हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

Shahadat

16 May 2026 8:00 PM IST

  • High Courts
    High Courts

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (11 मई, 2026 से 15 मई, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    रक्षा और सुरक्षा परियोजनाओं के लिए पेड़ काटने पर पूर्व अनुमति जरूरी नहीं: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भारतीय सेना को राहत देते हुए स्पष्ट किया कि रक्षा और सुरक्षा संबंधी अधोसंरचना परियोजनाओं पर पेड़ काटने के लिए पूर्व अनुमति संबंधी उसका पुराना आदेश लागू नहीं होगा, यदि संबंधित भूमि वन संरक्षण अधिनियम की धारा 1ए के तहत छूट प्राप्त श्रेणी में आती है।

    चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और जस्टिस विनय सराफ की खंडपीठ ने कहा कि वन संरक्षण अधिनियम, 1980 में संशोधन के बाद सुरक्षा संबंधी परियोजनाओं को विशेष छूट दी गई। इसलिए 26 नवंबर 2025 को पारित आदेश को उसी सीमा तक लागू माना जाएगा, जहां अधिनियम में छूट का प्रावधान नहीं है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    पत्नी बालिग हो और वैध विवाह हो तो पति पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में पति के खिलाफ दर्ज दुष्कर्म की FIR रद्द करते हुए कहा कि यदि विवाह कानूनी रूप से वैध हो और पत्नी विवाह के समय बालिग हो तो भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 के अपवाद के तहत पति पर दुष्कर्म का मामला नहीं बनता।

    जस्टिस अनुप कुमार ढांड की एकलपीठ ने कहा कि पीड़िता विवाह के समय 18 वर्ष से अधिक आयु की थी और उसने स्वयं आरोपी के साथ 12 अप्रैल 2021 को विवाह किया था। ऐसे में बाद में दर्ज कराई गई FIR “कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग” है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बॉयकॉट की अपील के बावजूद कोर्ट में पेश होने पर बार एसोसिएशन वकीलों को सज़ा नहीं दे सकती: त्रिपुरा हाईकोर्ट

    त्रिपुरा हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी भी बार काउंसिल या बार एसोसिएशन का कोई भी नियम, कानून या उप-नियम कोर्ट के बॉयकॉट की इजाज़त नहीं देता, न ही वकीलों को उनके पेशेवर फ़र्ज़ निभाने के लिए उनके ख़िलाफ़ अनुशासनात्मक कार्रवाई की इजाज़त देता है।

    त्रिपुरा बार एसोसिएशन ने एक वकील के ख़िलाफ़ कार्रवाई शुरू की थी, जिसने बॉयकॉट के प्रस्ताव के बावजूद कंज्यूमर कमीशन के सामने पेश होने का फ़ैसला किया था; इस कार्रवाई पर रोक लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि जो वकील एडवोकेट्स एक्ट और वकालतनामा के तहत अपने फ़र्ज़ निभा रहे हैं, उन्हें अपने क्लाइंट्स की तरफ़ से कोर्ट या फ़ोरम में पेश होने से नहीं रोका जा सकता।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने भोजशाला स्थल को घोषित किया मंदिर, नमाज़ पढ़ने की अनुमति वाला सर्कुलर रद्द किया

    मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने घोषणा की कि भोजशाला का विवादित ऐतिहासिक स्थल देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर है। 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' और अन्य लोगों द्वारा दायर रिट याचिकाओं को स्वीकार करते हुए जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने कहा: "हमने इस स्थल पर हिंदू पूजा-अर्चना की निरंतरता को नोट किया। हालांकि समय के साथ इसे विनियमित किया गया... हम यह निष्कर्ष दर्ज करते हैं कि इस जगह का ऐतिहासिक साहित्य इसे राजा भोज से जुड़े संस्कृत सीखने के केंद्र के रूप में स्थापित करता है... यह धार में देवी सरस्वती को समर्पित एक मंदिर के अस्तित्व का संकेत देता है... इसलिए इस क्षेत्र का धार्मिक स्वरूप देवी वाग्देवी सरस्वती के मंदिर वाली भोजशाला के रूप में माना जाता है।"

