पति का माता-पिता का ध्यान रखना पत्नी के अलग रहने और भरण-पोषण मांगने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

Amir Ahmad

9 July 2026 6:59 PM IST

  • पति का माता-पिता का ध्यान रखना पत्नी के अलग रहने और भरण-पोषण मांगने का आधार नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा कि पति का अपने माता-पिता या परिवार के अन्य सदस्यों का ध्यान रखना मात्र इस आधार पर पत्नी को अलग रहने और भरण-पोषण पाने का अधिकार नहीं देता। अदालत ने कहा कि ससुराल वालों के साथ सामान्य मतभेद या पति का अपने माता-पिता के प्रति दायित्व निभाना, वैवाहिक घर छोड़ने का पर्याप्त कानूनी कारण नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस जय कुमार पिल्लई की सिंगल बेंच ने फैमिली कोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें पत्नी को भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था। हालांकि अदालत ने नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की राशि बढ़ा दी।

    अदालत ने कहा,

    "वैवाहिक कानून के दायरे में ससुराल पक्ष के साथ सामंजस्य की कमी या पति का अपने माता-पिता एवं परिवार के अन्य सदस्यों की देखभाल करना किसी भी स्थिति में ऐसा उचित या पर्याप्त आधार नहीं हो सकता, जिसके कारण पत्नी वैवाहिक घर छोड़ दे और बाद में भरण-पोषण का दावा करे।"

    मामले में पति ने फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उसे पत्नी को 10 हजार रुपये प्रतिमाह तथा दोनों नाबालिग बच्चों को 5-5 हजार रुपये प्रतिमाह भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया।

    रिकॉर्ड के अनुसार, पति-पत्नी के बीच विवाद के बाद पत्नी मायके चली गई और वहीं से भरण-पोषण के लिए आवेदन दायर किया। पति का कहना था कि पत्नी अपनी इच्छा से मायके गई। उसने यहां तक कि बच्चे के जन्म की जानकारी भी उसे नहीं दी। अस्पताल का खर्च उसने उठाया, लेकिन प्रसव के बाद पत्नी बिना बताए फिर मायके लौट गई।

    रिकॉर्ड में यह भी सामने आया कि पति ने महिला परामर्श केंद्र में आवेदन दिया था। बाद में पत्नी इस शर्त पर ससुराल लौटी कि दोनों घरों के बीच दीवार बनाकर रसोई अलग कर दी जाए। कुछ समय तक सब सामान्य रहा, लेकिन बाद में फिर विवाद शुरू हो गया।

    पत्नी ने पति और उसके परिवार के खिलाफ क्रूरता का मामला भी दर्ज कराया था। बाद में हाईकोर्ट ने परिवार के अन्य सदस्यों को और ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2019 में पति को भी आरोपों से बरी कर दिया।

    पत्नी का आरोप था कि शादी के बाद उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसने यह भी कहा कि दूसरी बार गर्भवती होने पर उससे तीन लाख रुपये की मांग की गई और बच्चे सहित घर से निकाल दिया गया, जिसके बाद उसने FIR दर्ज कराई।

    वहीं, पति की ओर से कहा गया कि पत्नी स्वयं ब्यूटी पार्लर चलाती है और उसकी अपनी आय है। साथ ही, वह अलग रहने का कोई ठोस और विश्वसनीय कारण साबित नहीं कर सकी।

    हाईकोर्ट ने दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125(4) का हवाला देते हुए कहा कि यदि पत्नी बिना किसी पर्याप्त कारण के पति के साथ रहने से इनकार करती है तो वह भरण-पोषण की हकदार नहीं होती। अदालत ने स्पष्ट किया कि पर्याप्त कारण वही माने जाएंगे, जहां पति पत्नी की पूरी तरह उपेक्षा करे, उसके मूल अधिकारों का हनन करे, उसे गंभीर क्रूरता से न बचाए या लगातार शारीरिक अथवा मानसिक प्रताड़ना दे।

    अदालत ने कहा,

    "यह अपेक्षा करना कि पति अपनी पत्नी को खुश करने के लिए माता-पिता से संबंध तोड़ ले या उनका ध्यान रखना छोड़ दे, कानून की दृष्टि में उचित नहीं है।"

    हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि पत्नी ने पति पर अपनी भाभी के साथ अवैध संबंध होने जैसे गंभीर और निराधार आरोप लगाए जो मानसिक क्रूरता का अत्यंत गंभीर रूप है।

    इन सभी परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने माना कि पत्नी अलग रहने का कोई वैध और पर्याप्त कारण साबित नहीं कर सकी। इसलिए उसका मामला CrPC की धारा 125(4) के तहत भरण-पोषण से वंचित किए जाने की श्रेणी में आता है।

    इसी आधार पर हाईकोर्ट ने पत्नी को दिए गए भरण-पोषण आदेश रद्द किया, जबकि दोनों नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण की राशि बढ़ाने का निर्देश बरकरार रखा।

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