शिक्षा मित्र प्री-TET इन-सर्विस शिक्षकों के बराबर होने का अधिकार नहीं, उन्हें बाहर रखना अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि इन-सर्विस शिक्षकों (सेवा में पहले से मौजूद शिक्षकों) के लिए आयोजित 'स्पेशल टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट' (Special TET) से शिक्षा मित्रों को बाहर रखना भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 का उल्लंघन नहीं है।
कोर्ट ने कहा कि जब 'टीचर एलिजिबिलिटी टेस्ट' (TET) अनिवार्य किया गया, तब जो शिक्षक पहले से सेवा में थे, वे एक अलग श्रेणी (class) में आते हैं। 'स्पेशल TET' अंतरिम उपाय है, जो उस श्रेणी के शिक्षकों को वह योग्यता हासिल करने में मदद करता है, जो सेवा में आने के बाद उन पर लागू की गई।
2.9.2026 के सरकारी आदेश में उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग, प्रयागराज को 'स्पेशल TET' आयोजित करने का निर्देश दिया गया। आयोग की 3.9.2026 की अधिसूचना में इसे 3.11.2026 से शुरू करने का कार्यक्रम तय किया गया। इसमें पात्रता केवल सेवा में मौजूद शिक्षकों की कुछ खास श्रेणियों तक सीमित थी, जिनमें कॉन्ट्रैक्ट या दिहाड़ी पर 'विशेष जरूरतों वाले बच्चों' (Children with Special Needs) के लिए रखे गए विशेष शिक्षक शामिल थे। शिक्षा मित्रों को इसमें शामिल नहीं किया गया।
जस्टिस मंजू रानी चौहान ने कहा,
"सवाल उठाया गया सरकारी आदेश न तो नई भर्ती प्रक्रिया को नियंत्रित करने वाला कोई उपाय है, और न ही यह उम्मीदवारों की किसी एक श्रेणी के पक्ष में नियुक्ति या प्रमोशन का कोई विशेष रास्ता बनाता है। इसका मकसद केवल उन शिक्षकों को योग्यता पूरी करने का मौका देना है, जो पहले से सेवा में हैं और जिनके लिए सुप्रीम कोर्ट ने NCTE की अधिसूचना को ध्यान में रखते हुए सेवा में बने रहने के लिए यह योग्यता अनिवार्य मानी है। याचिकाकर्ता स्पष्ट रूप से इन-सर्विस शिक्षकों का दर्जा नहीं रखते, इसलिए उस श्रेणी के बराबर होने का दावा नहीं कर सकते, जिससे वे संबंधित नहीं हैं।"
उत्तर प्रदेश के अलग-अलग जिलों में काम कर रहे 221 शिक्षा मित्रों (याचिकाकर्ताओं) ने कहा कि वे लगभग 26 वर्षों से 'बोर्ड ऑफ बेसिक एजुकेशन' द्वारा चलाए जा रहे प्राइमरी और अपर-प्राइमरी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं। उन्होंने सरकारी आदेश और विज्ञापन को उस हद तक रद्द करने की मांग की, जिस हद तक उन्होंने उन्हें परीक्षा में शामिल होने से रोका था। उनके वकील ने तर्क दिया कि उन्हें उन श्रेणियों से अलग करने का कोई ठोस आधार नहीं है, जिन्हें परीक्षा में शामिल होने की अनुमति है। इस तरह बाहर रखने का परीक्षा के मकसद से कोई तार्किक संबंध नहीं है। अनुच्छेद 14 के तहत वर्गीकरण के मामले में 'बुधन चौधरी बनाम बिहार राज्य', 'डी.एस. नकारा बनाम भारत संघ' का हवाला देते और 'अमिता बनाम भारत संघ' का मामले का ज़िक्र करते हुए यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 16 नियुक्ति से पहले के चरणों की सुरक्षा करता है, जिसमें तय योग्यता परीक्षा में शामिल होना भी शामिल है।
वकील ने आगे कहा कि शिक्षा मित्र लेसन प्लान बनाते हैं, हाज़िरी का रिकॉर्ड रखते हैं, दाखिले के लिए लोगों को प्रेरित करते हैं, मिड-डे मील में मदद करते हैं और जनगणना व चुनाव से जुड़े काम करते हैं। उन्होंने 'निपुण भारत मिशन' के तहत पांच दिन की 'फाउंडेशन लिटरेसी एंड न्यूमरेसी' ट्रेनिंग के लिए सहायक शिक्षकों के साथ शिक्षा मित्रों की संयुक्त ड्यूटी लगाने वाले ब्लॉक शिक्षा अधिकारी, जसरा, प्रयागराज के एक कार्यालय आदेश का भी हवाला दिया।