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बुजुर्ग माता-पिता की सुरक्षा के लिए बेटे-बहू को घर से बेदखल करना सही: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने सीनियर सिटीजन्स के अधिकारों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि बुजुर्ग माता-पिता की गरिमा और शांतिपूर्ण जीवन की रक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर बेटे, बहू या अन्य रिश्तेदारों को संपत्ति से बेदखल किया जा सकता है।

    जस्टिस समीर जैन की पीठ ने सीनियर सिटीजन दंपति और उनके बेटे-बहू द्वारा दायर याचिका खारिज की। यह याचिका 80 वर्ष से अधिक उम्र के माता-पिता द्वारा संपत्ति से बेदखली के आदेश को चुनौती देते हुए दायर की गई।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ अवमानना याचिका खारिज, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा- जमानत रद्द कराने का रास्ता खुला

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ दायर अवमानना याचिका खारिज की। याचिका में आरोप लगाया गया कि उन्होंने POCSO मामले में अदालत द्वारा लगाई गई जमानत शर्तों का उल्लंघन किया।

    जस्टिस दिनेश पाठक की पीठ ने कहा कि प्रथम दृष्टया अदालत की अवमानना का मामला नहीं बनता। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि जमानत की शर्तों का उल्लंघन हो रहा है, तो संबंधित पक्ष जमानत निरस्तीकरण याचिका दायर कर सकता है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बुजुर्ग माता-पिता को संपत्ति बेचने से यूं ही नहीं रोका जा सकता, बच्चों को पहले साबित करने होंगे अधिकार: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि बच्चे मामूली आधार पर अदालत पहुंचकर अपने बुजुर्ग माता-पिता को संपत्ति का उपयोग करने या उसे बेचने से नहीं रोक सकते। अदालत ने कहा कि ऐसा करने से पहले बच्चों को यह प्रथम दृष्टया साबित करना होगा कि संपत्ति संयुक्त पारिवारिक संपत्ति है और उसमें उनका जन्मसिद्ध अधिकार मौजूद है।

    जस्टिस विवेक जैन की सिंगल बेंच ने निचली अपीलीय अदालत के आदेश को सही ठहराते हुए पिता की चार में से दो संपत्तियों को संयुक्त पारिवारिक संपत्ति माना जबकि बाकी दो संपत्तियों पर पिता को रोकने वाला अंतरिम आदेश हटा दिया।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    बालिग होने के बाद मुस्लिम पर्सनल लॉ विवाह की अनुमति दे सकता है, लिव-इन संबंध की नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि मुस्लिम पर्सनल लॉ में भले ही बालिग होने के बाद विवाह को मान्यता दी गई हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि विवाह के बिना लिव-इन संबंध को भी कानूनी स्वीकृति मिल जाती है। जस्टिस गरिमा प्रसाद ने कहा, “यदि मुस्लिम पर्सनल लॉ के कुछ मत बालिग होने पर विवाह को मान्यता देते हैं तो वह केवल विवाह से संबंधित है विवाह के बाहर लिव-इन व्यवस्था से नहीं।”

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    पोस्टमार्टम रिपोर्ट से तय नहीं होगी मृतक की उम्र, पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस को मिलेगी प्राथमिकता: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि किसी मृतक की उम्र तय करने के लिए पोस्टमार्टम रिपोर्ट पर नहीं, बल्कि पैन कार्ड और ड्राइविंग लाइसेंस जैसे सरकारी दस्तावेजों पर भरोसा किया जाएगा। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दर्ज उम्र केवल अनुमानित होती है, जबकि सरकारी एजेंसियों द्वारा जारी दस्तावेज अधिक विश्वसनीय माने जाएंगे। जस्टिस संदीप तनेजा ने यह टिप्पणी मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण के फैसले के खिलाफ दायर अपीलों की सुनवाई के दौरान की।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    अपराध से सीधे जुड़ाव के बिना पुलिस CrPC की धारा 102 के तहत बैंक अकाउंट ज़ब्त नहीं कर सकती: बॉम्बे हाईकोर्ट

