सीनियर वकील दुष्यंत दवे ने शुक्रवार को आरोप लगाया कि सुप्रीम कोर्ट में कई भ्रष्ट जज रहे हैं, जिससे न्याय व्यवस्था को बहुत नुकसान पहुंचा है। उन्होंने आगे कहा कि न्याय व्यवस्था अमीर और ताकतवर लोगों के पक्ष में झुक गई और ऐसी कार्यपालिका (सरकार) का समर्थन कर रही है, जो और ज़्यादा ताकतवर हो गई है।

17वें के.एम. बशीर मेमोरियल लेक्चर, जिसका शीर्षक था "क्या हम संविधान को विफल कर रहे हैं या संविधान हमें विफल कर रहा है?", में दवे ने कहा कि हालांकि न्यायपालिका में "कुछ बेहतरीन जज" रहे हैं, लेकिन दूसरे जजों के व्यवहार ने "न्याय को बहुत नुकसान पहुंचाया"।

दवे ने कहा,

"न्यायपालिका में 48 साल तक वकील रहने के नाते मैं कह सकता हूं कि न्यायपालिका में कुछ बेहतरीन जज रहे हैं, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में इतने सारे भ्रष्ट जज रहे हैं कि अब मुझे उनकी गिनती भी याद नहीं रही।"

उन्होंने आगे कहा,

"मुझे गिनती याद नहीं है और उन्होंने सच में न्याय को बहुत नुकसान पहुंचाया है, क्योंकि न्याय एक बुनियादी मानवीय ज़रूरत है।"

दवे ने आरोप लगाया कि न्याय व्यवस्था अमीर और ताकतवर मुक़दमेबाज़ों की तरफ़ झुक गई है।

उन्होंने कहा,

"न्याय उनके हिसाब से तय होता है। अमीर और ताकतवर लोगों ने न्याय व्यवस्था पर कब्ज़ा कर लिया है। उनके मामलों की सुनवाई तेज़ी से होती है।"

उन्होंने आगे कहा कि बड़े औद्योगिक घरानों को अक्सर अपने पक्ष में फ़ैसले मिल जाते हैं।

उन्होंने कहा,

"उनके मामले हमेशा सफल होते हैं। आप अख़बार, बिज़नेस अख़बार खोलकर देखें तो पाएंगे कि सबसे बड़े औद्योगिक घरानों को हर दूसरे या तीसरे दिन अपने पक्ष में कोई न कोई फ़ैसला मिलता है। यह बहुत हैरानी की बात है कि वे सभी मामलों में कैसे सफल हो जाते हैं। वे कभी हारते नहीं हैं, लेकिन ऐसा ही हो रहा है।"

दवे ने न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्तों पर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था तेज़ी से ऐसी कार्यपालिका का समर्थन कर रही है, जो और ज़्यादा ताकतवर हो गई है। उन्होंने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनुच्छेद 32 के तहत अपनी संवैधानिक भूमिका का ठीक से पालन नहीं कर रहा है।

उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए अनुच्छेद 32 के तहत दखल नहीं दे रहा है। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका की मनमानी को लेकर चिंताएँ सिर्फ़ इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी की सरकार के समय तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए।

दवे ने कहा,

"ऐसा नहीं है कि इमरजेंसी के दौरान श्रीमती गांधी ज्यादतियों के लिए ज़िम्मेदार थीं, बल्कि पिछले 12 सालों में देश में जो हो रहा है, उससे हालात सचमुच बेकाबू होते जा रहे हैं। मौलिक अधिकार बहुत ज़रूरी हैं और अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट को इन अधिकारों को लागू करवाना होता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट दखल देने को तैयार नहीं है, भले ही उसे दिखे कि मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है।"

दवे ने SIR प्रक्रिया को लेकर सुप्रीम कोर्ट के रवैये की भी कड़ी आलोचना की और कहा कि सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग की वजह से वयस्क मताधिकार (Adult Franchise) खतरे में है।

दवे ने न्यायपालिका में विविधता की कमी की आलोचना की

दवे ने सुप्रीम कोर्ट के गठन का भी ज़िक्र किया और भारत के पूर्व चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की आलोचना की, क्योंकि उनके कार्यकाल में सुप्रीम कोर्ट में नियुक्त जजों में कोई महिला शामिल नहीं थी।

उन्होंने कहा,

"जस्टिस चंद्रचूड़, जो खुद को एक महान और उदारवादी जज बताते थे, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में सत्रह जजों की नियुक्ति की। उनमें से एक भी महिला नहीं थी।"

उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि न्यायिक प्रणाली के लिए समाज के अलग-अलग वर्गों से ज़्यादा प्रतिनिधित्व ज़रूरी है ताकि वे उस सामाजिक संदर्भ को समझ सकें जिसमें विवाद पैदा होते हैं।

