गलत पहचान पर गिरफ्तारी अनुच्छेद 21 का उल्लंघन: निर्दोषों को पकड़ने पर यूपी पुलिस को इलाहाबाद हाइकोर्ट की कड़ी फटकार

Update: 2026-02-11 10:14 GMT

इलाहाबाद हाइकोर्ट (लखनऊ पीठ) ने गलत पहचान के आधार पर दो निर्दोष व्यक्तियों की गिरफ्तारी के मामले में यूपी पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। हाइकोर्ट ने साफ कहा कि किसी व्यक्ति की पहचान की पुष्टि किए बिना उसकी स्वतंत्रता छीनना कानूनन अस्वीकार्य है और यह सीधे तौर पर संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर आघात करता है।

जस्टिस तेज प्रताप तिवारी की एकल पीठ ने सोमवार को दोनों मामलों में पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द की। साथ ही पुलिस की गंभीर लापरवाही को देखते हुए लखनऊ के पुलिस आयुक्त और सीतापुर के पुलिस अधीक्षक को निर्देश दिया कि वे दोषी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित और वैधानिक कार्रवाई करें और दो महीने के भीतर अनुपालन रिपोर्ट हाइकोर्ट में दाखिल करें।

कोर्ट ने यह आदेश दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 482 के तहत दायर याचिकाओं पर पारित किया। याचिकाकर्ता मोहम्मद अजीम इदरीसी और ओम प्रकाश विश्वकर्मा थे, जिन्हें अलग-अलग मामलों में वास्तविक आरोपियों की पहचान की पुष्टि किए बिना गिरफ्तार कर लिया गया।

मामले की पृष्ठभूमि में सामने आया कि दोनों याचिकाकर्ताओं के नाम वास्तविक आरोपियों से मिलते-जुलते थे लेकिन पुलिस ने नाम के अलावा किसी अन्य तथ्य की जांच नहीं की।

पहला मामला ओम प्रकाश विश्वकर्मा से जुड़ा था, जिन पर वर्ष 2004 के एक धोखाधड़ी के मामले में IPC की धाराओं 420, 504 और 506 के तहत कार्रवाई की गई। आरोप था कि ओम प्रकाश नाम के व्यक्ति ने एक निरक्षर महिला से धोखे से बैनामा कराकर बैंक से एक लाख रुपये का लोन लिया।

याचिकाकर्ता ने कोर्ट को बताया कि वह एक क्लर्क है और न तो वह किसी फर्म का मालिक है और न ही उसने कोई लोन लिया। रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि शिकायत में जिस आरोपी का ज़िक्र था, वह भगौती देवी का पुत्र बताया गया, जबकि याचिकाकर्ता की मां का नाम रामरती है। पिता का नाम समान होने के कारण पुलिस ने बिना पूरी जानकारी के उन्हें गिरफ्तार कर लिया।

राज्य सरकार की ओर से पेश वकील ने भी स्वीकार किया कि यह तथ्यात्मक गलती का मामला था और गैर-जमानती वारंट में अधूरी जानकारी के आधार पर पुलिस से चूक हुई।

दूसरा मामला मोहम्मद अजीम इदरीसी से जुड़ा था, जिन्हें वर्ष 2024 में बलात्कार, उगाही और अवैध धर्मांतरण के गंभीर आरोपों वाले मामले में गिरफ्तार किया गया। यहां भी वास्तविक आरोपी की पहचान सत्यापित किए बिना कार्रवाई की गई।

हाइकोर्ट ने दोनों मामलों में पुलिस की कार्यप्रणाली पर गहरी चिंता जताई। जस्टिस तिवारी ने कहा कि गिरफ्तारी पूरी तरह यांत्रिक ढंग से की गई और यह नहीं देखा गया कि पकड़ा गया व्यक्ति वास्तव में वही आरोपी है या नहीं।

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1994) का हवाला देते हुए कहा कि केवल इस आधार पर कि पुलिस अधिकारी को गिरफ्तारी का कानूनी अधिकार है, किसी व्यक्ति को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता।

जस्टिस तिवारी ने अपने आदेश में यह भी कहा,

“पुलिस हिरासत में गिरफ्तारी और निरुद्ध किया जाना किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा और आत्मसम्मान को अपूरणीय क्षति पहुंचा सकता है।”

इन टिप्पणियों के साथ हाइकोर्ट ने दोनों याचिकाकर्ताओं के खिलाफ संज्ञान आदेश और उससे जुड़ी सभी कार्यवाहियों रद्द कीं। हालांकि कोर्ट ने उन्हें यह स्वतंत्रता भी दी कि वे चाहें तो संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अलग से उपयुक्त राहत के लिए याचिका दाखिल कर सकते हैं।

आदेश के अंत में हाइकोर्ट ने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा कि निर्दोषों की स्वतंत्रता से इस तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित की जानी चाहिए।

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