वैध अनुमति के बिना फैक्ट्री चलाना अपराध, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड बिना कारण बताओ नोटिस दिए तत्काल बंद करा सकता है: मध्य प्रदेश हाईकोर्ट
Amir Ahmad
16 Oct 2026 3:56 PM IST

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि वैध अनुमति के बिना फैक्ट्री चलाना अपराध है और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड पर्यावरण को होने वाले नुकसान को रोकने के लिए तत्काल फैक्ट्री बंद करने का आदेश दे सकता है। ऐसी स्थिति में कारण बताओ नोटिस जारी करना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि अवैध रूप से फैक्ट्री चलाने वाले संचालक को नोटिस न दिए जाने से उसके किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।
इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने एक स्टील फैक्ट्री की याचिका खारिज की, जिसमें बिना कारण बताओ नोटिस दिए फैक्ट्री बंद करने के आदेश को प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन बताया गया।
जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस जय कुमार पिल्लई की खंडपीठ ने कहा कि जिस व्यक्ति का कोई कानूनी अधिकार प्रभावित हो रहा है, उसे सुनवाई का अवसर दिए जाने का सवाल तभी उठता है, जब उसके पास संबंधित अधिकार मौजूद हो।
इस मामले में फैक्ट्री चलाने की अनुमति 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई, जबकि बंद करने का आदेश 27 अगस्त 2026 को जारी किया गया। इसलिए आदेश जारी होने के समय फैक्ट्री के पास संचालन की वैध अनुमति नहीं थी।
मामला टीएमटी स्टील बार बनाने वाली एक निजी कंपनी से जुड़ा है। कंपनी को 21 अप्रैल 2025 को फैक्ट्री चलाने की अनुमति दी गई थी, जो 31 मार्च 2026 तक वैध थी। अनुमति में स्पष्ट शर्त रखी गई थी कि कंपनी छह महीने के भीतर अपनी दोनों इंडक्शन भट्टियों में 'डॉग हाउस टाइप' धुआं निकासी प्रणाली लगाएगी, ताकि उत्पादन के दौरान निकलने वाले धुएं को प्रभावी ढंग से नियंत्रित किया जा सके।
कंपनी ने 28 मार्च 2026 को अनुमति के नवीनीकरण के लिए आवेदन किया। हालांकि, 14 अप्रैल 2026 को फैक्ट्री का निरीक्षण करने के बाद अधिकारियों ने कई कमियां पाईं। इनमें धुआं निकासी प्रणाली लगाने से संबंधित शर्त का पालन न करना भी शामिल था। इसके बाद कंपनी के आवेदन को अस्वीकार कर दिया गया।
प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने वायु प्रदूषण निवारण एवं नियंत्रण अधिनियम की धारा 31ए के तहत फैक्ट्री बंद करने और उसकी बिजली आपूर्ति काटने का आदेश भी जारी किया।
कंपनी ने इसके खिलाफ अपना पक्ष रखते हुए धुआं निकासी प्रणाली को बेहतर बनाने के लिए 90 दिन का समय मांगा और 17 लाख रुपये की बैंक गारंटी जमा की।
बैंक गारंटी के आधार पर बोर्ड ने 16 जून 2026 को सशर्त आदेश जारी किया। इसके तहत पहले के बंदी आदेश पर रोक लगाते हुए कंपनी को 31 जुलाई 2026 तक धुआं निकासी प्रणाली में सुधार करने की अनुमति दी गई। इसके बाद कंपनी ने 13 अगस्त 2026 को फैक्ट्री संचालन की नई अनुमति के लिए आवेदन किया। बोर्ड ने 19 अगस्त को फिर निरीक्षण किया।
इसी बीच शिकायतें मिलने पर धार के कलेक्टर ने अचानक फैक्ट्री का निरीक्षण किया। इस दौरान पाया गया कि प्रदूषण नियंत्रण के लिए लगाए गए उपकरण ठीक से काम नहीं कर रहे थे। इसके बाद बोर्ड ने कंपनी की बैंक गारंटी भुना ली और 27 अगस्त 2026 को फैक्ट्री बंद करने का आदेश जारी कर दिया। बोर्ड ने 11 सितंबर 2026 को संचालन की अनुमति के लिए कंपनी का अन्य आवेदन भी खारिज किया।
