फैमिली पेंशन का अधिकार सेवा नियमों से तय होगा, उत्तराधिकार कानून से नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट
Amir Ahmad
16 Oct 2026 12:59 PM IST

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 372 के तहत उत्तराधिकार प्रमाणपत्र जारी करने की अर्जी पर सुनवाई करने वाली अदालत यह अंतिम रूप से तय नहीं कर सकती कि किसी मृत कर्मचारी की पारिवारिक पेंशन, ग्रेच्युटी और अन्य रिटायरमेंट लाभ पाने का हकदार कौन है। ये अधिकार संबंधित सेवा नियमों से तय होते हैं और इन पर फैसला सक्षम प्राधिकारी को लागू नियमों के आधार पर करना होगा, न कि उत्तराधिकार के सामान्य कानून के आधार पर।
जस्टिस अनिल कुमार-X ने स्पष्ट किया कि मृत व्यक्ति का कानूनी वारिस कौन है और किसी विशेष सेवा लाभ को पाने का हकदार कौन है, ये दोनों अलग-अलग सवाल हैं। कानूनी वारिस होने का निर्धारण उत्तराधिकार कानून के तहत हो सकता है जबकि किसी खास सेवा लाभ का अधिकार उस लाभ पर लागू वैधानिक नियमों के अनुसार तय किया जाएगा।
मामले में अपीलकर्ता शशि ने उत्तर प्रदेश पुलिस में कांस्टेबल रहे दिवंगत सुशील कुमार के विभाग के पास जमा 2,64,521 रुपये में आधे हिस्से के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मांगा था। यह रकम पेंशन, ग्रेच्युटी, समूह बीमा और अन्य सेवा लाभों से संबंधित थी।
शशि का दावा था कि उनकी शादी सुशील कुमार से 16 जून 1994 को हुई और वह तथा सुशील कुमार की मां सोना देवी ही उनके कानूनी वारिस थे। हालांकि, सोना देवी और अन्य लोगों ने इस दावे का विरोध किया। उन्होंने देव सहगल को सुशील कुमार का बेटा बताया, जिसका जन्म मन्नू देवी के साथ उनके संबंध से हुआ।
ट्रायल कोर्ट ने शशि को सुशील कुमार की कानूनी रूप से विवाहित पत्नी माना और कहा कि अलग रहने से पत्नी का यह दर्जा अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। पारिवारिक रजिस्टर और अन्य दस्तावेजों के आधार पर अदालत ने देव सहगल को भी सुशील कुमार का बेटा माना।
हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 का हवाला देते हुए अदालत ने उसे पिता के सेवा लाभों का हकदार माना था। नाबालिग देव को उसके अभिभावक सोना देवी के माध्यम से फैमिली पेंशन देने का निर्देश दिया गया। वहीं, ग्रेच्युटी, सामान्य भविष्य निधि (GPF) और समूह बीमा की रकम शशि, सोना देवी और नाबालिग के बीच देय मानी गई।
हाईकोर्ट में शशि की ओर से दलील दी गई कि नाबालिग देव कानूनी वारिस नहीं है और उत्तर प्रदेश पुलिस असाधारण पेंशन नियम, 1961 के तहत फैमिली पेंशन मृत कर्मचारी की विधवा को मिलनी चाहिए।
दूसरी ओर, प्रतिवादियों ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 16 के तहत अमान्य विवाह से जन्मे बच्चे को वैध संतान का दर्जा मिलता है और उसे अपने पिता के सेवा लाभों से वंचित नहीं किया जा सकता।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि पेंशन और मृत्यु के बाद मिलने वाले अन्य सेवा लाभ कानून के तहत बनाए गए अलग प्रकार के अधिकार हैं। ये लाभ कर्मचारी की जिंदगी में उसकी निजी संपत्ति का हिस्सा नहीं होते, बल्कि संबंधित नियम यह तय करते हैं कि किसे परिवार का सदस्य माना जाएगा और कौन किसी खास लाभ को पाने का पात्र होगा।
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जोध सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया और श्रीमती वायलेट इसाक बनाम यूनियन ऑफ इंडिया मामलों का भी उल्लेख किया।
इन फैसलों में स्पष्ट किया गया कि फैमिली पेंशन संबंधित नियमों के तहत पात्र व्यक्ति की स्थिति के आधार पर मिलती है, न कि मृत व्यक्ति की संपत्ति के हिस्से के रूप में।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब नियम बनाने वाले प्राधिकारी ने किसी लाभ के लिए पात्र व्यक्तियों की श्रेणी स्पष्ट रूप से तय की तो उत्तराधिकार के सामान्य कानून का इस्तेमाल करके उस श्रेणी का विस्तार नहीं किया जा सकता। इसलिए कोई व्यक्ति मृतक का कानूनी वारिस होने के बावजूद किसी विशेष सेवा लाभ का हकदार न भी हो सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि उत्तराधिकार अधिनियम के भाग 10 के तहत जारी होने वाला उत्तराधिकार प्रमाणपत्र मुख्य रूप से कर्ज और प्रतिभूतियों से संबंधित होता है। इसलिए निचली अदालत पक्षकारों के वारिस होने की स्थिति के आधार पर फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का अंतिम अधिकार तय नहीं कर सकती थी। इसी तरह, देव सहगल का सुशील कुमार का बेटा होना अपने आप उसे सेवा नियमों के विपरीत फैमिली पेंशन पाने का अधिकार नहीं देता।
इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार की और सहारनपुर के अपर जिला जज, कोर्ट नंबर 10 के 24 सितंबर 2011 के आदेश को उस सीमा तक रद्द किया, जिसमें फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभों का अंतिम हकदार तय किया गया।
अदालत ने निर्देश दिया कि सक्षम प्राधिकारी सभी पक्षों के दावों पर लागू सेवा नियमों के अनुसार नए सिरे से फैसला करे और निचली अदालत की उन टिप्पणियों से प्रभावित न हो, जिन्हें हाईकोर्ट ने इस संबंध में रद्द किया।

