'अपनी मर्ज़ी से फ़ैसला लेने में कानूनी तौर पर सक्षम': बॉम्बे हाईकोर्ट ने ज़बरदस्ती शादी से बचने के लिए घर छोड़ने वाली बालिग़ महिला की मदद की

Update: 2026-07-08 14:25 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि 21 साल की बालिग़ महिला कानूनी तौर पर यह तय करने में सक्षम है कि वह कहां रहना चाहती है और किससे शादी करना चाहती है। इसलिए उसके माता-पिता और राज्य उसे उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई फ़ैसला लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकते। कोर्ट ने मुंबई पुलिस को निर्देश दिया कि वह एक युवा मुस्लिम महिला के बारे में 'गुमशुदा व्यक्ति' की शिकायत पर कार्रवाई न करें, जिसने अपने माता-पिता की पसंद के अनुसार शादी से बचने के लिए हैदराबाद में अपना घर छोड़ दिया था।

एक्टिंग चीफ़ जस्टिस रवींद्र घुगे और जस्टिस गौतम अंखाड की डिवीज़न बेंच ने देखा कि याचिकाकर्ता महिला अपने हैदराबाद स्थित घर से भागकर मुंबई आई थी, ताकि वह अपने माता-पिता की इच्छा के अनुसार अपने चचेरे भाई (जो उससे 10 साल बड़ा है) से शादी करने से बच सके।

महिला ने दावा किया कि जब वह 2 महीने की थी, तब उसके असली माता-पिता ने उसे उसके मामा-मामी को गोद दे दिया था और तब से उसके 'पालक' माता-पिता ही उसे 'कंट्रोल' करते रहे हैं।

इसलिए 15 जून को महिला हैदराबाद स्थित अपने घर से भाग गई, फ़्लाइट से कोल्हापुर पहुंची और वहां से बस पकड़कर मुंबई आई। शहर में पहुंचकर वह पवई पुलिस स्टेशन गई और उनसे अनुरोध किया कि अगर उसके पालक माता-पिता कोई 'गुमशुदा व्यक्ति' की शिकायत दर्ज कराते हैं तो उस पर कार्रवाई न की जाए, क्योंकि उसने अपनी मर्ज़ी से अपना घर छोड़ा है।

इसके बाद उसने सीनियर वकील मिहिर देसाई और वकील देवयानी कुलकर्णी के ज़रिए डिवीज़न बेंच में याचिका दायर की और जजों से उचित निर्देश जारी करने का आग्रह किया, क्योंकि वह अपने पालक माता-पिता के पास वापस नहीं लौटना चाहती और न ही अपने से बड़े चचेरे भाई से शादी करना चाहती है।

जजों ने महिला और उसके माता-पिता से विस्तार से बातचीत की और इस बात पर संतोष व्यक्त किया कि याचिकाकर्ता ने अपनी मर्ज़ी से अपना घर छोड़ा है और वह अपनी स्वतंत्र इच्छा से काम कर रही है।

जजों ने कहा,

"वह 21 साल की बालिग़ है और कानूनी तौर पर यह तय करने में सक्षम है कि वह कहां रहना चाहती है, क्या शादी करना चाहती है और क्या आगे की पढ़ाई करना चाहती है। ये निजी पसंद के मामले हैं और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत अधिकारों का हिस्सा हैं। न तो उसके माता-पिता और न ही राज्य उसे उसकी मर्ज़ी के खिलाफ़ उसके माता-पिता के घर लौटने के लिए मजबूर कर सकते हैं। याचिकाकर्ता के माता-पिता द्वारा 2 जुलाई 2026 को दिए गए हलफ़नामे में कही गई बातें मान ली गईं। फिर भी ऐसे वादे याचिकाकर्ता की पसंद से ऊपर नहीं हो सकते, जिसे उसने इस अदालत के सामने बार-बार दोहराया है।"

इसलिए जजों ने माना कि याचिकाकर्ता को 'गुमशुदा व्यक्ति' मानने या उसे हैदराबाद वापस लाने के लिए किसी भी ज़बरदस्ती वाली प्रक्रिया को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है।

जजों ने आदेश दिया,

"चूंकि हमने व्यक्तिगत रूप से याचिकाकर्ता से बात की है और हम संतुष्ट हैं कि वह अपनी मर्ज़ी से काम कर रही है, इसलिए तेलंगाना पुलिस कानून के अनुसार याचिकाकर्ता के माता-पिता द्वारा दर्ज कराई गई गुमशुदा व्यक्ति की रिपोर्ट को बंद करने के लिए उचित कदम उठाएगी। याचिकाकर्ता को सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से अपने माता-पिता के घर लौटने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा और न ही आपराधिक कार्यवाही या किसी अन्य तरीके से उस पर कोई दबाव डाला जाएगा।"

इन बातों के साथ जजों ने याचिका का निपटारा किया।

Case Title: XYZ vs State of Maharashtra (Criminal Writ Petition 3151 of 2026)

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