलिए कोर्ट ने पक्षकार बनाने वाली अर्जी खारिज की।

Case title: PS v. BS

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