आयोग के वकील ने कहा कि सरकारी आदेश केवल सुप्रीम कोर्ट के 29.05.2026 के समीक्षा आदेश को लागू कर रहा था, जिसने 'बच्चों के लिए मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' की धारा 23(2) के तहत समय-सीमा को 31.08.2028 तक बढ़ा दिया। साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता योग्य होने के बावजूद जुलाई 2026 में आयोजित नियमित TET परीक्षा में शामिल नहीं हुए।
अदालत ने माना कि शिक्षा मित्रों को काम पर रखने का तरीका, स्रोत और कानूनी ढांचा उन सहायक शिक्षकों से बुनियादी तौर पर अलग है जिन्हें NCTE की 23.08.2010 की अधिसूचना (जिसमें TET को अनिवार्य किया गया) से पहले नियमित पदों पर नियुक्त किया गया था। अदालत ने कहा कि उस पहले वाले वर्ग के लिए TET मूल नियुक्ति की शर्त के बजाय नौकरी में आने के बाद की एक कानूनी ज़रूरत थी।
'वेस्ट बंगाल राज्य बनाम अनवर अली सरकार' और 'श्री राम कृष्ण डालमिया बनाम श्री जस्टिस एस.आर. टेंडोलकर' मामलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि मुख्य अंतर यह है कि एक तरफ पहले से नौकरी कर रहे शिक्षक थे और दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय समय सीमा के भीतर TET पास करने की कानूनी बाध्यता। इसका मकसद शिक्षण व्यवस्था और बच्चों की शुरुआती शिक्षा में कोई रुकावट डाले बिना नियमों का पालन सुनिश्चित करना है।
कोर्ट ने कहा,
"यह सिद्धांत स्पष्ट रूप से बताया गया कि संविधान कानून के सामने समानता की गारंटी देता है, न कि हर मामले में एक जैसा व्यवहार करने की (भले ही उनमें ज़रूरी अंतर हों)। यह समान लोगों के साथ समान व्यवहार की मांग करता है और तर्कसंगत आधार पर अलग-अलग लोगों के साथ अलग व्यवहार करने की अनुमति देता है।"
चूंकि सरकारी आदेश ने 'अंजुमन इशात-ए-तालीम ट्रस्ट' मामले में सुप्रीम कोर्ट के बाध्यकारी निर्देशों को लागू किया, इसलिए कोर्ट ने कहा कि इसे इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती कि वे निर्देश कानूनी रूप से गलत थे, क्योंकि रिट कोर्ट सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ अपील नहीं सुन सकती।
अनुच्छेद 16 पर कोर्ट ने कहा कि स्पेशल TET से कोई पद नहीं बनता और न ही नियुक्ति का कोई अधिकार मिलता है; याचिकाकर्ता कानूनी रूप से तय योग्यताओं के आधार पर किसी भी भर्ती प्रक्रिया में भाग लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
कोर्ट ने आगे कहा,
"योग्यता और नियुक्ति के बीच का अंतर निर्णायक है। स्पेशल TET पास करने से केवल पात्रता की शर्त पूरी होती है, इसका मतलब नियुक्ति नहीं है। इसमें कोई पद आरक्षित नहीं होता, भर्ती का कोई नया रास्ता नहीं बनता और न ही इसमें शामिल होने की अनुमति पाने वाले लोगों को भविष्य में नियुक्ति या प्रमोशन का कोई प्राथमिकता वाला अधिकार मिलता है।"
समानता का दावा खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा:
"इसलिए सवाल यह नहीं है कि क्या याचिकाकर्ता और नौकरी कर रहे शिक्षक TET देने में सक्षम हैं, बल्कि यह है कि क्या स्पेशल परीक्षा के मकसद से वे एक ही कानूनी स्थिति में हैं। आसान शब्दों में, इसका जवाब 'नहीं' है।"
इसके अनुसार, रिट याचिका खारिज की गई।
Case Title : Vaseem Ahamad and 220 others v. State of U.P. and 3 others