बढ़ती बेरोजगारी पर बॉम्बे हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, पढ़ी-लिखी पत्नी को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता

Update: 2026-05-21 05:57 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर पीठ ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल शिक्षित होने के आधार पर किसी पत्नी को गुजारा भत्ता देने से इनकार नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा कि वर्तमान समय में बेरोजगारी इतनी बढ़ गई है कि उच्च डिग्री और विशेषज्ञता रखने वाले लोग भी नौकरी पाने में असफल हो रहे हैं।

जस्टिस उर्मिला जोशी फाल्के ने पति की उस दलील को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि उसकी पत्नी स्नातकोत्तर तक पढ़ी-लिखी है और खुद अपना पालन-पोषण कर सकती है।

अदालत ने अपने आदेश में कहा,

“यह पति का मामला नहीं है कि पत्नी कहीं नौकरी कर रही है या उसकी कोई आमदनी है। वर्तमान समय में बेरोजगारी को देखते हुए केवल शिक्षित होना इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि वह स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है।”

हाईकोर्ट ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 सामाजिक न्याय का प्रावधान है, जिसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को दर-दर भटकने और अभाव की स्थिति से बचाना है।

अदालत ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का मकसद किसी व्यक्ति को उसके पुराने व्यवहार के लिए दंडित करना नहीं, बल्कि जरूरतमंद आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा देना है।

मामला उस पति की याचिका से जुड़ा था जिसने परिवार न्यायालय के आदेश को चुनौती दी थी।

फैमिली कोर्ट ने पति को अक्टूबर 2017 से दिसंबर 2020 तक पत्नी को 10 हजार रुपये और बेटी को 5 हजार रुपये प्रतिमाह देने का निर्देश दिया था। इसके बाद जनवरी 2021 से दिसंबर 2023 तक यह राशि बढ़ाकर पत्नी के लिए 12 हजार और बेटी के लिए 7 हजार रुपये कर दी गई थी। जनवरी 2024 से पत्नी को 15 हजार और बेटी को 10 हजार रुपये देने का आदेश भी दिया गया था।

पति ने दलील दी थी कि विवाह विच्छेद से जुड़े मामले में पहले ही अलग से भरण-पोषण तय किया जा चुका है। हालांकि, हाईकोर्ट ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए आदेश दिया कि दिसंबर 2023 के बाद भी पत्नी को 12 हजार और बेटी को 7 हजार रुपये दिए जाएं।

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि तलाक संबंधी मामले में तय भरण-पोषण से अलग होगी।

इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने पति की याचिका का निपटारा कर दिया।

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