NDPS मामले में गिरफ़्तारी के कारण न बताए जाने पर ज़मानत मिल सकती है, भले ही धारा 37 की शर्तें पूरी न हों? सुप्रीम कोर्ट ने फ़ैसला सुरक्षित रखा
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर फ़ैसला सुरक्षित रख लिया कि क्या NDPS मामले में किसी आरोपी को संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ़्तारी के कारण न बताए जाने की वजह से ज़मानत दी जा सकती है, जबकि उसने अधिनियम की धारा 37 के तहत ज़मानत के लिए ज़रूरी दो कड़ी शर्तों को पूरा नहीं किया हो।
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने तमिलनाडु राज्य की उस अपील पर फ़ैसला सुरक्षित रखा, जिसमें मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत 50 किलो गांजा रखने के आरोप में गिरफ़्तार एक व्यक्ति को ज़मानत दी गई।
राज्य की याचिका में यह मुद्दा उठाया गया,
"क्या हाई कोर्ट NDPS Act की धारा 37 के तहत बताई गई कानूनी शर्तों पर निष्कर्ष दर्ज किए बिना, मुख्य रूप से गिरफ़्तारी के कारण बताने में कथित कमी के आधार पर ज़मानत दे सकता है?"
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 'जसकरण देओल बनाम पंजाब राज्य' मामले में इस बात पर ज़ोर दिया था कि जब किसी आरोपी को अनुच्छेद 22(1) के तहत उसके मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के कारण रिहा किया जाता है तो उसे ज़मानत पर रिहा नहीं किया जाता, बल्कि उसे गैर-कानूनी और असंवैधानिक हिरासत से आज़ाद किया जाता है। कोर्ट ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अनुच्छेद 22(1) सभी तरह के अपराधों पर लागू होता है, जिसमें IPC और विशेष NDPS Act के तहत अपराध भी शामिल हैं।
मौजूदा मामले में आरोपी विग्नेश को 19 अक्टूबर, 2025 को गिरफ़्तार किया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप है कि 50 किलो गांजा बरामद किया गया, जिसमें से 25 किलो विग्नेश से और बाकी 25 किलो सह-आरोपी से बरामद हुआ। उसे NDPS Act की धारा 8(c), 20(b)(ii)(C), 29(1) और 25 के तहत अपराधों के आरोप में गिरफ़्तार किया गया।
NDPS Act की धारा 52(1) के तहत विग्नेश को जारी गिरफ़्तारी मेमो में कहा गया,
"आपको अंबाटूर-सूरपट्टू टोल प्लाज़ा के पास गांजा रखने के अपराध के लिए गिरफ़्तार किया गया, जो सरकार द्वारा प्रतिबंधित एक नशीला पदार्थ है।"
स्पेशल NDPS कोर्ट ने उसकी ज़मानत अर्ज़ी यह कहते हुए खारिज की कि अपराध में कमर्शियल मात्रा शामिल थी और वह धारा 37 के तहत दो शर्तों को पूरा करने में नाकाम रहा है। इसके बाद वह मद्रास हाईकोर्ट गया।
हाईकोर्ट के सामने विग्नेश ने तर्क दिया कि गिरफ्तारी के आधारों के बारे में ठीक से जानकारी न दिए जाने के कारण वह ज़मानत के लिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाने और मेरिट के आधार पर अपना पक्ष मज़बूती से रखने में असमर्थ रहा।
हाईकोर्ट ने माना कि गिरफ्तारी मेमो की जानकारी में गिरफ्तारी के आधार बनने वाले बुनियादी तथ्यों को ठीक से नहीं बताया गया। कोर्ट ने गौर किया कि पुलिस को मिली शुरुआती जानकारी, उस जानकारी के आधार पर की गई तलाशी, प्रतिबंधित सामान की ज़ब्ती और अन्य संबंधित तथ्यों की जानकारी विग्नेश को नहीं दी गई।
हाईकोर्ट ने आर्टिकल 22(1) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का सहारा लिया, जिनमें विहान कुमार बनाम हरियाणा राज्य और मिहिर राजेश शाह बनाम महाराष्ट्र राज्य के मामले शामिल थे। कोर्ट ने दोहराया कि गिरफ्तारी के आधार आरोपी को ठीक से बताए जाने चाहिए और ऐसा न करने पर गिरफ्तारी और उसके बाद की रिमांड गैर-कानूनी हो सकती है।
