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NI Act में किसी इंस्ट्रूमेंट की पार्टी का अपनी जिम्मेदारी से डिस्चार्ज होना
कुछ कंडीशन ऐसी हैं जिनमे किसी भी इंस्ट्रूमेंट के पक्षकार अपनी ज़िम्मेदारी से डिस्चार्ज हो जाते हैं फिर उन पर इंस्ट्रूमेंट की जिम्मेदारी नहीं होती है।(क) रचयिता एवं प्रतिग्रहीता-जहाँ धारक वचन पत्र के या विनिमय पत्र प्रतिग्रहीता को दायित्व से निर्मुक्त करता है, वहाँ इंस्ट्रूमेंट स्वयं में डिस्चार्ज हो जाता है, क्योंकि इंस्ट्रूमेंट में ये मुख्य ऋणी होते हैं।(ख) पृष्ठांकक/पृष्ठांककों को-जहाँ धारक किसी पृष्ठांकक या पृष्ठांककों ने नाम को निर्मुक्त करता है वहाँ ऐसे धारक के अधीन हक व्युत्पन्न करने वाले...
NI Act की धारा 82 के प्रावधान
इस एक्ट की यह धारा इंस्ट्रूमेंट की पार्टियों के डिस्चार्ज के संबंध में बात करती है। परक्राम्य लिखतों के सम्बन्ध में उन्मुक्ति दो तरह से प्रयुक्त की जाती है-इंस्ट्रूमेंट की स्वयं में उन्मुक्तिइंस्ट्रूमेंट के कुछ पक्षकारों की उन्मुक्तिजब तब परक्राम्य इंस्ट्रूमेंट अस्तित्व में एवं विधिमान्य होता है इससे कतिपय कार्यवाही के अधिकार होते हैं, परन्तु जब इन अधिकारों की समाप्ति हो जाती है तो इंस्ट्रूमेंट उन्मुक्त हो जाता है।परक्राम्य लिखतें अर्थात वचन पत्र, विनिमय पत्र एवं चेक उन्मुक्त हो जाते हैं, जब...
किराए में संशोधन से जुड़ी परिस्थितियाँ – राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 22-D
राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम, 2001 (Rajasthan Rent Control Act, 2001) को 2017 में हुए संशोधन (Amendment) के बाद अधिक व्यावहारिक और संतुलित बनाया गया है, ताकि मकान मालिक (Landlord) और किरायेदार (Tenant) दोनों के अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बना रहे। इन संशोधनों के तहत कई नयी धाराएं जोड़ी गईं, जिनमें से एक महत्वपूर्ण धारा है – धारा 22-D, जो कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में किराए के पुनर्निरीक्षण (Revision) से संबंधित है।इस धारा को पूरी तरह समझने के लिए हमें इससे पहले की कुछ धाराओं पर भी...
क्या Criminal Case लंबित होने पर Appellate Court Dismissal को टाल सकता है?
Eastern Coalfields Limited बनाम Rabindra Kumar Bharti [2022 LiveLaw (SC) 374] में सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि जब एक कर्मचारी के खिलाफ एक ही समय पर Departmental Inquiry (विभागीय जांच) और Criminal Trial (आपराधिक मुकदमा) चल रहा हो, तो क्या Appellate Court (अपील अदालत) उसके Dismissal (निलंबन/बर्खास्तगी) को Criminal Case की समाप्ति तक टाल सकती है।इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन प्रमुख कानूनी सिद्धांतों को दोहराया जो यह बताते हैं कि Departmental Proceedings (विभागीय कार्यवाही) और Criminal...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 415: सजा के खिलाफ अपील का अधिकार
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita - BNSS) के तहत भारत की आपराधिक न्याय व्यवस्था में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए हैं। इस संहिता का अध्याय 31 (Chapter XXXI) "अपीलें" (Appeals) से संबंधित है। इसी अध्याय की धारा 415 (Section 415) में यह बताया गया है कि सजा पाए व्यक्ति को किन परिस्थितियों में और किस न्यायालय में अपील करने का अधिकार है।अपील (Appeal) कानून में एक बहुत ज़रूरी उपाय (Remedy) है, जो किसी दोषसिद्ध व्यक्ति (Convicted Person) को अदालत के फैसले के खिलाफ अपनी...
