Election | SC/ST आबादी वाले इलाकों में सीटों का आरक्षण संवैधानिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

Shahadat

9 July 2026 7:53 PM IST

  • Election | SC/ST आबादी वाले इलाकों में सीटों का आरक्षण संवैधानिक: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी। यह धारा अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उन इलाकों में निर्वाचन क्षेत्रों को आरक्षित करने का प्रावधान करती है, जहाँ कुल आबादी में उनकी आबादी का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है।

    कोर्ट ने कहा कि कोई मतदाता यह दावा नहीं कर सकता कि उसके वोट देने के अधिकार का उल्लंघन हुआ है, सिर्फ़ इसलिए कि उसका निर्वाचन क्षेत्र दशकों से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रहा है।

    जस्टिस आलोक माथुर और जस्टिस अमिताभ कुमार राय की बेंच ने कहा,

    “वोट देने के अधिकार का मतलब यह नहीं है कि कोई मतदाता निर्वाचन क्षेत्र के आवंटन की शर्तें तय कर सकता है या इस बात पर ज़ोर दे सकता है कि कोई निर्वाचन क्षेत्र किसी खास श्रेणी के उम्मीदवारों को आवंटित किया जाए। लोकसभा या विधानसभा चुनाव में हर नागरिक के वोट देने के अधिकार को संविधान के अनुच्छेद 325 और 326 के तहत मान्यता दी गई है, जो संविधान द्वारा या उसके तहत तय सीमाओं के अधीन है।”

    संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए उनकी आबादी के अनुपात में सीटों के आरक्षण का प्रावधान है।

    कोर्ट ने पाया कि दोनों प्रावधान केवल आरक्षित की जाने वाली सीटों की संख्या तक ही सीमित हैं और यह नहीं बताते कि किन सीटों को आरक्षित किया जाना है; इसके लिए तरीका तय करने का काम संसद पर छोड़ दिया गया, जो कानून बनाकर ऐसा कर सकती है।

    याचिकाकर्ता सुल्तानपुर जिले के 191-कादीपुर विधानसभा क्षेत्र का मतदाता है। उसने अनुसूचित जातियों के लिए निर्वाचन क्षेत्र को अधिसूचित करने वाली 18.12.2006 की अधिसूचना और परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 9(1)(c) के उस हिस्से की वैधता को चुनौती दी। उसने 09.09.2006 के अपने अभ्यावेदन पर विचार करने और कादीपुर को सामान्य निर्वाचन क्षेत्र घोषित करने का निर्देश भी मांगा।

    उसने दलील दी कि यह सीट बनने के बाद से ही लगभग छह दशकों से अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित रही है, जिससे उसे पीढ़ियों से केवल अनुसूचित जाति के उम्मीदवारों के पक्ष में “जाति-आधारित वोट” देने के लिए मजबूर होना पड़ा है। यह तर्क दिया गया कि अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की संख्या तय करने का प्रावधान है, लेकिन कहीं भी यह नहीं कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में SC/ST आबादी ज़्यादा है, वहां की सीटें हमेशा आरक्षित ही रहेंगी।

    यह भी कहा गया कि धारा 9(1)(c) के कारण ठहराव की स्थिति पैदा होती है; एक बार आरक्षित हुआ निर्वाचन क्षेत्र अनिश्चित काल तक आरक्षित ही रहता है, जबकि संविधान के भाग IX और IX-A के तहत पंचायत और नगरपालिका चुनावों में रोटेशन (बारी-बारी से आरक्षण) का सिद्धांत अपनाया जाता है। यह अनुच्छेद 14, 15 और 19 का उल्लंघन है।

    याचिकाकर्ता के वकील ने संविधान सभा की बहसों का हवाला दिया, जिसमें उस प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया कि आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों में वे इलाके शामिल होने चाहिए, जहां अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की आबादी अपेक्षाकृत अधिक हैं।

    भारत के चुनाव आयोग (ECI) ने एक प्रारंभिक आपत्ति उठाई कि याचिका संविधान के अनुच्छेद 329(a) के तहत वर्जित है। यह अनुच्छेद निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन या सीटों के आवंटन से संबंधित किसी भी कानून की वैधता को किसी भी अदालत में चुनौती देने पर रोक लगाता है।

    'मेघराज कोठारी बनाम परिसीमन आयोग' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए यह तर्क दिया गया कि राजपत्र (गजट) में प्रकाशित परिसीमन आयोग के आदेश कानून का दर्जा रखते हैं और उन्हें चुनौती नहीं दी जा सकती। यह भी कहा गया कि याचिका दायर करने में देरी और लापरवाही बरती गई, और आरक्षित निर्वाचन क्षेत्रों का रोटेशन एक नीतिगत मामला है, जिसके लिए 'रिट ऑफ़ मैंडमस' (आदेश की रिट) जारी नहीं की जा सकती।

