उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कुमाऊं यूनिवर्सिटी से जुड़े कॉलेजों में छात्र संघ के पदों पर महिलाओं के लिए आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज किया। कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार छात्राओं को बेहतर प्रतिनिधित्व देने के लिए संविधान के अनुच्छेद 15(3) के तहत निर्देश जारी कर सकती है।

कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यूनिवर्सिटी का कोषाध्यक्ष और संयुक्त सचिव के पदों को महिलाओं के लिए आरक्षित करने का निर्णय केवल इसलिए अमान्य नहीं था कि छात्र संघ के संविधान में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया था, खासकर तब जब कार्यकारी परिषद ने इस निर्णय को मंजूरी दी थी।

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस रवींद्र मैथानी ने कहा कि चुनाव लड़ने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है और याचिकाकर्ताओं को अनारक्षित पदों पर चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया। इसके अनुसार, कोर्ट ने चार रिट याचिकाओं को शुरुआती चरण में ही खारिज किया।

ये याचिकाएं उन छात्रों द्वारा दायर की गईं, जो कुमाऊं यूनिवर्सिटी, नैनीताल से जुड़े कॉलेजों में छात्र संघ चुनाव लड़ना चाहते थे। तीन याचिकाकर्ता कोषाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ना चाहते थे, जबकि चौथा संयुक्त सचिव पद के लिए चुनाव लड़ना चाहता था।

10 सितंबर 2026 को यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ने घोषणा की कि संबद्ध कॉलेजों में चुनाव 29 सितंबर को होंगे, जबकि यूनिवर्सिटी का चुनाव 1 अक्टूबर को होगा।

17 सितंबर को राज्य सरकार ने सरकारी यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर को सूचित किया कि चूंकि यूनिवर्सिटी में छात्राओं की संख्या 65% से अधिक है, इसलिए छात्र संघ चुनावों में उन्हें 50% आरक्षण दिया जा सकता है। इस सूचना के बाद यूनिवर्सिटी ने 18 सितंबर को एक कार्यालय आदेश जारी किया, जिसमें छात्राओं के लिए विभिन्न पदों को आरक्षित किया गया, जिसमें कोषाध्यक्ष और संयुक्त सचिव के पद भी शामिल हैं।

याचिकाकर्ताओं ने 17 सितंबर के सरकारी आदेश और उसके बाद यूनिवर्सिटी द्वारा जारी कार्यालय आदेश को चुनौती दी और तर्क दिया कि आरक्षण निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना लागू किया गया। यह तर्क दिया गया कि यूनिवर्सिटी ने ट्रेज़रर और जॉइंट सेक्रेटरी के पदों के लिए 100% आरक्षण दिया, जबकि बाकी पद सभी के लिए खुले रखे थे। इसके परिणामस्वरूप, राज्य सरकार के निर्देश में सोचे गए 50% आरक्षण के बजाय छात्राओं के लिए लगभग 42% आरक्षण ही मिला।

याचिकाकर्ताओं ने आगे कहा कि 'यूनिवर्सिटी ऑफ़ केरल बनाम काउंसिल, प्रिंसिपल्स कॉलेज, केरल' मामले में सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंज़ूर की गई लिंगदोह समिति की सिफ़ारिशों के अनुसार, छात्र प्रतिनिधित्व को क़ानून के तहत विनियमित किया जाना चाहिए, जिसका पालन नहीं किया गया। याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यूनिवर्सिटी के छात्र संघ संविधान में अनुच्छेद 19 के तहत संशोधन की प्रक्रिया दी गई, जिसका पालन आरक्षण लागू करने से पहले किया जाना चाहिए।

यह भी तर्क दिया गया कि उत्तराखंड राज्य विश्वविद्यालय अधिनियम, 1973 की धारा 66A राज्य सरकार को विवादित निर्देश जारी करने का अधिकार नहीं देती, क्योंकि यह मामला नीतिगत नहीं है। इस प्रकार, याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि सक्षम वैधानिक निकायों के माध्यम से मामले की प्रक्रिया पूरी किए बिना यूनिवर्सिटी सरकारी आदेश को नहीं अपना सकती।