चल संपत्ति से संबंधित वादों में न्यायालय शुल्क की गणना : धारा 23 राजस्थान न्यायालय शुल्क मूल्यांकन अधिनियम
राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम के अंतर्गत धारा 23 एक महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो यह स्पष्ट करती है कि जब कोई वादी (Plaintiff) चल संपत्ति (Movable Property) से संबंधित वाद दायर करता है, तो उस वाद में न्यायालय शुल्क (Court Fee) किस प्रकार से निर्धारित किया जाएगा। इस धारा में दो प्रमुख प्रकार के वादों की बात की गई है – पहला, सामान्य चल संपत्ति के लिए, और दूसरा, टाइटल दस्तावेज़ (Documents of Title) के लिए।धारा 23 को समझना इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे यह सुनिश्चित होता...
NI Act में किसी भी इंस्ट्रूमेंट में किसके द्वारा पेमेंट होता है?
किसी लिखत का विधिमान्य एवं लिखत के उन्मोचन के लिए पेमेंट रचयिता या प्रतिग्रहीता या उसकी ओर से किया जाना चाहिए। रचयिता या प्रतिग्रहीता अपनी आबद्धता से उन्मोचित नहीं होगा यदि पेमेंट लेखीवाल या किसी पृष्ठांकक या किसी अजनबी का अपने खाते में किए गए पेमेंट से किया जाता है। यदि कोई अजनबी लिखत के अधीन रकम का पेमेंट धारक को करता है तो उसे लिखत का क्रेता कहा जाएगा, परन्तु एक अजनबी यदि लिखत के किसी पक्षकार की ओर से पेमेंट करता है तो ऐसे पेमेंट का वही प्रभाव होगा जैसा कि उसे पक्षकार के द्वारा पेमेंट के लिए...
NI Act की धारा 78 के प्रावधान
परक्राम्य में लिखत अधिनियम मूल रूप से तीन प्रकार के लिखत से संबंधित है तथा उन लिखतों में पेमेंट किए जाने का वचन होता है न कि पेमेंट होता है। पेमेंट किसे किया जाएगा इससे संबंधित प्रावधानों का विस्तारपूर्वक उल्लेख अधिनियम की धारा 78 के अंतर्गत प्राप्त होता है।किसे पेमेंट किया जाना चाहिए- धारा 78 रचयिता या प्रतिग्रहीता के उन्मोचन पेमेंट द्वारा धारक को करने का उपबन्ध करती है। यद्यपि कि धारा 82 में रचयिता, प्रतिग्रहीता या पृष्ठांकक का लिखत के अधीन दायित्व से उन्मोचन का उपबन्ध करती है। किसी लिखत के...
क्या भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में पीड़ित को भी अभियोजन प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बनाया जाना चाहिए?
परिचय: पीड़ित के अधिकारों पर ध्यानJagjeet Singh v. Ashish Mishra @ Monu (2022) के ऐतिहासिक (Landmark) निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने तीन अहम मुद्दों पर गहराई से विचार किया—पीड़ित (Victim) का कानूनी अधिकार, कोर्ट द्वारा जमानत (Bail) देते समय अपनाए जाने वाले सिद्धांत, और निष्पक्ष सुनवाई (Fair Trial) का मूल सिद्धांत। यह मामला केवल अपने तथ्यों के कारण नहीं, बल्कि इस वजह से महत्वपूर्ण बना क्योंकि इसमें कोर्ट ने पहली बार स्पष्ट रूप से कहा कि पीड़ित को भी जमानत की प्रक्रिया में भाग लेने और अपनी बात रखने...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 413 और 414 में अपील से जुड़े विशेष प्रावधान और पीड़ित को दिए गए अतिरिक्त अधिकार
Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (BNSS) के अध्याय XXXI में 'Appeals' यानी अपीलों से जुड़े नियमों को बताया गया है। किसी भी न्यायालय (Court) के आदेश (Order) या निर्णय (Judgment) से अगर कोई व्यक्ति असंतुष्ट होता है, तो क्या वह उस निर्णय के खिलाफ अपील कर सकता है या नहीं—इसका निर्धारण इन धाराओं के माध्यम से किया गया है।यह लेख BNSS की धारा 413 और 414 को सरल हिंदी में समझाने का प्रयास है ताकि आम आदमी भी इन नियमों को अच्छे से समझ सके। धारा 413: अपील का अधिकार केवल तभी जब कानून में प्रावधान हो...
