हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

  • हाईकोर्ट वीकली राउंड अप : पिछले सप्ताह के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र

    देश के विभिन्न हाईकोर्ट में पिछले सप्ताह (12 अक्टूबर, 2026 से 16 अक्टूबर, 2026) तक क्या कुछ हुआ, जानने के लिए देखते हैं हाईकोर्ट वीकली राउंड अप। पिछले सप्ताह हाईकोर्ट के कुछ खास ऑर्डर/जजमेंट पर एक नज़र।

    सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से जानकारी न मिलने पर GAC अकाउंट सस्पेंशन की अपीलों को खारिज नहीं कर सकता: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार द्वारा गठित डिजिटल नियामक संस्था, ग्रिवेंस अपीलेट कमिटी (GAC), यूजर्स की अपीलों को केवल इसलिए खारिज नहीं कर सकती, क्योंकि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जरूरी जानकारी देने में विफल रहे हैं।

    जस्टिस अमित महाजन ने कहा कि कमिटी के पास सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म को यह निर्देश देने की पर्याप्त शक्तियां हैं कि वे जानकारी दें और स्पष्ट करें कि किसी खास कंटेंट या यूजर के अकाउंट को क्यों हटाया या सस्पेंड किया गया, या यूजर की शिकायत को पहले क्यों खारिज कर दिया गया।

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    वैध अनुमति के बिना फैक्ट्री चलाना अपराध, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बिना कारण बताओ नोटिस दिए तत्काल बंद करा सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट

    मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि वैध अनुमति के बिना फैक्ट्री चलाना अपराध है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए तत्काल फैक्ट्री बंद करने का आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में कारण बताओ नोटिस जारी करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि अवैध रूप से फैक्ट्री चलाने वाले संचालक को नोटिस न दिए जाने से उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।

    इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने एक स्टील फैक्ट्री की याचिका खारिज की, जिसमें बिना कारण बताओ नोटिस दिए फैक्ट्री बंद करने के आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया।

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    फैमिली पेंशन का अधिकार सेवा नियमों से तय होगा, उत्तराधिकार कानून से नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की अर्जी पर सुनवाई करने वाली अदालत यह अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती कि किसी मृत कर्मचारी की पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य रिटायरमेंट लाभ पाने का हकदार कौन है। ये अधिकार संबंधित सेवा नियमों से तय होते हैं और इन पर फैसला सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के आधार पर करना होगा, न कि उत्तराधिकार के सामान्य कानून के आधार पर।

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    इस्तीफे से खाली हुए पदों को वेटिंग लिस्ट से नहीं भरा जा सकता, इसके लिए नई भर्ती प्रक्रिया जरूरी: राजस्थान हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी नौकरियों में अगर कोई उम्मीदवार जॉइन नहीं करता है या बाद में इस्तीफा दे देता है तो खाली हुए पदों को 'नई रिक्तियां' (Fresh Vacancies) माना जाएगा। इन पदों को भरने के लिए एक नई भर्ती प्रक्रिया अपनानी होगी, न कि पुरानी भर्ती प्रक्रिया के तहत बनी रिज़र्व या वेटिंग लिस्ट का इस्तेमाल करके।

    चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की खंडपीठ ने कहा कि किसी भर्ती प्रक्रिया की रिज़र्व या वेटिंग लिस्ट में शामिल होने मात्र से कोई उम्मीदवार इन खाली पदों पर नियुक्ति का अधिकार नहीं जता सकता।

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    विशेष परिस्थितियों के बिना पिता 'हेबियस कॉर्पस' याचिका के जरिए बच्चे की कस्टडी नहीं मांग सकते: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

    आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक पिता की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने 'हेबियस कॉर्पस' (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका के जरिए अपनी पत्नी से अपने चार साल के बेटे की कस्टडी मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि बच्चे का अपनी सगी माँ के पास रहना गैर-कानूनी नहीं माना जा सकता। साथ ही कोर्ट को ऐसी कोई विशेष परिस्थिति नहीं मिली, जिसके आधार पर बच्चे की कस्टडी बदली जाए।

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    बिहार पेंशन नियमों के तहत रिटायरमेंट के बाद 4 साल से पुरानी गड़बड़ी के लिए विभागीय कार्यवाही पर रोक: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी के रिटायरमेंट के बाद विभागीय कार्यवाही शुरू की जाती है तो बिहार पेंशन नियमों का नियम 43(b) ऐसी कार्यवाही शुरू करने से रोकता है, अगर वह घटना कार्यवाही शुरू होने से चार साल से ज़्यादा पहले हुई हो।

    जस्टिस कुमार मनीष की सिंगल जज बेंच उमेश कुमार वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने अपने खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्यवाही, बाद में उसे बिहार पेंशन नियमों के नियम 43(b) के तहत बदलने, जांच की कार्यवाही और उनकी पेंशन से 75% कटौती के आदेश को चुनौती दी।

