बॉम्बे हाईकोर्ट ने 'चमत्कारी इलाज' के दावों पर ईसाई प्रार्थना कार्यक्रम को आधी रात में रद्द करने का आदेश रद्द किया, 'काला जादू एक्ट' के पालन का निर्देश दिया

Update: 2026-03-16 13:42 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिछले हफ़्ते आदेश रद्द किया, जिसके तहत सांगली पुलिस ने 'होप ऑफ़ ग्लोरी मिनिस्ट्री ट्रस्ट' को 13 मार्च से 15 मार्च तक 'महाराष्ट्र प्रार्थना महोत्सव' आयोजित करने के लिए दी गई अनुमति 'अचानक' रद्द कर दी थी। इस कार्यक्रम में मशहूर प्रचारक पॉल दिनाकरन ने 50,000 से ज़्यादा लोगों के सामने 'भविष्यवाणी वाले' संदेश दिए थे और रोज़ाना प्रार्थनाएं करवाई थीं।

पुलिस ने कार्यक्रम के पहले दिन (13 मार्च) के बाद अनुमति रद्द करते हुए आरोप लगाया कि 'महाराष्ट्र मानव बलि और अन्य अमानवीय, बुराई और अघोरी प्रथाओं और काला जादू रोकथाम और उन्मूलन अधिनियम, 2013' (काला जादू एक्ट) के प्रावधानों का उल्लंघन किया जा रहा था, क्योंकि लोग भाषणों में यह दावा कर रहे थे कि कैंसर और हर्निया जैसी गंभीर बीमारियाँ 'यीशु' (Jesus) से प्रार्थना करने से ठीक हो गईं।

जस्टिस माधव जामदार और जस्टिस प्रवीण पाटिल की एक डिवीज़न बेंच ने 14 मार्च को कोल्हापुर में एक विशेष सुनवाई के दौरान, आयोजकों द्वारा इस मुद्दे पर दी गई सफ़ाई पर गौर किया, जिसमें कहा गया कि "ज़्यादा से ज़्यादा इसे इस तरह समझा जा सकता है कि मेडिकल इलाज के अलावा, उन मरीज़ों ने प्रार्थनाएँ भी कीं, जिससे उनका आत्मविश्वास बढ़ा और परिणामस्वरूप उनकी सेहत में सुधार हुआ।"

जजों ने कहा,

"यह एक ऐसा मामला है, जहां 7 मार्च 2026 को पुलिस ने अनुमति दी थी। उसके बाद 9 मार्च 2026 को वह अनुमति रद्द की गई। फिर 12 मार्च, 2026 को दोबारा अनुमति दी गई। इसी के अनुसार, 13 मार्च 2026 को कार्यक्रम आयोजित किया गया। यह कार्यक्रम 13 मार्च, 2026 से 15 मार्च, 2026 तक चलना था। हालांकि, अचानक 14 मार्च 2026 को सुबह 02:00 बजे पुलिस ने आयोजकों को सूचित किया कि अनुमति रद्द की जा रही है। यह रद्दीकरण अचानक किया गया। यह ध्यान रखना ज़रूरी है कि इस कार्यक्रम में लगभग 50,000 लोग शामिल हो रहे हैं।"

बेंच ने गौर किया कि पुलिस ने भी आयोजकों के खिलाफ जनता को 'गुमराह' करने और काला जादू अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन करने के आरोप में FIR दर्ज की। बेंच ने राय दी कि अगर पूरी FIR को ज्यों का त्यों भी पढ़ा जाए, तो भी यह साफ हो जाता है कि पुलिस अधिकारियों का भी यह दावा नहीं है कि वहाँ कानून-व्यवस्था की कोई स्थिति बिगड़ी है।

बेंच ने अपने आदेश में कहा,

"हमारे सामने भी यह दावा नहीं किया गया कि कानून-व्यवस्था बिगड़ी है। असल में, रिकॉर्ड में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिससे यह पता चले कि उस कार्यक्रम में कोई ऐसा बयान दिया गया हो, जिससे कानून-व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो, या किसी दूसरे धर्म, धार्मिक स्थलों या दूसरे धर्म के लोगों की धार्मिक मान्यताओं की कोई आलोचना की गई हो। रिकॉर्ड से साफ पता चलता है कि अधिकारी गैर-कानूनी और गलत इरादे से काम कर रहे हैं। यह बिल्कुल साफ है कि उस कार्यक्रम के लिए इकट्ठा हुए नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है।"

जजों ने आगे कहा,

"याचिकाकर्ता-ट्रस्ट के सदस्य और अन्य लोग—यानी लगभग 50,000 लोग—जो उस कार्यक्रम के लिए इकट्ठा हुए, वे भारत के नागरिक हैं। इसलिए अचानक कार्यक्रम रद्द कर देना उनके 'जीवन के मौलिक अधिकार' का उल्लंघन है, जिसमें गरिमा के साथ जीने का अधिकार भी शामिल है। यह उनकी 'अंतरात्मा की स्वतंत्रता' का अधिकार है। अपने धर्म को मानने, उसका पालन करने और उसका प्रचार करने का अधिकार है। बेशक, यह अधिकार सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य तथा कानून के अन्य प्रावधानों के अधीन होना चाहिए।"

कैंसर और हर्निया जैसी बीमारियों के इलाज के संबंध में किए गए कथित दावों को लेकर पुलिस के तर्क के संबंध में जजों ने याचिकाकर्ता-ट्रस्ट के चेयरमैन—दिलीप भोरे—को तुरंत अदालत में एक लिखित वचन (Undertaking) देने का निर्देश दिया। इस वचन में उन्हें यह कहना था कि "वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उस कार्यक्रम के आयोजन के दौरान, काला जादू अधिनियम के प्रावधानों का उल्लंघन न हो।"

इन टिप्पणियों के साथ बेंच ने याचिका का निपटारा किया।

Case Title: Hope of Glory Ministry Trust vs State of Maharashtra [Writ Petition (Stamp) 2125 of 2026]

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