कंपनी की ओर से सीनियर एडवोकेट ने हाईकोर्ट में दलील दी कि बंदी आदेश अधिकार क्षेत्र के बाहर जारी किया गया। उनका कहना था कि वायु अधिनियम की धारा 4 के तहत ऐसे आदेश जारी करने का अधिकार पूरे बोर्ड को है, न कि केवल उसके चेयरमैन को।
उन्होंने यह भी कहा कि फैक्ट्री बंद करने से पहले कारण बताओ नोटिस नहीं दिया गया और न ही कंपनी को अपना पक्ष रखने का अवसर मिला। इसलिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन हुआ।
दूसरी ओर, राज्य और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि कंपनी के पास वैकल्पिक कानूनी उपाय उपलब्ध है। वायु अधिनियम की धारा 31 के तहत संबंधित अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष अपील की जा सकती है।
यह भी कहा गया कि कंपनी ऑरेंज श्रेणी का बड़ा उद्योग चलाती है, जिसमें लोहे को अत्यधिक तापमान पर पिघलाया जाता है। इस प्रक्रिया में खतरनाक धुआं और हानिकारक कचरा निकल सकता है। इसके बावजूद कंपनी ने निर्धारित समय में आवश्यक धुआं निकासी प्रणाली लगाने की शर्त का पालन नहीं किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि पूरे विवाद की शुरुआत अप्रैल 2025 में दी गई संचालन अनुमति से हुई, जिसमें धुआं निकासी प्रणाली लगाने की शर्त स्पष्ट रूप से रखी गई।
अदालत ने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से जुड़ी दलील खारिज करते हुए कहा कि सुनवाई का अधिकार कोई ऐसा कठोर नियम नहीं है, जिसे हर परिस्थिति में एक ही तरह लागू किया जाए। इसका निर्धारण मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर होता है।
पीठ ने स्पष्ट किया कि फैक्ट्री की संचालन अनुमति 31 मार्च 2026 को समाप्त हो गई थी और 27 अगस्त को बंदी आदेश जारी होने के समय उसके पास वैध अनुमति नहीं थी। ऐसे में कारण बताओ नोटिस जारी न करने से कंपनी के किसी कानूनी अधिकार का उल्लंघन नहीं हुआ।
चेयरमैन द्वारा बंदी आदेश जारी किए जाने के अधिकार पर भी अदालत ने कंपनी की दलील स्वीकार नहीं की। पीठ ने कहा कि आपात स्थिति में प्रदूषण रोकने के लिए चेयरमैन तत्काल कदम उठा सकते हैं और बाद में इन कदमों को बोर्ड के समक्ष रखा जा सकता है।
अदालत ने यह भी कहा कि खुली इंडक्शन भट्टियों से होने वाला प्रदूषण गंभीर हो सकता है और जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए अधिकारियों को तेजी से कार्रवाई करनी पड़ती है।
निरीक्षण रिपोर्टों की तुलना करते हुए अदालत ने टिप्पणी की कि उत्पादन के दौरान यदि कोई मशीन चालू ही नहीं की जाती, तो केवल उसका फैक्ट्री में मौजूद होना बेकार है। पीठ ने कहा कि पर्यावरण संबंधी कानूनों का सख्ती से पालन करना जरूरी है। वायु अधिनियम की धारा 21(4) के तहत राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को निर्धारित परिस्थितियों में संचालन की अनुमति रद्द करने का अधिकार भी प्राप्त है।
अंत में हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी मूल अनुमति में लगाई गई अनिवार्य शर्त का पालन करने में विफल रही और मार्च 2026 के बाद वैध सहमति के बिना फैक्ट्री चलाती रही। इसलिए बोर्ड ने पर्यावरण और जनस्वास्थ्य की रक्षा के लिए उचित कार्रवाई की।
अदालत ने याचिका खारिज की, लेकिन कंपनी को फैक्ट्री संचालन की अनुमति के लिए नए सिरे से आवेदन करने की छूट दी।

