केवल व्यभिचार के आरोप लगाकर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

Praveen Mishra

12 May 2026 12:08 PM IST

  • केवल व्यभिचार के आरोप लगाकर पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता : पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट

    पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा है कि केवल पत्नी पर व्यभिचार (Adultery) के आरोप लगाकर उसे दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत अंतरिम भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता, जब तक कि ऐसे आरोपों के समर्थन में ठोस और कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद न हों।

    जस्टिस नीरजा के. कालसन ने कहा कि वैवाहिक मुकदमेबाजी को “चरित्र हनन” का मंच नहीं बनने दिया जा सकता, ताकि लंबित कार्यवाही के दौरान किसी जीवनसाथी को आर्थिक रूप से परेशान किया जाए। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल आरोप, बिना मजबूत प्रथमदृष्टया सामग्री के, पत्नी को अंतरिम भरण-पोषण के अधिकार से वंचित नहीं कर सकते।

    हाईकोर्ट एक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहा था, जिसमें फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत पत्नी को 3,000 रुपये प्रतिमाह और नाबालिग बेटे को 1,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भरण-पोषण देने का निर्देश दिया गया था।

    पति ने वैवाहिक संबंध या बच्चे को दिए गए भरण-पोषण पर विवाद नहीं किया, लेकिन दावा किया कि पत्नी कथित रूप से व्यभिचार में लिप्त है, इसलिए उसे भरण-पोषण नहीं मिलना चाहिए। इसके समर्थन में उसने पत्नी की एक अन्य पुरुष के साथ कुछ तस्वीरें पेश कीं।

    वहीं पत्नी की ओर से दलील दी गई कि तस्वीरों की गलत व्याख्या की जा रही है और वे किसी अवैध संबंध को प्रथमदृष्टया भी साबित नहीं करतीं। कहा गया कि केवल निराधार आरोपों के आधार पर विधिक रूप से विवाहित पत्नी को जीवनयापन के साधनों से वंचित नहीं किया जा सकता।

    हाईकोर्ट ने पति की दलील खारिज करते हुए कहा कि धारा 125 CrPC के तहत कार्यवाही एक सामाजिक कल्याणकारी व्यवस्था है, जिसका उद्देश्य आश्रित पत्नी और बच्चों को दरिद्रता से बचाना और सम्मानजनक जीवन सुनिश्चित करना है। अदालत ने कहा कि भरण-पोषण कोई दान नहीं, बल्कि कानूनी अधिकार है।

    कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि महिलाओं और बच्चों के हित में ऐसे प्रावधानों की उदार व्याख्या की जानी चाहिए।

    अदालत ने यह भी कहा कि अंतरिम भरण-पोषण के चरण पर व्यभिचार जैसे विवादित आरोपों पर “मिनी ट्रायल” नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसे मुद्दों के लिए विस्तृत साक्ष्य और मुकदमे की आवश्यकता होती है।

    फोटो संबंधी दलील पर कोर्ट ने कहा कि किसी महिला की किसी अन्य व्यक्ति के साथ तस्वीरें, चाहे सामाजिक कार्यक्रमों में हों या बच्चे के साथ, अपने आप व्यभिचार का प्रमाण नहीं मानी जा सकतीं।

    कोर्ट ने कहा कि व्यभिचार के आरोप गंभीर होते हैं और इनके सामाजिक व नागरिक परिणाम लंबे समय तक रहते हैं, इसलिए केवल अनुमान या अस्पष्ट सामग्री के आधार पर ऐसे निष्कर्ष नहीं निकाले जा सकते।

    इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के आदेश को सही ठहराते हुए पति की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी।

    Praveen Mishra

    Praveen Mishra

    प्रवीण मिश्रा Law Graduate हैं और लाइव लॉ हिंदी से जुड़े हैं। वे सुप्रीम कोर्ट, उच्च न्यायालयों, उपभोक्ता आयोगों और अन्य न्यायिक मंचों के महत्वपूर्ण फैसलों एवं कानूनी घटनाक्रमों पर लेखन करते हैं। उनका उद्देश्य जटिल कानूनी विषयों और न्यायिक निर्णयों को सरल, सटीक और तथ्यपरक भाषा में हिंदी पाठकों तक पहुंचाना है।

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