जज बनकर हासिल की जानकारी: हाईकोर्ट आरोपी की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की, पुलिस की गिरफ्तारी न कर पाने पर सवाल उठाए

Update: 2026-08-06 15:02 GMT

दिल्ली हाईकोर्ट ने ऐसे व्यक्ति की अग्रिम ज़मानत याचिका खारिज की, जिस पर सिविल सर्वेंट और पटना हाई कोर्ट का जज बनकर कई वरिष्ठ अधिकारियों से संवेदनशील और गोपनीय जानकारी हासिल करने का आरोप है।

जस्टिस गिरीश कथपालिया ने इस बात पर हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट तक से ज़मानत याचिकाएं खारिज होने के बावजूद पुलिस उसे गिरफ्तार नहीं कर पाई।

कोर्ट ने कहा कि आरोपी मनोज कुमार झा के खिलाफ लगे आरोपों, उसके आदतन अपराधी होने और सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने के बाद परिस्थितियों में कोई बदलाव न होने के कारण वह अग्रिम ज़मानत का हकदार नहीं है।

यह FIR पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 204, 337 और 340(2) के तहत दर्ज की गई।

दिल्ली पुलिस के अनुसार, झा ने सिविल सर्वेंट बनकर वरिष्ठ अधिकारियों से संवेदनशील और गोपनीय जानकारी हासिल करने की कोशिश की। उस पर पटना हाई कोर्ट का जज बनकर पेश होने का भी आरोप है।

अग्रिम ज़मानत की मांग करते हुए झा ने तर्क दिया कि हालांकि उसकी पिछली अग्रिम ज़मानत याचिकाएं 2024 और 2025 में खारिज हो गईं और 8 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट ने उसकी स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) खारिज कर दी थी, फिर भी जांच एजेंसी ने उसे गिरफ्तार नहीं किया।

उसने कहा कि इस तरह के व्यवहार से ही पता चलता है कि उसे हिरासत में लेकर पूछताछ करने की ज़रूरत नहीं है।

राज्य की ओर से पेश APP ने इस बात पर निराशा जताई कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा अग्रिम ज़मानत के लिए उपयुक्त मामला न माने जाने के बावजूद, पुलिस ने झा को गिरफ्तार करने के लिए कोई कार्रवाई नहीं की।

ज़मानत याचिका खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि झा हरियाणा, बिहार, पंजाब, चंडीगढ़ और CBI द्वारा दर्ज कई FIR में शामिल रहा है, जिनमें गलत पहचान बताना, धोखाधड़ी, जालसाजी और संबंधित अपराधों के आरोप हैं।

CBI के मामले में उस पर नेशनल हाईवे अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया (NHAI) का चेयरमैन बनकर एक व्यक्ति से 80 लाख रुपये की धोखाधड़ी करने का आरोप था; जांच के दौरान कथित तौर पर 200 सिम कार्ड बरामद हुए।

जस्टिस कथपालिया ने जब उन्हें राहत देने से इनकार किया तो उन्होंने हैरानी जताई कि सुप्रीम कोर्ट तक अग्रिम ज़मानत की कई अर्जियां खारिज होने के बावजूद, स्थानीय पुलिस ने झा को गिरफ़्तार करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया।

कोर्ट के मुताबिक, इस तरह के बर्ताव से ऐसा लगा कि झा की “मदद की जा रही थी और मामला जितना दिख रहा है, उससे कहीं ज़्यादा कुछ और है।”

कोर्ट ने कहा,

“इसलिए जानकारी और ज़रूरी कार्रवाई के लिए इस आदेश की एक कॉपी सीनियर स्टैंडिंग काउंसिल के ज़रिए संबंधित डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस को भेजी जाए।”

Title: MANOJ KUMAR JHA v. STATE GOVT OF NCT OF DELHI

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