सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद दूसरी याचिका सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

Amir Ahmad

10 July 2026 5:11 PM IST

  • सुप्रीम कोर्ट से अग्रिम जमानत खारिज होने के बाद दूसरी याचिका सुनवाई योग्य नहीं: पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब किसी आरोपी की अग्रिम जमानत याचिका हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक खारिज हो चुकी हो, तब उसी मामले में दोबारा अग्रिम जमानत की याचिका दाखिल नहीं की जा सकती। अदालत ने यह भी कहा कि बाद में हुआ समझौता भी अग्रिम जमानत पर दोबारा विचार करने का आधार नहीं बन सकता।

    जस्टिस सुमीत गोयल ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 482 के तहत दायर दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की।

    मामला पंजाब के कपूरथला में दर्ज धोखाधड़ी और विदेश भेजने के नाम पर ठगी के एक मामले से जुड़ा है। आरोप है कि शिकायतकर्ता के बेटे को अमेरिका भेजने का झांसा देकर आरोपियों ने उससे 35 लाख रुपये लिए, लेकिन वादा पूरा नहीं किया।

    याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि पक्षों के बीच 30 मई 2026 को समझौता हो चुका है, इसलिए उन्हें अग्रिम जमानत का लाभ दिया जाए।

    हाईकोर्ट ने इस दलील को स्वीकार करने से इनकार करते हुए कहा कि आरोपियों की अग्रिम जमानत याचिका पहले ही विस्तृत आदेश के जरिए खारिज की जा चुकी थी। इसके बाद एक आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटाया, लेकिन वहां भी उसे राहत नहीं मिली।

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को यह सीमित राहत दी थी कि यदि वह दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करता है, तो उस पर गुण-दोष के आधार पर विचार किया जाए।

    अदालत ने कहा कि आरोपी ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने के बजाय फिर से अग्रिम जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है।

    जस्टिस सुमीत गोयल ने कहा,

    "यह याचिका पूरी तरह से गलत धारणा पर आधारित है और सुनवाई योग्य नहीं है। जब अग्रिम जमानत की मांग हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक खारिज हो चुकी है, तब दोबारा उसी राहत की मांग नहीं की जा सकती।"

    अदालत ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत समझौता कोई नया या ऐसा महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है, जिसके आधार पर अग्रिम जमानत के प्रश्न पर दोबारा विचार किया जा सके। समझौता सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों को न तो निष्प्रभावी कर सकता है और न ही उन्हें कमजोर कर सकता है।

    हाईकोर्ट ने यह भी माना कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए आत्मसमर्पण और नियमित जमानत लेने के अवसर का पालन न करना भी याचिकाकर्ता के आचरण को उसके खिलाफ जाता है और ऐसी स्थिति में उसे विवेकाधीन राहत नहीं दी जा सकती।

    इन्हीं आधारों पर हाईकोर्ट ने दूसरी अग्रिम जमानत याचिका खारिज की। हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि उसके इस आदेश का मामले के गुण-दोष पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा और जांच तथा मुकदमे की कार्यवाही कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से जारी रहेगी।

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