राज्य ने तर्क दिया कि आरोपी को यह साबित करना होगा कि उसे नुकसान हुआ है या अपना बचाव करने का उचित मौका नहीं मिला। हाईकोर्ट ने पाया कि विग्नेश ने ऐसा नुकसान साबित कर दिया। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी की जानकारी में पुलिस को मिली शुरुआती जानकारी, उसे सूचित करने के बाद की गई तलाशी या ज़ब्ती महाज़र के तहत प्रतिबंधित सामान की ज़ब्ती का खुलासा करना ज़रूरी नहीं है।
हाईकोर्ट ने माना कि ये गिरफ्तारी के आधार बनने वाले बुनियादी तथ्य थे और इनकी जानकारी न देने के कारण विग्नेश ज़मानत के लिए ठीक से कोशिश करने और मेरिट के आधार पर अपना पक्ष रखने में असमर्थ रहा, जिससे आर्टिकल 22(1) का उल्लंघन हुआ।
हाईकोर्ट ने माना कि आरोपी को अपना बचाव करने का उचित मौका न देकर उसके साथ भेदभाव किया गया। इसलिए कोर्ट ने कहा कि आर्टिकल 22(1) के तहत गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देने की ज़रूरत का ठीक से पालन नहीं किया गया, जिससे उसकी हिरासत गैर-कानूनी हो गई।
इस तरह हाईकोर्ट ने 25,000 रुपये के बॉन्ड और दो ज़मानतदारों के साथ ज़मानत दे दी और विग्नेश को रोज़ाना पुलिस के सामने पेश होने का निर्देश दिया।
सुप्रीम कोर्ट में राज्य ने गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देने में "कथित" कमी पर हाईकोर्ट के भरोसे को चुनौती दी। राज्य का तर्क है कि इस मामले में NDPS Act की धारा 37 के तहत ज़मानत के लिए ज़रूरी कड़े नियमों का पालन नहीं किया गया।
राज्य की SLP में कहा गया कि हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित सामान की कमर्शियल मात्रा पर विचार नहीं किया और इस बात पर संतुष्टि ज़ाहिर नहीं की कि यह मानने के लिए उचित आधार थे कि विग्नेश दोषी नहीं था।
राज्य ने तर्क दिया,
"27.02.2026 के आदेश के ज़रिए, हाईकोर्ट ने प्रतिवादी को मुख्य रूप से इस आधार पर ज़मानत दी कि गिरफ्तारी मेमो और गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी में कथित तौर पर पर्याप्त विवरण नहीं दिए गए और आरोपी को नुकसान पहुंचाया गया। ज़मानत देते समय हाईकोर्ट इस बात पर विचार करने में विफल रहा कि मामले में नशीले पदार्थ की कमर्शियल मात्रा की बरामदगी शामिल है, इसलिए NDPS Act की धारा 37 में दी गई कानूनी रोक लागू होती थी। हाईकोर्ट ने ऐसा कोई निष्कर्ष दर्ज नहीं किया कि यह मानने के लिए उचित आधार थे कि प्रतिवादी उन अपराधों का दोषी नहीं था जिनका उस पर आरोप लगाया गया। साथ ही ऐसा कोई निष्कर्ष भी दर्ज नहीं किया गया कि ज़मानत पर रहने के दौरान प्रतिवादी के कोई अपराध करने की संभावना नहीं थी। इस प्रकार, NDPS एक्ट की धारा 37(1)(b)(ii) के तहत बताई गई दो ज़रूरी शर्तों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ कर दिया गया।"
राज्य का तर्क है कि हाईकोर्ट ने धारा 37 के तहत कानूनी रोक को नज़रअंदाज़ किया। राज्य ने तर्क दिया कि जब अपराध में कमर्शियल मात्रा शामिल होती है तो ज़मानत देना अतिरिक्त कानूनी ज़रूरतों के अधीन होता है।
राज्य ने तर्क दिया,
"भले ही यह मान लिया जाए - बिना यह स्वीकार किए - कि प्रक्रिया में कोई अनियमितता थी, फिर भी ऐसी स्थिति में प्रतिवादी को अपने-आप ज़मानत का अधिकार नहीं मिल जाता, जब तक कि धारा 37 के तहत दो ज़रूरी कानूनी शर्तों को पूरा करने वाला कोई निष्कर्ष न निकाला गया हो।"
सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को इस मामले में अपना आदेश सुरक्षित रख लिया।
Case Title : State of Tamil Nadu Rep By The Inspector of Police v. Vignesh