'रिश्तेदार को घर से निकालने के लिए सीनियर सिटिज़न का आवेदन, बिना किसी आर्थिक मदद की मांग के भी मान्य': बॉम्बे हाईकोर्ट

Update: 2026-03-11 16:48 GMT

बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि किसी सीनियर सिटिज़न द्वारा अपने बच्चे या रिश्तेदार को उस प्रॉपर्टी से निकालने के लिए दायर किया गया आवेदन मान्य है, जिसमें सीनियर सिटिज़न का अधिकार है, भले ही उसने किसी आर्थिक मदद की मांग न की हो। कोर्ट ने कहा कि 'माता-पिता और सीनियर सिटिज़न के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत "भरण-पोषण" की परिभाषा में सीनियर सिटिज़न के लिए एक सामान्य और गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए ज़रूरी रहने की जगह और सुरक्षा का प्रावधान भी शामिल है।

जस्टिस एन. जे. जमादार भोलेनाथ मेवालाल निषाद द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में उन्होंने भरण-पोषण ट्रिब्यूनल के उस आदेश को चुनौती दी, जिसमें उन्हें अपनी 73 वर्षीय सीनियर सिटिज़न मां के रिहायशी फ्लैट को खाली करने का निर्देश दिया गया। घर खाली करने का यह आदेश 4 मार्च 2025 को भरण-पोषण ट्रिब्यूनल ने 'माता-पिता और सीनियर सिटिज़न के भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007' के तहत पारित किया था, और बाद में 30 अक्टूबर 2025 को अपीलीय ट्रिब्यूनल ने भी अपने फैसले में इसे सही ठहराया। याचिकाकर्ता ने इस आवेदन का विरोध करते हुए तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल केवल भरण-पोषण से जुड़े आवेदनों पर ही सुनवाई कर सकता है। वह सीधे-सीधे घर खाली कराने का आदेश नहीं दे सकता।

हाईकोर्ट ने 'सीनियर सिटिज़न अधिनियम, 2007' के कानूनी प्रावधानों की जांच की और पाया कि धारा 2(b) के तहत "भरण-पोषण" की परिभाषा में भोजन, कपड़े, रहने की जगह और मेडिकल देखभाल का प्रावधान भी शामिल है। कोर्ट ने कहा कि इस अधिनियम का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सीनियर सिटिज़न एक सामान्य, गरिमापूर्ण और सुरक्षित जीवन जी सकें। इसलिए बच्चों या रिश्तेदारों का उन्हें सहारा देने का दायित्व केवल आर्थिक मदद देने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इससे कहीं आगे तक फैला हुआ है।

इस बात पर ज़ोर देते हुए कि यह अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है, जिसे बुज़ुर्गों को उपेक्षा और उत्पीड़न से बचाने के लिए बनाया गया, कोर्ट ने फैसला दिया कि धारा 4 के तहत बच्चों या रिश्तेदारों पर जो दायित्व डाला गया, उसमें सीनियर सिटिज़न को उनकी अपनी प्रॉपर्टी में शांतिपूर्वक रहने देना भी शामिल है। कोर्ट ने इस बात पर भी रोशनी डाली कि भरण-पोषण की परिभाषा में सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों तरह के दायित्व शामिल हैं और बच्चों/रिश्तेदारों पर यह दायित्व भी है कि वे किसी सीनियर सिटिज़न को उनके अपने ही घर से बेदखल न करें।

कोर्ट ने आगे कहा कि यह कोई पक्का नियम नहीं बनाया जा सकता कि घर खाली कराने का आवेदन सिर्फ इसलिए मान्य नहीं होगा, क्योंकि सीनियर सिटिज़न ने किसी आर्थिक मदद की मांग नहीं की है। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की व्याख्या से, इस एक्ट का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाएगा।

कोर्ट ने कहा,

"...यह एक अटल और पूर्ण कानूनी नियम के तौर पर तय नहीं किया जा सकता कि सिर्फ़ बेदखली के लिए दिया गया आवेदन—जिसमें गुज़ारा-भत्ता (Maintenance) की मांग न हो—मान्य नहीं है; भले ही वह सीनियर सिटिज़न यह दावा करे कि उसे उसकी प्रॉपर्टी से बेदखल कर दिया गया है, या उसे एक सामान्य जीवन जीने के लिए उस प्रॉपर्टी से आमदनी करने की ज़रूरत है।"

यह मानते हुए कि गुज़ारा-भत्ता ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल ने सीनियर सिटिज़न के रहने के अधिकार और गरिमापूर्ण जीवन की रक्षा के लिए अपने अधिकार क्षेत्र का सही इस्तेमाल किया, हाईकोर्ट ने बेदखली के आदेश में दखल देने से इनकार किया और रिट याचिका खारिज की।

Case Title: Bholenath Mevalal Nishad v. Shyamdulari Mevalal Nishad & Ors. [Writ Petition No. 16375 of 2025]

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