PC Act | 2018 के संशोधन से पहले अगर पूर्व सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया तो पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट
दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' (Prevention of Corruption Act) की धारा 19 में 2018 का संशोधन, जिसके तहत पूर्व सरकारी कर्मचारियों पर मुकदमा चलाने के लिए पहले से मंज़ूरी लेने की ज़रूरत को बढ़ाया गया, भविष्य के मामलों पर लागू होता है। यह उन मामलों को फिर से नहीं खोलता, जिनमें 26 जुलाई, 2018 से पहले ही मामला दर्ज (संज्ञान) किया जा चुका है।
जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच ने कहा कि यह संशोधन इस हद तक 'पिछली तारीख से लागू' (Retrospective) होता है कि इसका फायदा तब भी मिलेगा, जब अपराध इसके लागू होने से पहले किया गया हो।
कोर्ट ने कहा,
"...हालांकि, यह भविष्य के मामलों पर लागू (Prospective) होता है, यानी जहां 26.07.2018 से पहले ही ऐसे अपराध का संज्ञान लिया जा चुका है, वहां मामले को फिर से नहीं खोला जाएगा और ऐसे मामलों में पहले से मंज़ूरी लेने की कोई नई ज़रूरत नहीं होगी। मंज़ूरी लेने की ज़रूरत केवल तब लागू होगी, जब कोर्ट ने 26.07.2018 या उसके बाद अधिनियम की धारा 19(1) में बताए गए अपराध का संज्ञान लेना हो।"
बेंच ने CBI के स्पेशल जज (PC Act) द्वारा 'भ्रष्टाचार निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2018' के दायरे और लागू होने के बारे में पूछे गए सवाल का जवाब दिया।
कोर्ट ने माना कि जहां 26 जुलाई, 2018 को संशोधन लागू होने से पहले ही 'भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम' के तहत अपराधों का संज्ञान लिया जा चुका था, वहां सक्षम अधिकारी से नई मंज़ूरी लेने के लिए कार्यवाही को फिर से शुरू करने की ज़रूरत नहीं होगी।
मंज़ूरी की ज़रूरत वाला संशोधित प्रावधान केवल उन मामलों पर लागू होगा, जहां कोर्ट को संशोधन लागू होने के समय या उसके बाद संज्ञान लेना था।
कोर्ट ने कहा कि 1988 के अधिनियम की धारा 19(1) में संशोधन कोर्ट पर कुछ अपराधों का संज्ञान लेने से रोक लगाता है। ये अपराध ऐसे आरोपी द्वारा किए गए हों जो अब सरकारी कर्मचारी नहीं रहा है या जो उस पद के अलावा किसी अन्य पद पर सरकारी कर्मचारी है, जिस पद पर रहते हुए कथित अपराध किया गया। इसमें यह भी कहा गया कि 2018 में संशोधन से पहले आरोपी को मिलने वाली यह रोक और उससे जुड़ी सुरक्षा उस व्यक्ति पर लागू नहीं होती, जो अब सरकारी कर्मचारी नहीं रहा या जो उसी पद पर सरकारी कर्मचारी नहीं है।
बेंच ने कहा कि संशोधन अधिनियम खास तौर पर 26.07.2018 से लागू किया गया। इसलि, इसका मकसद उन मामलों पर असर डालना नहीं था, जिनमें आरोपी के खिलाफ पहले ही संज्ञान लिया जा चुका था और जिनके लिए उस समय के कानून के तहत पहले से मंज़ूरी की ज़रूरत नहीं थी।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह यह अभियोजन पक्ष पर एक नई ज़िम्मेदारी डालता है और इसके पीछे से लागू होने (Retrospective Effect) का कोई संकेत नहीं देता, सिवाय इस बात के कि भले ही अपराध संशोधन से पहले की अवधि का हो, लेकिन जब संशोधन अधिनियम लागू होने के बाद कोर्ट अपराध का संज्ञान लेगी, तो ऐसे पूर्व सरकारी कर्मचारियों को यह सुरक्षा मिलेगी।"
संदर्भ का जवाब देते हुए, बेंच ने निर्देश दिया कि मामले में आगे की कार्रवाई के लिए केस की फाइल संबंधित स्पेशल जज को भेजी जाए।
कोर्ट ने निर्देश दिया,
"इसे 10 सितंबर, 2026 को संबंधित स्पेशल जज के सामने लिस्ट किया जाएगा।"
Title: COURT ON ITS OWN MOTION v. STATE
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