न्यायालय शुल्क की गणना से संबंधित प्रावधान: राजस्थान न्यायालय शुल्क अधिनियम धारा 20 से 22 तक
राजस्थान न्यायालय शुल्क और वाद मूल्यांकन अधिनियम (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act) के अध्याय IV में यह बताया गया है कि किसी वाद (Suit), अपील (Appeal), या आवेदन (Petition) में शुल्क (Fee) किस आधार पर और कैसे तय किया जाएगा। इस अध्याय की धारा 20 से लेकर आगे की धाराओं में अलग-अलग प्रकार के वादों के लिए न्यायालय शुल्क की गणना (Computation of Court Fee) का स्पष्ट विवरण दिया गया है। इन प्रावधानों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सभी प्रकार के वादों में उचित शुल्क लिया जाए और साथ ही...
किरायेदारी की अवधि : राजस्थान किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 22-C
राजस्थान किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 2017 के लागू होने के बाद, राज्य में किरायेदारी (Tenancy) से संबंधित कानूनों में कई महत्वपूर्ण बदलाव किए गए। इन्हीं बदलावों में एक महत्वपूर्ण प्रावधान है – धारा 22-C, जो यह निर्धारित करती है कि किरायेदारी की अवधि कितनी होगी, उसे कैसे बढ़ाया जा सकता है, और अगर निर्धारित अवधि पूरी हो जाए तो आगे क्या होगा।इससे पहले हमने धारा 22-A और धारा 22-B को समझा था, जिनमें Rent Authority की नियुक्ति और लिखित किरायेदारी अनुबंध (Tenancy Agreement) को अनिवार्य किया गया...
राजस्थान किराया नियंत्रण कानून, 2001 का अध्याय V-A: रेंट अथॉरिटी की नियुक्ति और टेनेन्सी एग्रीमेंट की अनिवार्यता
राजस्थान सरकार ने Rajasthan Rent Control (Amendment) Act, 2017 (संशोधन अधिनियम) के माध्यम से Rajasthan Rent Control Act, 2001 में Chapter V-A जोड़ा। इस अध्याय का उद्देश्य राज्य में किरायेदारी (Tenancy) के मामलों को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और कानूनी रूप से नियंत्रित बनाना है। इस अध्याय में दो मुख्य विषय शामिल हैं — Rent Authority की नियुक्ति और Tenancy Agreements को अनिवार्य (Mandatory) बनाना। आइए इसे सरल भाषा में विस्तार से समझते हैं।धारा 22-A: रेंट अथॉरिटी की नियुक्ति (Section 22-A: Appointment...
क्या Stay Order के बाद मामले की खारिजी से देयता समाप्त हो जाती है? – अंतरिम राहत और वित्तीय देयता पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट राय
State of U.P. v. Prem Chopra (2022 LiveLaw (SC) 378) के ऐतिहासिक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न पर विचार किया — जब कोई मुकदमा (Proceeding) खारिज हो जाता है, तो उस दौरान मिले Stay Order का क्या प्रभाव बचा रहता है?क्या कोर्ट से मिली अस्थायी राहत (Temporary Relief) उस व्यक्ति को बकाया राशि पर ब्याज (Interest) देने से बचा सकती है? इस मामले में कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि एक अंतरिम आदेश (Interim Order) का प्रभाव स्थायी (Permanent) नहीं होता और यदि मुख्य मामला खारिज हो जाए, तो...
न्यायालय द्वारा राज्य सरकार को सूचना देने से संबंधित प्रावधान : धारा 19 राजस्थान न्यायालय शुल्क अधिनियम
राजस्थान न्यायालय शुल्क अधिनियम (Rajasthan Court Fees and Suits Valuation Act) के अंतर्गत न्यायालय शुल्क (Court Fee) और विषय-वस्तु के मूल्यांकन (Valuation of Subject-matter) से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और न्यायसंगतता सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न प्रावधान किए गए हैं। इस अधिनियम की धारा 19 एक ऐसा ही महत्वपूर्ण प्रावधान है, जो न्यायालय को यह अधिकार देता है कि वह उचित समझे तो राज्य सरकार को ऐसे मामलों में सूचना दे सकता है जिनमें न्यायालय शुल्क के निर्धारण या विषय-वस्तु के मूल्यांकन से जुड़ी कोई...
