बिहार पेंशन नियमों के तहत रिटायरमेंट के बाद 4 साल से पुरानी गड़बड़ी के लिए विभागीय कार्यवाही पर रोक: पटना हाईकोर्ट

  • बिहार पेंशन नियमों के तहत रिटायरमेंट के बाद 4 साल से पुरानी गड़बड़ी के लिए विभागीय कार्यवाही पर रोक: पटना हाईकोर्ट

    पटना हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी सरकारी कर्मचारी के रिटायरमेंट के बाद विभागीय कार्यवाही शुरू की जाती है तो बिहार पेंशन नियमों का नियम 43(b) ऐसी कार्यवाही शुरू करने से रोकता है, अगर वह घटना कार्यवाही शुरू होने से चार साल से ज़्यादा पहले हुई हो।

    जस्टिस कुमार मनीष की सिंगल जज बेंच उमेश कुमार वर्मा की रिट याचिका पर सुनवाई कर रही थी। उन्होंने अपने खिलाफ शुरू की गई विभागीय कार्यवाही, बाद में उसे बिहार पेंशन नियमों के नियम 43(b) के तहत बदलने, जांच की कार्यवाही और उनकी पेंशन से 75% कटौती के आदेश को चुनौती दी।

    याचिकाकर्ता को 1979 में बिहार प्रशासनिक सेवा में डिप्टी कलेक्टर के तौर पर नियुक्त किया गया और वu 31.12.2014 को अतिरिक्त सचिव के पद पर सैनिक कल्याण निदेशालय, पटना के निदेशक के तौर पर काम करते हुए रिटायर हुए। 12.12.2006 से 20.10.2009 तक अररिया में डिप्टी डेवलपमेंट कमिश्नर-सह-चीफ एग्जीक्यूटिव ऑफिसर, जिला ग्रामीण विकास एजेंसी के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान, उन पर MPLADS और MLA लोकल एरिया डेवलपमेंट स्कीम के तहत हाई मास्ट लैंप लगाने के काम और एडवांस पेमेंट को लेकर कुछ गड़बड़ियों का आरोप लगाया गया।

    अररिया के जिलाधिकारी ने 28.10.2014 को आरोप सौंपे, जिन्हें बाद में सामान्य प्रशासन विभाग को भेज दिया गया। हालांकि, याचिकाकर्ता के रिटायरमेंट से दो दिन पहले, 29.12.2014 को कथित तौर पर एक विभागीय प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए गए, लेकिन याचिकाकर्ता का कहना था कि उनकी सेवा के दौरान उन्हें यह कभी नहीं सौंपा गया।

    राज्य ने तर्क दिया कि कार्यवाही 29.12.2014 को शुरू की गई, जब याचिकाकर्ता अभी भी सेवा में थे, और 31.12.2014 को एक विशेष मैसेंजर के ज़रिए प्रस्ताव सौंपने की कोशिश की गई।

    हाईकोर्ट ने मूल रिकॉर्ड की जांच की और पाया कि रिटायरमेंट से पहले याचिकाकर्ता को प्रस्ताव सौंपे जाने की पुष्टि करने वाली कोई समकालीन एंट्री नहीं थी। इसके बजाय, स्पीड पोस्ट के रिकॉर्ड से पता चला कि चार्ज-मेमो 09.01.2015 को भेजा गया और याचिकाकर्ता को 10.01.2015 को मिला, जबकि वह 31.12.2014 को रिटायर हो चुके थे।

    इसलिए कोर्ट ने माना कि इस कार्यवाही को रिटायरमेंट से पहले की कार्यवाही का ही हिस्सा नहीं माना जा सकता; यह रिटायरमेंट के बाद की कार्यवाही थी जो बिहार पेंशन नियमों के नियम 43(b) के तहत आती थी। कोर्ट ने देखा कि नियम 43(b) का प्रावधान साफ ​​तौर पर पेंशनभोगी के खिलाफ ऐसी घटना के लिए विभागीय कार्यवाही शुरू करने से रोकता है जो कार्यवाही शुरू होने से चार साल से भी पहले हुई हो।

    इदरीस अंसारी मामले में तय सिद्धांत को लागू करते हुए कोर्ट ने माना कि चूंकि कथित अनियमितताएं 2006-2009 की अवधि से जुड़ी थीं और कार्यवाही 10.01.2015 को शुरू की गई, इसलिए कानूनन तय चार साल की अवधि पार हो चुकी थी। इसलिए कार्यवाही को "पूरी तरह से गलतफहमी पर आधारित, अधिकार क्षेत्र से बाहर, शुरू से ही अमान्य और कानूनी रूप से टिकने लायक नहीं" माना गया।

    कोर्ट को अनुशासनात्मक कार्यवाही में और भी कमियां मिलीं। उसने देखा कि 28.04.2015 के प्रशासनिक फॉरवर्डिंग नोट के जरिए आरोपों को चार से बढ़ाकर छह कर दिया गया, जबकि बिहार सरकारी कर्मचारी (वर्गीकरण, नियंत्रण और अपील) नियम, 2005 के नियम 17(3) के तहत अनुशासनात्मक प्राधिकरण द्वारा औपचारिक कार्यकारी प्रस्ताव की आवश्यकता थी। नतीजतन, अतिरिक्त आरोपों को शुरू से ही अमान्य माना गया।

    कोर्ट ने आगे यह भी माना कि एकतरफा (ex-parte) कार्यवाही के दौरान याचिकाकर्ता की अनुपस्थिति को अपने आप अपराध स्वीकार करने जैसा नहीं माना जा सकता। व्यक्तिगत गलत बयानी या जानबूझकर की गई लापरवाही दिखाने वाले स्वतंत्र सबूतों के अभाव में, उनके खिलाफ निष्कर्षों को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

    कोर्ट ने यह भी पाया कि अनुशासनात्मक प्राधिकरण बिहार CCA नियमों के नियम 18(4) के तहत जरूरी याचिकाकर्ता के लिखित बचाव और दस्तावेजी सबूतों पर ठीक से विचार करने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की बात पर "विचार" करने की ज़रूरत का मतलब है कि उठाए गए खास बचाव पर ठीक से सोच-विचार किया जाए; सिर्फ़ उसकी प्राप्ति की सूचना देने या एक जैसा (टेम्पलेट) आदेश जारी करने से यह ज़रूरत पूरी नहीं होती। इसलिए कोर्ट ने विभागीय कार्यवाही और याचिकाकर्ता की पेंशन में 75% कटौती करने वाले अंतिम सज़ा का आदेश रद्द किया।

    लंबे समय तक हुई देरी और प्रक्रिया में हुई कमियों पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने संबंधित विभाग को निर्देश दिया कि वह एक आंतरिक प्रशासनिक जांच करे ताकि ज़िम्मेदार अधिकारियों की पहचान की जा सके, उनकी व्यक्तिगत जवाबदेही तय की जा सके और अगर जानबूझकर देरी या लापरवाही पाई जाए तो उचित कार्रवाई की जा सके।

    प्रतिवादियों को यह भी निर्देश दिया गया कि वह आठ हफ़्ते के भीतर याचिकाकर्ता की पूरी पेंशन बहाल करें और रोके गए सभी पेंशन संबंधी लाभ - जैसे बकाया राशि, ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाली अन्य रकम - 6% सालाना की वैधानिक ब्याज दर के साथ जारी करें।

    Case Title : Umesh Kr. Verma v. State of Bihar and Ors

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