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस, ज़ब्त की गई संपत्ति और कथित अपराध के बीच सीधा संबंध साबित किए बिना दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (CrPC) की धारा 102 के तहत बैंक अकाउंट्स को फ्रीज़ या ज़ब्त नहीं कर सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की कि अकाउंट्स को डी-फ्रीज़ करने का निर्देश देते समय फ्रीज़ की गई राशि के बराबर बैंक गारंटी देने की एक भारी शर्त लगाना, डी-फ्रीज़िंग के मूल उद्देश्य को ही विफल कर देता है।

    जस्टिस एन.जे. जमादार दो आपराधिक याचिकाओं की सुनवाई कर रहे थे। ये याचिकाएं अतिरिक्त मुख्य मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट द्वारा पारित एक आदेश से उत्पन्न हुई थीं, जिसमें आरोपी के बैंक अकाउंट्स और म्यूचुअल फंड यूनिटों को डी-फ्रीज़ करने का निर्देश दिया गया, लेकिन यह शर्त रखी गई थी कि आरोपी 6.55 करोड़ रुपये की बैंक गारंटी दे।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना जुआ मामले की जांच नहीं कर सकती पुलिस : इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने हाल ही में कहा कि सार्वजनिक स्थान या सड़क पर जुआ खेलने से जुड़ा Public Gambling Act, 1867 की धारा 13 के तहत अपराध गैर-संज्ञेय (Non-Cognizable) है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट की अनुमति के बिना पुलिस जांच शुरू नहीं कर सकती और बिना वारंट गिरफ्तारी भी नहीं की जा सकती। जस्टिस संजय कुमार पचौरी की एकलपीठ ने यह टिप्पणी करते हुए एक आरोपी के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही और समन आदेश को रद्द कर दिया।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    भर्ती के नतीजे घोषित होने के बाद उम्मीदवार आरक्षित उप-श्रेणी नहीं बदल सकता: पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने उम्मीदवार की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने भर्ती प्रक्रिया के नतीजे घोषित होने के बाद अपनी जाति की उप-श्रेणी में सुधार की मांग की थी। कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवार आवेदन के समय चुनी गई श्रेणी से बंधे होते हैं और बाद के चरण में इसमें बदलाव की मांग नहीं कर सकते।

    जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा, "सहानुभूति या निष्पक्षता भर्ती की निर्धारित शर्तों से ऊपर नहीं हो सकती। अगर स्पष्ट रोक वाले नियमों के बावजूद ऐसी मांगों पर विचार किया जाता है तो इससे मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी, जिससे सार्वजनिक रोजगार प्रक्रियाओं में अनिश्चितता पैदा होगी और चयन प्रक्रिया की पवित्रता को भी गंभीर नुकसान पहुंचेगा।"

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    लेबर कोर्ट ID Act की धारा 33C(2) के तहत TA/DA जैसे विवादित सर्विस अधिकारों पर फैसला नहीं दे सकती: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि इंडस्ट्रियल डिस्प्यूट्स एक्ट, 1947 (ID Act) की धारा 33C(2) के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करने वाली लेबर कोर्ट, विवादित सर्विस अधिकारों पर फैसला नहीं दे सकतीं; वे सिर्फ पहले से मौजूद अधिकारों की गणना या वसूली तक ही सीमित हैं। जस्टिस शैल जैन ने यह टिप्पणी इलाहाबाद बैंक की रिट याचिका को मंज़ूरी देते हुए की।