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता 2023 की धारा 407 से 412 तक मृत्युदंड की पुष्टि के लिए सत्र न्यायालय से हाईकोर्ट तक की पूरी न्यायिक प्रक्रिया
मृत्युदंड (Death Penalty) भारतीय आपराधिक कानून के तहत सबसे कठोर सज़ा मानी जाती है। इसकी गंभीरता को देखते हुए कानून में यह स्पष्ट रूप से तय किया गया है कि यदि किसी व्यक्ति को Sessions Court (सत्र न्यायालय) द्वारा मृत्युदंड की सज़ा दी जाती है, तो वह सज़ा तब तक लागू नहीं की जा सकती जब तक High Court (उच्च न्यायालय) उसकी पुष्टि (Confirmation) न कर दे।Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (बीएनएसएस) के अध्याय 30 में इसी प्रक्रिया का पूरा विवरण दिया गया है। इस अध्याय में Sections 407 से 412 तक कुल...
NI Act में Presentment किस कंडीशन में जरूरी नहीं
परक्राम्य लिखत अधिनियम धारा 76 में उन परिस्थितियों को उपबन्धित किया गया है जिसके अन्तर्गत संदाय के लिए लिखतों का Presentment अनावश्यक होता है और लिखत देय तिथि पर अनादृत मान लिया जाता है। धारा 64 का अपवाद धारा 76 है जहाँ संदाय के लिए लिखतों का Presentment आवश्यक बनाया गया है।जहाँ Presentment को निवारित किया जाता है : [ धारा 76(क) ] -जहाँ लिखत का रचयिता, ऊपरवाल या प्रतिग्रहीता साशय Presentment का निवारण करता है। ऐसा निवारण साशय लिखत के रचयिता, ऊपरवाल या प्रतिग्रहीता के अभिव्यक्त या विवक्षित कार्य...
NI Act में Presentment के रूल्स
हर लिखत में एक निश्चित धनराशि के संदाय की अपेक्षा होती और ऐसी धनराशि का संदाय तभी होता है जब उसे संदाय के लिए उपस्थापित किया सिवाय माँग पर देय वचन पत्र जिसे किसी विनिर्दिष्ट स्थान पर देय नहीं बनाया गया है। अतः एक विधिमान्य उन्मुक्ति या संदाय के लिए लिखत का Presentment की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। लिखत को संदाय के लिये सम्यक् रूपेण है।उपस्थापित किया जाना चाहिए अन्यथा ऐसे धारक के प्रति लिखत के पक्षकार आबद्धता से उन्मुक्त हो जाएंगे। संदाय के लिए नियमों का उपबन्ध अधिनियम की धारा 64 से 73 तक की गयी...
क्या घरेलू हिंसा की शिकायत Limitation के कारण खारिज की जा सकती है?
सुप्रीम कोर्ट ने Kamatchi बनाम Lakshmi Narayanan (2022) मामले में एक अहम सवाल का जवाब दिया कि क्या घरेलू हिंसा कानून (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005) के तहत दायर शिकायत Section 468 CrPC (Code of Criminal Procedure – आपराधिक प्रक्रिया संहिता) में तय Limitation (समय सीमा) के आधार पर खारिज की जा सकती है।कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस तरह की शिकायतों पर Limitation का नियम लागू नहीं होता, और इस निर्णय ने महिलाओं के अधिकारों को और मजबूत किया है। घरेलू हिंसा कानून की धारा 12 का...
धारा 410 से 412 भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023: मृत्युदंड की पुष्टि की प्रक्रिया में हाईकोर्ट की प्रक्रियात्मक जिम्मेदारियाँ
Bhartiya Nagarik Suraksha Sanhita, 2023 (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023) के अध्याय XXX में मृत्युदंड से जुड़ी न्यायिक प्रक्रिया का बहुत गहराई से वर्णन किया गया है। इस प्रक्रिया के पिछले हिस्सों को धारा 407, 408 और 409 में रखा गया है। अब हम अध्याय के अंतिम चरण में प्रवेश कर रहे हैं, जहां High Court के भीतर की प्रक्रिया और उसका Sessions Court को आदेश भेजना शामिल होता है।धारा 410: निर्णय पर दो न्यायाधीशों के हस्ताक्षर आवश्यक (Confirmation or New Sentence to be Signed by Two Judges)जब कोई मामला...




















