'ग्राम रोज़गार सेवक' का पद 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम' के तहत कोई 'वेतनभोगी पद' या 'लाभ का पद' नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-04-04 04:04 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि 'ग्राम रोज़गार सेवक' का पद 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958' के तहत कोई "वेतनभोगी पद" या "लाभ का पद" नहीं माना जाएगा। इसलिए इस पद पर काम करने वाले चुने हुए सदस्य को अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता। कोर्ट ने यह भी कहा कि ग्राम पंचायत का कोई भी चुना हुआ सदस्य, जो अपने पद पर रहते हुए 'ग्राम रोज़गार सेवक' के तौर पर भी काम करता है, उसे 'महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958' की धारा 14(1)(f) या (g) के तहत अयोग्य नहीं ठहराया जा सकता।

जस्टिस अजीत बी. कडेथंकर एक रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में ज़िला कलेक्टर और अतिरिक्त संभागीय आयुक्त द्वारा पारित उन आदेशों को चुनौती दी गई, जिनमें याचिकाकर्ता (जो ग्राम पंचायत का एक चुना हुआ सदस्य था) को अयोग्य घोषित कर दिया गया।

याचिकाकर्ता को अयोग्य घोषित करने का आधार यह आरोप था कि 02.05.2011 के एक सरकारी प्रस्ताव के तहत 'ग्राम रोज़गार सेवक' के तौर पर काम करते हुए याचिकाकर्ता ने "लाभ का पद" धारण किया और पंचायत के कामों में उसका अपना हित जुड़ा हुआ था। इस आधार पर उसके खिलाफ 1958 के अधिनियम की धारा 14(1)(f) और 14(1)(g) लागू होती थीं।

कोर्ट ने 'महाराष्ट्र रोज़गार गारंटी अधिनियम, 1977' और 'महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम, 2005' के तहत बनाए गए कानूनी ढांचे की जांच की। इसके साथ ही कोर्ट ने 02.05.2011 के उस सरकारी प्रस्ताव का भी अध्ययन किया, जिसके तहत 'ग्राम रोज़गार सेवकों' की नियुक्ति की जाती है।

कोर्ट ने पाया कि इस योजना में राज्य सरकार, ग्राम सभा और ग्राम पंचायत—तीनों के लिए अलग-अलग भूमिकाएं तय की गईं। इस योजना के तहत 'ग्राम रोज़गार सेवकों' को योजना के क्रियान्वयन और रिकॉर्ड रखने में सहायता करने के लिए आउटसोर्सिंग के आधार पर और अंशकालिक (Part-Time) तौर पर नियुक्त किया जाता है।

सरकारी प्रस्ताव का विश्लेषण करने के बाद कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि 'ग्राम रोज़गार सेवक' न तो राज्य सरकार के, न ही ज़िला परिषद, पंचायत समिति या ग्राम पंचायत के नियमित कर्मचारी होते हैं। उनकी सेवाएं अस्थायी, अंशकालिक और संविदात्मक (Contractual) प्रकृति की होती हैं। इसके अलावा, उनकी नियुक्ति पंचायत द्वारा नहीं, बल्कि ग्राम सभा द्वारा की जाती है। उन्हें जो मानदेय (Honorarium) दिया जाता है, वह भी पंचायत के कोष से नहीं, बल्कि किसी अन्य स्रोत से दिया जाता है।

कोर्ट ने फैसला दिया कि धारा 14(1)(f) के तहत अयोग्यता लागू होने के लिए यह दिखाना ज़रूरी है कि वह व्यक्ति कोई वेतन वाला पद या लाभ का पद रखता है, जो पंचायत के अधिकार या नियंत्रण में हो। "लाभ के पद" से जुड़े तय सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने नियुक्ति करने वाले अधिकारी, कर्तव्यों की प्रकृति और वेतन के स्रोत जैसे कारकों पर ज़ोर दिया। कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता के पास इस प्रावधान के अर्थ के अनुसार कोई "लाभ का पद" नहीं था।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...एक ग्राम पंचायत सदस्य द्वारा 'ग्रामीण रोज़गार सेवक' के तौर पर कमाया गया वेतन/मानदेय, पंचायत के आदेश पर किए गए किसी भी काम में, या पंचायत के साथ, पंचायत द्वारा, पंचायत की ओर से किए गए किसी भी अनुबंध में, या पंचायत के अधीन किसी भी रोज़गार में, धारा 14(1)(g) के अर्थ के अनुसार, कोई हिस्सा या हित नहीं माना जा सकता।"

'ग्राम रोज़गार सेवक' की भूमिका का विश्लेषण करते हुए कोर्ट ने फैसला दिया कि इस पूरी व्यवस्था में किसी भी स्तर पर 'ग्राम रोज़गार सेवक' की ऐसी कोई भूमिका या अवसर नहीं होता, जिससे उसे 1958 के अधिनियम की धारा 14(1)(f) के अर्थ के अनुसार कोई हित या हिस्सा प्राप्त हो सके।

तदनुसार, हाईकोर्ट ने रिट याचिका स्वीकार की, कलेक्टर और अतिरिक्त संभागीय आयुक्त के आदेशों को रद्द किया और यह फैसला दिया कि ग्राम पंचायत का कोई भी निर्वाचित सदस्य, जो अपने पद पर रहते हुए 'ग्राम रोज़गार सेवक' के तौर पर काम करता है, उसे महाराष्ट्र ग्राम पंचायत अधिनियम, 1958 की धारा 14(1)(f) या (g) के तहत अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता।

Case Title: Santosh v. The Additional Divisional Commissioner & Ors. [WRIT PETITION NO. 6776 OF 2024]

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