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    68 वर्षीय विधवा मां को छोड़ने के लिए इकलौते बेटे पर दबाव बनाना मानसिक क्रूरता: इलाहाबाद हाईकोर्ट

    इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि पत्नी द्वारा अपने पति पर बार-बार इस बात का दबाव बनाना कि वह अपनी 68 वर्षीय विधवा मां को छोड़कर अलग घर में रहे, मानसिक क्रूरता है। ऐसी स्थिति में पति हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13 के तहत तलाक पाने का हकदार है।

    जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस इंद्रजीत शुक्ला की खंडपीठ ने कहा, “अपने जीवन के अंतिम पड़ाव में पहुंच चुकी अपीलकर्ता की मां को उसके बेटे के साथ से वंचित करने का प्रयास प्रतिवादी की ओर से किया गया क्रूर कृत्य है।”

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    कपड़े-बर्तन धुलवाने पर बहू ने ससुराल वालों पर किया केस, हाईकोर्ट ने कहा- IPC की धारा 498A के तहत क्रूरता नहीं

    बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक परिवार के छह सदस्यों के खिलाफ FIR रद्द करते हुए कहा कि ससुराल वालों का बहू से कपड़े और बर्तन धोने जैसे घर के काम करवाना भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498-A के तहत क्रूरता नहीं माना जाएगा और इस आरोप पर उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता।

    कोल्हापुर बेंच में बैठे जस्टिस अभय मंत्री ने शिकायतकर्ता महिला के उस आरोप पर गौर किया, जिसमें कहा गया कि उसका पति उसे कल्याण-बदलापुर में अपनी एक बहन (शिकायतकर्ता की ननद) के घर ले गया था, जहाँ उससे घर के काम करने के लिए कहा गया। जज को इन आरोपों में कोई आधार नहीं मिला, क्योंकि 2025 में दर्ज FIR में नामजद सास-ससुर, ननद या देवर/जेठ की कोई खास भूमिका नहीं बताई गई।

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    कर्नाटक हाईकोर्ट ने SC-ST आरक्षण बढ़ाने वाला कानून रद्द किया, कहा- 50% की सीमा का उल्लंघन असंवैधानिक

    कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य में अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए शिक्षा संस्थानों में दाखिले और सरकारी नौकरियों में आरक्षण बढ़ाने वाले कानून के प्रावधानों को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया। कानून के तहत एससी आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और एसटी आरक्षण 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया गया था। इससे राज्य में कुल आरक्षण 50 प्रतिशत से बढ़कर 56 प्रतिशत हो गया था।

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    शादी से पहले की दिव्यांगता पत्नी और बच्चे के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बचने का आधार नहीं: दिल्ली हाईकोर्ट

    दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा कि पति केवल अपनी दिव्यांगता का हवाला देकर पत्नी और नाबालिग बच्चे सहित अपने परिवार के भरण-पोषण की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। कोर्ट ने यह टिप्पणी 100 प्रतिशत दिव्यांगता से ग्रस्त एक ऐसे व्यक्ति के मामले में की, जो पूरी तरह सुनने में असमर्थ है और बोल भी नहीं सकता। हालांकि, जस्टिस संजीव नरूला ने उसकी अंतरिम भरण-पोषण राशि 8,000 रुपये से घटाकर 6,000 रुपये प्रतिमाह की।

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    पहले ही जमानत पर रिहा हो चुका आरोपी दोबारा अग्रिम जमानत नहीं मांग सकता, सरेंडर कर नियमित जमानत लेनी होगी: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि जो आरोपी अग्रिम जमानत मिलने के बाद संबंधित अदालत में सरेंडर कर जमानत बांड जमा कर चुका है और जमानत पर रिहा हो गया, वह बाद में दोबारा अग्रिम जमानत की मांग नहीं कर सकता। ऐसे आरोपी को अदालत में सरेंडर कर नियमित जमानत के लिए आवेदन करना होगा।

    जस्टिस जितेंद्र कुमार की एकलपीठ गौरा थाना कांड संख्या 54/2024 से जुड़े अग्रिम जमानत आवेदन पर सुनवाई कर रही थी। यह मामला भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 384 के तहत दर्ज किया गया था।

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    JJ Act के तहत सज़ा कम होने पर पीड़ित अपील नहीं कर सकता; सही रास्ता 'रिविज़न' है: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि कोई पीड़ित या शिकायत करने वाला व्यक्ति सज़ा कम होने के आधार पर उसे बढ़ाने के लिए अपील नहीं कर सकता। इसके बजाय, सही तरीका जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 (JJ Act) की धारा 102 के तहत क्रिमिनल रिविज़न (आपराधिक पुनरीक्षण) याचिका दायर करना है।

    जस्टिस जितेंद्र कुमार की सिंगल जज बेंच, छपरा (सारण) में पहले एडिशनल सेशंस जज (Children Court Case No. 05 of 2023) द्वारा 26.03.2026 को पारित आदेश के खिलाफ शिकायतकर्ता द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी।

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