मोटर दुर्घटना मुआवजा घटाने के लिए आयकर कानून के 'समायोजन' नियम लागू नहीं किए जा सकते : बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना में मुआवजा तय करते समय आयकर कानून के तहत आय और हानि के समायोजन (सेट-ऑफ) के नियम लागू नहीं किए जा सकते।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आयकर कानून और मोटर वाहन अधिनियम अलग-अलग उद्देश्यों के लिए बनाए गए, इसलिए आयकर कानून के प्रावधानों का उपयोग कर दुर्घटना पीड़ितों के आश्रितों को मिलने वाला मुआवजा कम नहीं किया जा सकता।
जस्टिस जितेंद्र जैन एक चिकित्सक की सड़क दुर्घटना में मृत्यु के बाद उनकी पत्नी और बच्चों की ओर से दायर अपील पर सुनवाई कर रहे थे।
याचिकाकर्ताओं ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण द्वारा तय किए गए मुआवजे में बढ़ोतरी की मांग की थी।
मामले में अधिकरण ने मृतक की आय का निर्धारण करते समय उनके आयकर रिटर्न के आधार पर व्यावसायिक आय में मकान ऋण पर चुकाए गए ब्याज से हुई हानि को समायोजित कर औसत आय निकाली थी।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवजा तय करते समय ऐसा समायोजन नहीं किया जा सकता।
वही बीमा कंपनी ने दलील दी कि मकान ऋण का ब्याज चुकाने के बाद बची वास्तविक आय ही आश्रितों के उपयोग में आती, इसलिए उसी के आधार पर मुआवजा तय किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि मोटर वाहन अधिनियम का उद्देश्य पीड़ित परिवार को उचित मुआवजा देना है ताकि वे आर्थिक रूप से उसी स्थिति के करीब पहुंच सकें, जिसमें मृतक के जीवित रहने पर होते।
अदालत ने कहा,
"आयकर कानून की धारा 71 का उद्देश्य किसी व्यक्ति की शुद्ध आय के आधार पर कर देयता तय करना है। इसलिए उसमें आय और हानि के समायोजन का प्रावधान किया गया है। लेकिन इन प्रावधानों को यांत्रिक रूप से लागू कर मोटर वाहन अधिनियम के तहत मिलने वाला उचित मुआवजा कम नहीं किया जा सकता।"
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि मकान, पूंजीगत संपत्ति या अन्य स्रोतों से होने वाली आय व्यक्ति की मृत्यु के बाद भी जारी रहती है। इसलिए मुआवजा तय करते समय केवल वही आय महत्वपूर्ण है जो मृतक अपने व्यक्तिगत कौशल, पेशे या व्यवसाय से अर्जित करता था।
अदालत ने मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के उस आदेश को भी गलत ठहराया, जिसमें ब्याज केवल उस तारीख से देने का निर्देश दिया गया, जब सही बीमा कंपनी को मामले में पक्षकार बनाया गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 171 के अनुसार सामान्यतः ब्याज दावा याचिका दायर किए जाने की तारीख से ही देय होता है।
इन्हीं निष्कर्षों के आधार पर हाईकोर्ट ने अधिकरण की आय निर्धारण की पद्धति को रद्द करते हुए मृतक की केवल व्यावसायिक आय के आधार पर मुआवजे का पुनर्निर्धारण किया।
अदालत ने याचिकाकर्ताओं को 17,58,465 रुपये अतिरिक्त मुआवजा, दावा याचिका दायर करने की तारीख से ब्याज सहित देने का निर्देश दिया।