    इस याचिका में बैंक ने इंडस्ट्रियल ट्रिब्यूनल-कम-लेबर कोर्ट-II के 2007 के आदेश को चुनौती दी थी। उस आदेश में बैंक को निर्देश दिया गया था कि वह एक रिटायर कर्मचारी को ट्रैवलिंग अलाउंस (TA) के तौर पर ₹16,500 का भुगतान करे। यह कर्मचारी विभागीय जांचों में 'डिफेंस असिस्टेंट' के तौर पर काम कर चुका था।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Industrial Dispute | दिल्ली में एम्प्लॉयर का ऑफिस होना ही अपने आपमें दिल्ली के लेबर अधिकारियों को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं देता: हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला दिया कि औद्योगिक विवादों में "उचित सरकार" (Appropriate Government) की पहचान करने के लिए नौकरी की जगह और वह जगह जहां नौकरी खत्म होने का फैसला लागू होता है, ये दो मुख्य कारक होते हैं। जस्टिस शैल जैन ने यह टिप्पणी की कि दिल्ली में एम्प्लॉयर का ऑफिस होना ही अपने आप में दिल्ली के लेबर अधिकारियों को क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र नहीं दे देता।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    ड्यूटी पर जाते समय सड़क दुर्घटना में मारे गए पुलिस के सपोर्ट स्टाफ को पेंशन नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यूपी पुलिस के 'फॉलोअर' (सपोर्ट स्टाफ) के परिवार को पेंशन देने से इनकार किया, जिसकी ड्यूटी पर जाते समय एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। कोर्ट ने कहा कि सड़क दुर्घटनाएं 'उत्तर प्रदेश पुलिस (असाधारण पेंशन) नियमावली, 1961' के नियम 3 के दायरे में नहीं आतीं; यह नियम उन विशेष परिस्थितियों को बताता है जिनमें पेंशन दी जा सकती है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    केवल व्यभिचार के आरोप लगाकर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) के आरोप लगाकर उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि ऐसे आरोपों के समर्थन में ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद न हों।

    जस्टिस नीरजा के. कालसन ने कहा कि वैवाहिक मुकदमेबाजी को “चरित्र हनन” का मंच नहीं बनने दिया जा सकता, ताकि लंबित कार्यवाही के दौरान किसी जीवनसाथी को आर्थिक रूप से परेशान किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप, बिना मजबूत प्रथमदृष्टया सामग्री के, पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    उत्तराखंड ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम: गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए किसी सोसाइटी को ज़मीन हस्तांतरित करने हेतु पूर्व अनुमति अनिवार्य - हाईकोर्ट

    उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तराखंड में लागू 'उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950' की धारा 154 के तहत, गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए किसी सोसाइटी के पक्ष में ज़मीन का हस्तांतरण करने हेतु राज्य सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है; भले ही यह हस्तांतरण 'उपहार विलेख' (Gift Deed) के माध्यम से किया गया हो।

    कोर्ट ने टिप्पणी की कि धारा 154 के तहत वैधानिक प्रतिबंध केवल 'बिक्री' के माध्यम से होने वाले हस्तांतरण तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हस्तांतरण के सभी मान्यता प्राप्त तरीकों पर लागू होते हैं, जिसमें 'उपहार' भी शामिल है।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    गंभीर दुराचार न होने पर पति का पत्नी के साथ फिर से रहने से इनकार करना, HMA की धारा 23(1)(a) के तहत 'गलती' नहीं मानी जाएगी: एपी हाईकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि वैवाहिक अधिकारों की बहाली के आदेश (Decree) के बाद पति या पत्नी का साथ रहने से सिर्फ़ "इनकार" करना, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 23(1)(a) के अर्थ में "गलती" नहीं माना जाएगा, जिससे उस पति या पत्नी को तलाक़ मांगने के अधिकार से वंचित किया जा सके।

    कोर्ट ने कहा कि धारा 23(1)(a) के अर्थ में 'गलती' माने जाने के लिए, जिस आचरण का आरोप लगाया गया, वह फिर से साथ रहने के प्रस्ताव पर सहमत होने से सिर्फ़ इनकार करने से कहीं ज़्यादा होना चाहिए। यह इतना गंभीर दुराचार होना चाहिए जो कानून के तहत अन्यथा उपलब्ध राहत से वंचित करने के लिए पर्याप्त हो।

    आगे पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story