1991 विधानसभा हंगामा मामले को हाईकोर्ट ने किया रद्द, यूपी सरकार को पुराने मुकदमों पर नीति बनाने का निर्देश

Update: 2026-01-30 10:03 GMT

न्यायपालिका के सीमित संसाधनों और लंबित मामलों के बढ़ते बोझ पर गंभीर टिप्पणी करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने बुधवार को उत्तर प्रदेश विधानसभा में कथित हंगामे से जुड़े 34 वर्ष पुराने आपराधिक मुकदमे को रद्द कर दिया। अदालत ने ऐसे पुराने और निष्प्रभावी मुकदमों को “निरर्थक (futile) अभ्यास” करार देते हुए राज्य सरकार से कहा कि वह विभिन्न अदालतों में लंबित ऐसे मामलों के “डेडवुड को काटे”।

जस्टिस पंकज भाटिया की पीठ ने धारा 482 दंप्रसं के तहत दायर याचिकाओं को स्वीकार करते हुए 1991 में विधानसभा के गेट नंबर-1 पर कथित हंगामा करने, जबरन भीतर घुसने का प्रयास करने और खड़ी गाड़ियों के शीशे व लाइट्स क्षतिग्रस्त करने के आरोपों से जुड़े आपराधिक कार्यवाही को निरस्त कर दिया।

आरोप टिकाऊ नहीं पाए गए

अदालत ने कहा कि एफआईआर, चार्जशीट और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह संकेत नहीं मिलता कि किसी अवैध जमावड़े द्वारा साझा उद्देश्य की पूर्ति में हिंसा का प्रयोग हुआ हो, न ही यह कि लोक सेवक को उसके कर्तव्य के निर्वहन से रोकने के लिए हमला या आपराधिक बल का प्रयोग किया गया हो। इसलिए, धारा 147 आईपीसी (दंगा) और धारा 353 आईपीसी के आरोप टिकाऊ नहीं पाए गए।

धारा 452 आईपीसी (मारपीट/गलत रोकथाम की तैयारी के बाद गृह-अतिक्रमण) के संबंध में पीठ ने स्पष्ट किया कि विधानसभा परिसर मानव निवास (human dwelling) नहीं है, और रिकॉर्ड पर ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है जिससे यह सिद्ध हो कि चोट पहुँचाने, हमला करने या किसी को गलत तरीके से रोकने की कोई तैयारी की गई थी।

इसी तरह, धारा 427 आईपीसी (पचास रुपये या उससे अधिक की क्षति) का आरोप भी अदालत ने असिद्ध पाया।

34 साल की देरी, एक भी गवाह नहीं

अदालत ने यह भी माना कि मुकदमे में अत्यधिक देरी से संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ है। उल्लेखनीय है कि 30 वर्ष से अधिक पहले संज्ञान लिए जाने के बावजूद एक भी गवाह का बयान दर्ज नहीं हुआ। कुछ मामलों में अभियुक्तों की मृत्यु हो चुकी है और कई बार वारंट जारी होने के बावजूद कोई प्रगति नहीं हुई।

जस्टिस भाटिया ने कहा—

“पूरी मुकदमेबाज़ी एक निरर्थक अभ्यास बन चुकी है… न तो गवाह उपलब्ध हैं और कई मामलों में अभियुक्त भी नहीं रहे। यह पूरी प्रक्रिया राज्य के बहुमूल्य संसाधनों पर अनावश्यक बोझ डाल रही है।”

राज्य की पहल: 'केस मैनेजमेंट पॉलिसी'

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि पूर्व निर्देशों के अनुपालन में अपर महाधिवक्ता की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय समिति गठित की गई है, जो अन्य राज्यों की तर्ज पर पुराने/निष्प्रभावी मुकदमों की पहचान और वापसी के लिए केस मैनेजमेंट पॉलिसी तैयार करेगी।

इस पर अदालत ने कहा—

“यह सर्वविदित है कि न्यायपालिका बढ़ते मुकदमों के विस्फोट से निपटने के लिए संसाधनों की कमी से जूझ रही है… ऐसे निरर्थक मुकदमों की निरंतरता न्यायपालिका पर अतिरिक्त बोझ डाल रही है।”

अदालत ने आशा व्यक्त की कि समिति शीघ्र ही प्रभावी समाधान प्रस्तुत करेगी ताकि राज्यभर में लंबित निरर्थक मुकदमों की छंटनी हो सके और जिला अदालतों के अतिभारित डॉकेट्स से डेडवुड हटाया जा सके।

आदेश

इन कारणों से लखनऊ जिला न्यायालय में लंबित समस्त कार्यवाही को रद्द कर दिया गया।

Tags:    

Similar News