पति के दबाव में पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना भी दहेज की मांग हो सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

Amir Ahmad

6 July 2026 5:24 PM IST

  • पति के दबाव में पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगना भी दहेज की मांग हो सकता है: कलकत्ता हाईकोर्ट

    कलकत्ता हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि किसी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन यदि वह मांग पति के लगातार दबाव, उत्पीड़न या मजबूरी में की गई हो, तो उसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304बी के तहत दहेज की मांग माना जा सकता है।

    जस्टिस अरिजीत बनर्जी और जस्टिस अपूर्व सिन्हा रे की खंडपीठ ने दहेज मृत्यु के मामले में पति की दोषसिद्धि बरकरार रखी, जबकि पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में उसके माता-पिता को बरी कर दिया।

    अदालत ने पति की सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में बदल दिया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 304बी के तहत आजीवन कारावास दुर्लभ मामलों में ही दिया जाना चाहिए।

    अदालत ने कहा,

    "यह सही है कि किसी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने का अधिकार है, लेकिन जब यह मांग पति के निर्देश और लगातार दबाव का परिणाम हो, तब इसे 'दहेज की मांग' की व्यापक परिभाषा से बाहर नहीं रखा जा सकता।"

    खंडपीठ ने आगे कहा,

    "पीड़िता द्वारा अपने हिस्से की मांग पति द्वारा बनाए गए दबाव का परिणाम थी। यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि पति इस तरह का दबाव किसी स्वतंत्र गवाह की मौजूदगी में बनाएगा।"

    मामला वर्ष 2014 का है, जब चयानिका नामक महिला अपने नाबालिग बच्चे के साथ ससुराल में फंदे से लटकी हुई मिली थी।

    अभियोजन के अनुसार, विवाह के बाद से ही चयानिका को धन की मांग को लेकर लगातार मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना दी जा रही थी। उसके भाई ने आरोप लगाया कि उस पर बार-बार दबाव बनाया जाता था कि वह अपने मायके वालों से पैतृक संपत्ति बेचने के लिए कहे और बिक्री से मिलने वाले अपने हिस्से की राशि पति को दिलाए।

    जांच के बाद चयानिका के पति सजल परुई और उसके माता-पिता के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए, 304बी सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया। निचली अदालत ने हत्या के आरोप से तीनों को बरी कर दिया था लेकिन क्रूरता और दहेज मृत्यु के मामले में दोषी ठहराया था।

    हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का मूल्यांकन करने के बाद पाया कि पति के खिलाफ दहेज के लिए प्रताड़ना और दबाव के पर्याप्त प्रमाण हैं। हालांकि, उसके माता-पिता की संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं है।

    इसी आधार पर अदालत ने पति की दोषसिद्धि बरकरार रखते हुए उसके माता-पिता को बरी कर दिया और पति की सजा को आजीवन कारावास से घटाकर 10 वर्ष के कठोर कारावास में परिवर्तित कर दिया।

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