दवे ने कहा,

"इस देश में ज़्यादातर जज ऊंची जातियों से आते हैं और उनमें से ज़्यादातर कानूनी बिरादरी से जुड़े होते हैं। जब तक आप समाज के अलग-अलग वर्गों से जज नियुक्त नहीं करेंगे, वे कभी भी उस संवेदनशीलता को नहीं समझ पाएंगे, जिसकी न्याय देने की प्रक्रिया में ज़रूरत होती है। न्याय देने का मतलब सिर्फ़ किसी न किसी रूप में फ़ैसला सुनाना नहीं है। इसका मतलब है समाज की समस्याओं को समझना और उन समस्याओं का ऐसा समाधान खोजना जो सिर्फ़ कानूनी ही नहीं, बल्कि निष्पक्ष और न्यायपूर्ण भी हो। इसके लिए ऐसे जजों की ज़रूरत है जो सचमुच समाज और उसके हर वर्ग की समस्याओं को समझ सकें।"

दवे ने आगे कहा कि न तो मीडिया और न ही न्यायपालिका नागरिकों की रक्षा कर रही है।

उन्होंने कहा,

"हमारी आवाज़ का कोई महत्व नहीं है क्योंकि जो दो स्तंभ हमारी रक्षा कर सकते हैं - मीडिया और न्यायपालिका - वे दोनों ही हमें बचाने में बुरी तरह नाकाम रहे हैं।"

मीडिया की आलोचना

दवे ने मीडिया की आलोचना उन व्यापक सामाजिक-आर्थिक समस्याओं के संदर्भ में की, जिन पर उन्होंने अपने भाषण में चर्चा की थी। उन्होंने बेरोजगारी, कृषि क्षेत्र की बदहाली और भारतीय कंपनियों द्वारा अपर्याप्त निवेश का ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि मीडिया जिस तरह से घटनाओं की रिपोर्टिंग कर रहा है, उसके कारण इन समस्याओं की जानकारी नागरिकों तक ठीक से नहीं पहुँच पा रही है।

दवे ने कहा,

"मीडिया की वजह से आज हम तक कोई अच्छी या सच्ची जानकारी नहीं पहुँच रही है। देश में गलत जानकारी फैलाने का एक बड़ा अभियान चल रहा है।"

उन्होंने कहा कि टेलीविज़न कवरेज में भारत के प्रदर्शन की हमेशा सकारात्मक तस्वीर ही दिखाई जाती है।

उन्होंने सवाल किया,

"टेलीविज़न पर आप बस यही देखते हैं कि हमारा देश कितना महान है। मेरा मतलब है, बेशक यह हमारे दिल में है। लेकिन क्या असल में ऐसा है?"

इसके बाद उन्होंने बड़े प्रोजेक्ट्स की घोषणा और उनके उद्घाटन का उदाहरण दिया। दवे ने कहा कि 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने खरबों रुपयों के प्रोजेक्ट्स का उद्घाटन किया। उन्होंने दावा किया कि ऐसे प्रोजेक्ट्स में से 20% भी असल में पूरे नहीं हुए।

उन्होंने कहा,

"लेकिन मीडिया इस बारे में कभी बात नहीं करता। सच सामने लाना मीडिया का काम है। यह काम हमारे - यानी आपके और मेरे जैसे नागरिकों - का नहीं है। यह काम उनका है कि वे इस बारे में बात करें।"

इसके बाद दवे ने खास तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मीडिया द्वारा की जाने वाली जांच-पड़ताल पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि मीडिया मोदी से "मुश्किल सवाल" नहीं पूछता और इसे प्रधानमंत्री के पारंपरिक प्रेस इंटरव्यू न देने से जोड़ा।

दवे ने कहा,

"लेकिन कोई भी मीडिया कभी भी मिस्टर मोदी से मुश्किल सवाल नहीं पूछता - और बेशक वे ऐसा कैसे कर सकते हैं, क्योंकि मिस्टर मोदी कभी इंटरव्यू नहीं देते, यानी असल इंटरव्यू नहीं देते।"

उन्होंने यह भी कहा कि मीडिया संगठनों के अपने हित होते हैं, क्योंकि उनके मालिक अमीर और ताकतवर लोग होते हैं।

दवे ने कहा,

“इसलिए वे मिस्टर मोदी और बीजेपी या किसी दूसरी राजनीतिक पार्टी के गलत कामों के खिलाफ भी कुछ नहीं बोलना चाहते। मुझे इसमें कोई शक नहीं है कि जिन राज्यों में विपक्षी पार्टियां सत्ता में हैं, वहां भी वे गलत काम कर रही हैं। वे हमेशा सही रास्ते पर नहीं होतीं।”

उन्होंने आगे कहा,

“हमारे प्रधानमंत्री ने 2014 से अब तक एक बार भी मीडिया का सामना नहीं किया। भारत में मीडिया असल में अमीर और ताकतवर लोगों के कंट्रोल में है, इसलिए ज़ाहिर है कि उनके अपने भी कई राज़ दबे हुए हैं।”

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