RBI कर्मचारी की याचिका की सुनवाई से जज को सिर्फ़ इसलिए अलग होने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि वे पहले RBI के वकील रह चुके हैं: बॉम्बे हाईकोर्ट
बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक याचिकाकर्ता की मांग खारिज की, जिसमें कहा गया कि जज को मामले की सुनवाई से अलग हो जाना चाहिए, सिर्फ़ इसलिए क्योंकि वकालत के दौरान वे रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया (RBI) के वकील रह चुके थे। कोर्ट ने कहा कि अगर ऐसी दलील को सामान्य सिद्धांत के तौर पर मान लिया जाए तो ऐसे किसी भी जज के लिए, जिसने अपनी कानूनी प्रैक्टिस के दौरान सरकार या सार्वजनिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व किया हो, बेंच में आने के बाद उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई करना असंभव हो जाएगा; यह बात कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ़ है।
जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी और जस्टिस आरती साठे की डिवीज़न बेंच RBI के एक पूर्व कर्मचारी द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें उसकी सेवा समाप्त करने और उसके बाद सरकारी आवास से बेदखल करने के आदेश को चुनौती दी गई। शुरुआत में ही, RBI ने याचिका की स्वीकार्यता पर आपत्ति जताई।
RBI का तर्क था कि याचिकाकर्ता ने ज़रूरी तथ्यों को छिपाया था; उसने यह नहीं बताया कि सर्विस क्वार्टर में रहने से जुड़े मामले में पहले दायर की गई रिट याचिका हाईकोर्ट ने खारिज कर दी और सुप्रीम कोर्ट ने भी उसकी स्पेशल लीव पिटिशन (SLP) खारिज की थी।
कोर्ट को यह आपत्ति सही लगी। कोर्ट ने कहा कि रिट अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाले याचिकाकर्ता को सभी ज़रूरी तथ्यों का पूरा खुलासा करना चाहिए। कोर्ट ने दोहराया कि ज़रूरी तथ्यों को छिपाने पर याचिकाकर्ता संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत विवेकाधीन राहत पाने का हकदार नहीं रह जाता।
बेंच ने यह भी कहा कि RBI स्टाफ रेगुलेशंस, 1948 के तहत याचिकाकर्ता के पास अपनी सेवा समाप्त करने के आदेश के खिलाफ़ अपील करने का प्रभावी उपाय मौजूद था। चूंकि विवाद में तथ्यों से जुड़े ऐसे सवाल शामिल थे, जिनकी बेहतर जांच अपीलीय प्राधिकरण द्वारा की जा सकती थी, इसलिए कोर्ट ने रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया। साथ ही कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चार हफ़्ते के भीतर कानूनी उपाय अपनाने की छूट दी।
इन मुद्दों पर चर्चा के दौरान, याचिकाकर्ता ने कथित तौर पर कोर्ट में हंगामा किया और मांग की कि जस्टिस जी.एस. कुलकर्णी मामले की सुनवाई से अलग हो जाएं, क्योंकि वह पहले RBI के वकील रह चुके थे।
इस अनुरोध को खारिज करते हुए बेंच ने कहा कि ऐसी दलील पूरी तरह से अस्वीकार्य है। बेंच ने कहा कि अगर इसे नियम के तौर पर मान लिया जाए तो ऐसे किसी भी जज के लिए, जिसने वकील के तौर पर प्रैक्टिस करते समय सरकार या सार्वजनिक संस्थाओं का प्रतिनिधित्व किया हो, बेंच में आने के बाद उनसे जुड़े मामलों की सुनवाई करना असंभव हो जाएगा। कोर्ट ने कहा कि सुनवाई से अलग होने की यह मांग कानून के स्थापित सिद्धांतों के खिलाफ़ थी।
कोर्ट ने कहा,
"इस तरह की दलील किसी भी पैमाने पर स्वीकार्य नहीं है। अगर इसे कोई नियम मान लिया जाए तो वकालत के दौरान सरकार या सरकारी संस्थाओं की ओर से पेश होने वाले किसी भी जज के लिए सरकार या सरकारी संस्थाओं से जुड़े किसी भी मामले को हाथ में लेना असंभव हो जाएगा।"
इसलिए कोर्ट ने रिट याचिका पर सुनवाई करने से इनकार किया।
Case Title: Paartha Sharathi v. Competent Authority, Reserve Bank of India & Ors. [Writ Petition No. 6359 of 2026]