    'किशोरचंद्र छगनलाल राठौड़ बनाम भारत संघ और अन्य' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर भरोसा करते हुए अदालत ने प्रारंभिक आपत्ति को खारिज कर दिया और याचिका को सुनवाई योग्य माना क्योंकि इसमें परिसीमन अधिनियम की धारा 9(1)(c) की वैधता को चुनौती दी गई।

    अदालत ने कहा कि अनुच्छेद 329 का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि नागरिकों को अपनी शिकायत रखने से पूरी तरह रोक दिया जाए, खासकर तब जब चुनाव कराने के लिए संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या की आवश्यकता हो या जब सत्ता के दुर्भावनापूर्ण या मनमाने इस्तेमाल का मामला बनता हो।

    अदालत ने माना कि चूंकि भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में आरक्षित सीटों की पहचान करने के लिए कोई तरीका नहीं बताया गया, इसलिए संसद अनुच्छेद 327 के तहत अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए अधिनियम की धारा 9(1)(c) में यह तरीका तय कर सकती है।

    आगे कहा गया,

    “भारत के संविधान के अनुच्छेद 330 और 332 में 2002 के अधिनियम की धारा 9(1)(c) के प्रावधानों के खिलाफ कोई रोक नहीं है। यह धारा उन इलाकों में SC/ST उम्मीदवारों के लिए सीटें आरक्षित करने की व्यवस्था करती है, जहां SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसा प्रावधान किसी संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन करता है।”

    इस तर्क को खारिज करते हुए कि सीटों का आरक्षण सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार के चुनाव लड़ने के अधिकार को कम करता है, कोर्ट ने कहा कि ऐसा अधिकार अनुच्छेद 330 और 332 के तहत परिकल्पित संवैधानिक व्यवस्था से ऊपर नहीं हो सकता। कोर्ट ने याचिकाकर्ता के इस दावे को गलत माना कि उसके निर्वाचन क्षेत्र में आरक्षण जारी रहने से उसके वोट देने के अधिकार पर बुरा असर पड़ा है, क्योंकि वोट देने का अधिकार एक संवैधानिक अधिकार है जो अनुच्छेद 327 के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के अधीन है।

    राजबाला और अन्य बनाम हरियाणा राज्य और अन्य मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि किसी कानून को केवल इस आधार पर असंवैधानिक घोषित नहीं किया जा सकता कि वह "मनमाना" है। किसी अधिनियम की वैधता को केवल विधायी क्षमता की कमी या मौलिक अधिकारों या किसी अन्य संवैधानिक प्रावधान के उल्लंघन के आधार पर ही चुनौती दी जा सकती है, सिवाय उस स्थिति के जब कानून स्पष्ट रूप से मनमाना और अनुचित हो।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 9(1)(c) को संसद ने सातवीं अनुसूची की सूची I की प्रविष्टि 72 के तहत अपनी क्षमता के भीतर अधिनियमित किया और जिन इलाकों में SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से ज़्यादा है, वहाँ सीटें आरक्षित करने से किसी मौलिक अधिकार का उल्लंघन नहीं होता है।

    इसके अलावा, कोर्ट ने कहा कि कानून बनाने की शक्ति अदालतों को नहीं दी गई और विधायिका को किसी खास तरीके से कानून बनाने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि वह अधिनियम में आरक्षित सीटों के रोटेशन (बारी-बारी से आरक्षण) का प्रावधान जोड़ने के लिए कोई आदेश (मैंडमस) जारी नहीं कर सकता, जैसा कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 243D और 243T में पंचायतों और नगर पालिकाओं के लिए प्रावधान है।

    यह देखते हुए कि आरक्षित सीटों को रोटेट (बारी-बारी से बदलना) करने का मामला संसद के विचार करने का विषय है, कोर्ट ने कहा:

    “जिन निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST आबादी तुलनात्मक रूप से अधिक है, वहां SC/ST उम्मीदवार अपनी बड़ी आबादी के कारण बिना आरक्षण की मदद के भी चुने जा सकते हैं। हमारे संविधान में दिए गए सामाजिक न्याय, राजनीतिक न्याय और समानता के लक्ष्यों को केवल सीटों के रोटेशन से ही हासिल किया जा सकता है, जिससे SC/ST उम्मीदवार उन सीटों से भी चुने जा सकें, जहां उनकी आबादी निर्वाचन क्षेत्र की कुल आबादी की तुलना में काफी कम है। इस मुद्दे पर विचार करना और अपनी समझ के अनुसार कानून बनाना संसद का काम है और यह कोर्ट राज्य को विधानसभा/संसदीय निर्वाचन क्षेत्रों में SC/ST के लिए आरक्षण में रोस्टर लागू करने के लिए मजबूर करने वाला कोई निर्देश जारी नहीं कर सकता।”

    इसके अनुसार, रिट याचिका खारिज कर दी गई।

    Case Title: Jagdish Singh v. Election Commission of India Through Chief Election Commissioner 2026 LiveLaw (AB) 375

    Next Story