“नाम में हुई क्लर्क की गलती कानूनी अधिकार को खत्म नहीं कर सकती”: बॉम्बे हाईकोर्ट ने रेलवे दुर्घटना में मौत के मुआवज़े के दावे पर फिर से विचार करने का आदेश दिया
बॉम्बे हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया कि रेलवे दुर्घटना से जुड़े मुआवज़े के दावे को सिर्फ़ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि सीज़न टिकट पर यात्री के नाम में कोई छोटी-मोटी गलती है, जबकि टिकट पर लिखा पहचान पत्र (ID) नंबर यात्री की पहचान की पुष्टि करता हो। कोर्ट ने कहा कि अगर यात्री की पहचान रेलवे अधिकारियों द्वारा जारी पहचान पत्र जैसे भरोसेमंद सबूतों से साबित हो जाती है तो टिकट पर नाम में हुई क्लर्क की गलती या अधूरा नाम छपा होने से मुआवज़े का दावा करने का कानूनी अधिकार खत्म नहीं हो जाता।
जस्टिस जितेंद्र जैन मृतक यात्री के कानूनी वारिसों द्वारा दायर पहली अपील पर सुनवाई कर रहे थे। इस अपील में रेलवे दावा अधिकरण (Railway Claims Tribunal) के 5 सितंबर 2014 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत उनके मुआवज़े के दावे को खारिज कर दिया गया। अधिकरण ने यह तो मान लिया कि रेलवे अधिनियम के तहत “अप्रत्याशित घटना” के कारण ही मौत हुई, लेकिन उसने इस आधार पर दावा खारिज कर दिया कि रेलवे पहचान पत्र पर लिखा नाम, मासिक सीज़न टिकट पर छपे नाम से मेल नहीं खाता था। यह भी कि मृतक और दावा करने वालों के बीच के रिश्ते को पूरी तरह से साबित नहीं किया जा सका। अपील करने वालों ने दलील दी कि मृतक के पास एक वैध रेलवे पहचान पत्र था, जिस पर उसकी तस्वीर और पूरा नाम “राधेश्याम सेन नुवाब” लिखा था। दावा करने वालों द्वारा पेश किए गए मासिक सीज़न टिकट पर नाम “राधेश्याम” लिखा था।
कोर्ट ने कहा कि जब कोई यात्री मासिक सीज़न टिकट खरीदता है तो उसे टिकट काउंटर पर अपना पहचान पत्र दिखाना होता है। उसी पहचान पत्र में दी गई जानकारी के आधार पर टिकट जारी किया जाता है। इस मामले में टिकट पर वही पहचान पत्र नंबर लिखा था, जो रेलवे पहचान पत्र पर था; इससे यह पक्के तौर पर साबित हो गया कि टिकट उसी व्यक्ति के नाम पर जारी किया गया।
कोर्ट ने कहा:
“अगर काउंटर पर बैठा अधिकारी पहचान पत्र में लिखे पूरे नाम के बजाय सिर्फ़ पहला नाम ही टिकट पर डालता है तो भी यह नहीं कहा जा सकता कि मासिक सीज़न टिकट उस व्यक्ति के नाम पर जारी नहीं किया गया, जिसके नाम पर पहचान पत्र जारी किया गया।”
कोर्ट ने अधिकरण के इस निष्कर्ष की भी जांच की कि मृतक और दावा करने वालों के बीच का रिश्ता साबित नहीं हो पाया। अपील करने वालों ने इस रिश्ते को साबित करने के लिए राशन कार्ड, वोटर कार्ड और अन्य दस्तावेज़ पेश किए। हाईकोर्ट ने यह पाया कि ट्रिब्यूनल ने इन दस्तावेज़ों की विस्तार से जांच नहीं की थी और उन्हें खारिज करने के लिए कोई विस्तृत कारण भी नहीं बताया।
इसलिए कोर्ट ने यह माना कि ट्रिब्यूनल ने पहचान पत्र और सीज़न टिकट पर लिखे नामों में अंतर होने के एकमात्र आधार पर दावे को खारिज करके गलती की थी।
तदनुसार, हाईकोर्ट ने यात्री के नाम में विसंगति के संबंध में ट्रिब्यूनल के निष्कर्ष को पलटते हुए अपील का निपटारा किया, और रेलवे दावा ट्रिब्यूनल को निर्देश दिया कि वह रिश्ते के मुद्दे पर फिर से सुनवाई करे। यदि दावेदार पात्र पाए जाते हैं तो मुआवज़ा देने के लिए उचित आदेश पारित करे।
Case Title: Rekha Rupchand Singh (Deleted) & Ors. v. Union of India [First Appeal No. 471 of 2016]