याचिका का विरोध करते हुए यूनिवर्सिटी ने कहा कि छात्राओं की संख्या कुल छात्र आबादी का 65% से अधिक है और आरक्षण से संबंधित निर्देश पिछले साल से ही उच्च शिक्षा निदेशक द्वारा जारी किए जा रहे हैं। इसने आगे बताया कि 18 सितंबर को कार्यकारी परिषद की एक आपातकालीन बैठक बुलाई गई थी, जिसमें छात्र संघ चुनावों में आरक्षण लागू करने के प्रस्ताव को मंज़ूरी दी गई।

राज्य ने कहा कि सरकारी आदेश संविधान के अनुच्छेद 162 के तहत जारी किया गया, जिसमें महिलाओं के उत्थान के लिए सक्रिय कदम उठाने के अनुच्छेद 15(3) के तहत अपने पवित्र दायित्व को ध्यान में रखा गया। इसने 'आंध्र प्रदेश सरकार बनाम पी.बी. विजयकुमार' मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का हवाला दिया, जिसमें सकारात्मक कार्रवाई या आरक्षण के माध्यम से महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान करने की राज्य की शक्ति को मान्यता दी गई।

शुरुआत में, कोर्ट ने कहा कि "यह कानून अच्छी तरह से स्थापित है कि चुनाव लड़ने का अधिकार कोई मौलिक अधिकार नहीं है। इस मामले में याचिकाकर्ताओं को अनारक्षित पद के लिए चुनाव लड़ने से नहीं रोका गया। वे किसी अन्य पद के लिए चुनाव लड़ने के लिए स्वतंत्र हैं।"

राज्य सरकार की शक्तियों के मुद्दे पर कोर्ट ने माना कि वह वास्तव में अनुच्छेद 162 के तहत सरकारी आदेश जारी कर सकती है। कोर्ट ने गौर किया कि 17 सितंबर का आदेश अनुच्छेद 15(3) के तहत जारी किया गया "ताकि विश्वविद्यालय में छात्राओं के लिए बेहतर प्रावधान किए जा सकें और उन्हें उचित प्रतिनिधित्व मिल सके।"

कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की इस आपत्ति पर भी विचार किया कि विश्वविद्यालय ने 50% के बजाय लगभग 42% आरक्षण दिया।

कोर्ट ने माना,

"इससे इस अधिसूचना की वैधता पर बहुत कम असर पड़ता है।"

विश्वविद्यालय द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया के बारे में कोर्ट ने गौर किया कि उसकी कार्यकारी परिषद ने 18 सितंबर को राज्य सरकार के आदेश को लागू करने का निर्णय लिया था। कोर्ट ने इस तथ्य को निर्विवाद पाया क्योंकि यह कार्यालय आदेश में ही दर्ज था।

छात्र संघ संविधान के अनुच्छेद 19 पर निर्भरता के संबंध में कोर्ट ने माना कि यह प्रावधान छात्र संघों द्वारा प्रस्तावित संशोधनों से संबंधित है। इसमें ऐसे संशोधन की बात नहीं की गई, जिसे स्वयं कुलपति या कार्यकारी परिषद द्वारा शामिल किया गया हो।

कोर्ट ने माना,

"वास्तव में, इसका उल्लेख अनुच्छेद 19(D) के तहत है। इसके अनुसार, यदि छात्र संघ कोई संशोधन प्रस्तावित करता है, तो वह संस्थान के प्रमुख के माध्यम से कुलपति तक आ सकता है। इसमें ऐसे संशोधन की बात नहीं है, जिसे स्वयं कुलपति या कार्यकारी परिषद द्वारा शामिल किया गया हो। इस बात पर भी कोई विवाद नहीं है कि छात्र संघ के संविधान में संशोधन कार्यकारी परिषद द्वारा प्रस्तावित किया जा सकता है। इस मामले में कार्यकारी परिषद ने 18.09.2026 को निर्णय लिया है। केवल इसलिए कि छात्र संघ के संविधान में औपचारिक संशोधन शामिल नहीं किया गया, यह 18.09.2026 के कार्यालय आदेश को अमान्य नहीं करता।"

इस प्रकार, याचिकाओं में कोई दम न पाते हुए हाईकोर्ट ने सभी चार रिट याचिकाओं को शुरुआती चरण में ही खारिज किया।

Case Title : Mukesh Pandey & Others v. State of Uttarakhand & Others

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