हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

11 July 2026 9:30 PM IST

  • हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (06 जुलाई, 2026 से 10 जुलाई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    पति-पत्नी की तरह साथ रहने पर वैध विवाह का कड़ा सबूत मांगकर भरण-पोषण से इनकार नहीं किया जा सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रहे हों और उनका वैवाहिक संबंध अन्य परिस्थितियों से स्थापित होता हो, तो भरण-पोषण (Maintenance) के दावे को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि वैध विवाह का सख्त दस्तावेजी प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया।

    जस्टिस अचल सचदेव ने यह टिप्पणी महाराजगंज फैमिली कोर्ट के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द करते हुए की, जिसमें महिला की भरण-पोषण याचिका केवल इसलिए खारिज कर दी गई थी क्योंकि वह स्वयं को विधिक रूप से विवाहित पत्नी साबित करने वाले दस्तावेज पेश नहीं कर सकी थी।

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    जीवनसाथी की बातचीत बिना अनुमति रिकॉर्ड करना निजता के अधिकार का उल्लंघन, तलाक के मुकदमे में सबूत के तौर पर स्वीकार्य नहीं: तेलंगाना हाईकोर्ट

    तेलंगाना हाईकोर्ट ने कहा कि पति या पत्नी की टेलीफोन पर हुई बातचीत को उनकी अनुमति के बिना गुप्त रूप से रिकॉर्ड करना संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त निजता के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। ऐसे कॉल रिकॉर्डिंग को वैवाहिक विवाद या तलाक के मुकदमे में साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता। जस्टिस नामावरापु राजेश्वर राव ने दो दीवानी पुनरीक्षण याचिकाएं खारिज करते हुए यह फैसला सुनाया।

    अदालत ने कहा, "पक्षकारों के बीच हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग के संबंध में निचली अदालत का यह निष्कर्ष सही है कि दूसरे पक्ष की सहमति के बिना कॉल रिकॉर्ड करना निजता और संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त निजता के अधिकार का उल्लंघन है। इसलिए बिना सहमति की गई ऐसी रिकॉर्डिंग को साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।

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    सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद दूसरी याचिका सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक खारिज हो चुकी हो, तब उसी मामले में दोबारा अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि बाद में हुआ समझौता भी अग्रिम जमानत पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं बन सकता।

    जस्टिस सुमीत गोयल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 के तहत दायर दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

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    चेक बाउंस मामलों में हाईकोर्ट ने एक्टर राजपाल यादव को सुनाई तीन महीने की सजा

    दिल्ली हाईकोर्ट ने एक्टर राजपाल यादव को चेक बाउंस के सात मामलों में दोषी ठहराए जाने का फैसला बरकरार रखते हुए प्रत्येक मामले में तीन महीने के साधारण कारावास की सजा सुनाई है। अदालत ने निर्देश दिया कि सभी सजाएं एक साथ चलेंगी।

    जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने फैसले में राजपाल यादव को प्रत्येक मामले में 1.05 करोड़ रुपये का जुर्माना अदा करने का भी निर्देश दिया। इसमें से 1 करोड़ 4 लाख 75 हजार रुपये शिकायतकर्ता को और 25 हजार रुपये राज्य को दिए जाएंगे।

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    संबंधित, प्रासंगिक या संबद्ध विषय में मास्टर डिग्री रखने वाला असिस्टेंट प्रोफेसर नियुक्ति के लिए पात्र: उत्तराखंड हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा है कि यूजीसी (UGC) विनियमों के अनुसार, यदि किसी अभ्यर्थी के पास किसी भारतीय विश्वविद्यालय से संबंधित (Concerned), प्रासंगिक (Relevant) या संबद्ध (Allied) विषय में कम से कम 55% अंकों के साथ मास्टर डिग्री है, तो वह असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर नियुक्ति के लिए पात्र होगा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यूजीसी विनियम इन तीनों श्रेणियों के विषयों को समान दर्जा देते हैं और केवल संबंधित विषय में डिग्री रखने वाले अभ्यर्थी को कोई अतिरिक्त प्राथमिकता नहीं देते।

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    लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाने से पहले अलग नोटिस देना अनिवार्य, अपील का नोटिस पर्याप्त नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

    छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) के तहत किसी लोक सूचना अधिकारी पर जुर्माना लगाने से पहले राज्य सूचना आयोग के लिए धारा 20(1) के तहत अलग से नोटिस जारी करना और सुनवाई का उचित अवसर देना अनिवार्य है। अदालत ने स्पष्ट किया कि अपील की कार्यवाही के दौरान जारी नोटिस को अंतिम नोटिस मानकर सीधे जुर्माना नहीं लगाया जा सकता।

    जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद एक लोक सूचना अधिकारी की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। याचिका में छत्तीसगढ़ राज्य सूचना आयोग के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत उन पर RTI Act की धारा 20(1) के तहत जुर्माना लगाया गया और धारा 20(2) के तहत विभागीय कार्रवाई की सिफारिश की गई।

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    वोटर किसी सीट को 'डी-रिज़र्व' की मांग करके सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार नहीं मांग सकता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    डिलिमिटेशन एक्ट, 2002 की धारा 9(1)(c) की वैधता बरकरार रखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि कोई वोटर किसी निर्वाचन क्षेत्र (सीट) को 'डी-रिज़र्व' करने की मांग करके सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को वोट देने का अधिकार नहीं मांग सकता।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा, "वोट देने के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि वोटर किसी सीट के आवंटन की शर्तें तय कर सकता है या इस बात पर ज़ोर दे सकता है कि कोई सीट किसी खास श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए ही आवंटित की जाए।"

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    UP Goondas Act | अपीलीय अथॉरिटी ज़िला मजिस्ट्रेट को नए फ़ैसले के लिए मामले वापस नहीं भेज सकती: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि यूपी कंट्रोल ऑफ़ गुंडाज़ एक्ट, 1970 की धारा 6 के तहत काम करने वाली अपीलीय अथॉरिटी के पास मामले को ज़िला मजिस्ट्रेट के पास मेरिट के आधार पर नए सिरे से फ़ैसला करने के लिए वापस भेजने का कानूनी अधिकार नहीं है।

    जस्टिस संदीप जैन की बेंच ने कहा कि कानून अपीलीय अथॉरिटी को या तो "आदेश की पुष्टि करने (बदलाव के साथ या बिना बदलाव के) या उसे रद्द करने" का अधिकार देता है।

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    Election | SC/ST आबादी वाले इलाकों में सीटों का आरक्षण संवैधानिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। यह धारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उन इलाकों में निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करने का प्रावधान करती है, जहाँ कुल आबादी में उनकी आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है।

    कोर्ट ने कहा कि कोई मतदाता यह दावा नहीं कर सकता कि उसके वोट देने के अधिकार का उल्लंघन हुआ है, सिर्फ़ इसलिए कि उसका निर्वाचन क्षेत्र दशकों से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रहा है।

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    पति का माता-पिता का ध्यान रखना पत्नी के अलग रहने और भरण-पोषण मांगने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पति का अपने माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों का ध्यान रखना मात्र इस आधार पर पत्नी को अलग रहने और भरण-पोषण पाने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि ससुराल वालों के साथ सामान्य मतभेद या पति का अपने माता-पिता के प्रति दायित्व निभाना, वैवाहिक घर छोड़ने का पर्याप्त कानूनी कारण नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की सिंगल बेंच ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि अदालत ने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी।

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    तलाक के बाद भी नहीं खत्म होगी घरेलू हिंसा की जिम्मेदारी, पीड़िता को मिलेगा कानून का संरक्षण: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि पति द्वारा घरेलू हिंसा की गई है, तो बाद में तलाक का डिक्री पारित हो जाने मात्र से वह घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत अपनी कानूनी जिम्मेदारियों से मुक्त नहीं हो सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि घरेलू हिंसा का कृत्य एक बार हो जाने के बाद पीड़िता को कानून के तहत मिलने वाले अधिकारों से वंचित नहीं किया जा सकता।

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    अगर तलाक पर कोई विवाद नहीं है तो मुस्लिम पति फैमिली कोर्ट से तलाक की घोषणा की मांग कर सकता है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट, फैमिली कोर्ट्स एक्ट, 1984 की धारा 7 के तहत तलाक की घोषणा कर सकता है, भले ही तलाक मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत हुआ हो और पार्टियों या किसी और ने उस पर कोई आपत्ति न जताई हो।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस सैयद कमर हसन रिज़वी की बेंच ने कहा, “जब लखनऊ की फैमिली कोर्ट के एडिशनल प्रिंसिपल जज तलाक की वैधता या उसके बारे में संतुष्ट हैं और संबंधित पक्षों के बीच इस मामले पर कोई विवाद नहीं है - बल्कि प्रतिवादी/पत्नी ने खुद तलाक की डिक्री के लिए सहमति जताई है - तो फैमिली कोर्ट को पक्षों के वैवाहिक स्टेटस को 'तलाकशुदा' घोषित कर देना चाहिए।”

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    DOE की 15 दिन में मंजूरी नहीं मिली तो निजी स्कूल कर्मचारी का निलंबन स्वतः खत्म, बाद की मंजूरी से नहीं होगा बहाल : दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ

    दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्ण पीठ ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया कि मान्यता प्राप्त निजी स्कूल के किसी कर्मचारी का निलंबन, यदि 15 दिनों के भीतर शिक्षा निदेशक (DOE) की मंजूरी प्राप्त नहीं करता है, तो वह समाप्त हो जाएगा।

    इसके बाद यदि DOE मंजूरी भी दे देता है तब भी समाप्त हो चुके निलंबन को दोबारा प्रभावी नहीं किया जा सकता। पूर्ण पीठ में जस्टिस सी. हरि शंकर, जस्टिस ओम प्रकाश शुक्ला और जस्टिस रेणु भटनागर शामिल थे। पीठ ने कहा कि यदि स्कूल प्रबंधन को इसके बाद भी कर्मचारी को निलंबित रखना आवश्यक लगता है तो उसे DOE से पहले से मंजूरी लेकर नया निलंबन आदेश जारी करना होगा।

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    शरिया कानून के तहत बालिग़ होने पर शादी की इजाज़त POCSO का उल्लंघन, बाल विवाह पर रोक सभी धर्मों पर लागू होती है: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शरिया/मुस्लिम पर्सनल लॉ, जो लड़की की शादी के लिए बालिग़ होने (puberty) की उम्र को सही मानता है, वह 'बाल विवाह निषेध अधिनियम, 2006' (PCMA) और 'POCSO Act' के साफ़ तौर पर खिलाफ़ है। जस्टिस जेजे मुनीर और जस्टिस अचल सचदेव की बेंच ने यह भी कहा कि देश के हर नागरिक के लिए शादी की उम्र एक ही है, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, जैसा कि PCMA में बताया गया।

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    S.14 HMA | शादी के एक साल के अंदर दायर तलाक के 'समय से पहले' केस के गुण-दोष पर फैमिली कोर्ट चर्चा नहीं कर सकता: गुजरात हाईकोर्ट

    गुजरात हाईकोर्ट ने कहा कि अगर तलाक का केस समय से पहले दायर किया गया - यानी शादी के 1 साल के अंदर, जो हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 14 के तहत मना है - तो फैमिली कोर्ट मामले के गुण-दोष पर फैसला नहीं कर सकता। वह या तो शिकायत (plaint) वापस कर सकता है या केस खारिज कर सकता है। साथ ही पार्टियों को नया केस दायर करने का अधिकार भी दे सकता है। [2026 LiveLaw (Guj) 190]

    पति ने फैमिली कोर्ट के उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की थी, जिसमें समय-सीमा (limitation) के शुरुआती आधार पर हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13(1)(ia) और (ib) के तहत दायर उसका तलाक का केस खारिज कर दिया गया था।

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    नोटरीकृत समझौते से न तो हिंदू विवाह वैध होता है, न तलाक: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हिंदू विवाह को न तो केवल नोटरीकृत समझौते के आधार पर संपन्न माना जा सकता है और न ही ऐसे समझौते के जरिए वैध रूप से समाप्त किया जा सकता है। अदालत ने कहा कि हिंदू कानून के तहत विवाह कोई अनुबंध नहीं है, इसलिए केवल नोटरीकृत विवाह समझौते से वैध विवाह नहीं माना जाएगा। यह टिप्पणी जस्टिस जी.एस. अहलूवालिया और जस्टिस अनुराधा शुक्ला की खंडपीठ ने एक मामले की सुनवाई के दौरान की।

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    पति के दबाव में पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना भी दहेज की मांग हो सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि वह मांग पति के लगातार दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी में की गई हो, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी के तहत दहेज की मांग माना जा सकता है। जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्व सिन्हा रे की खंडपीठ ने दहेज मृत्यु के मामले में पति की दोषसिद्धि बरकरार रखी, जबकि पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में उसके माता-पिता को बरी कर दिया।

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