कृषि उपज को बाहर से लाकर सिर्फ प्रोसेसिंग करने पर विकास उपकर नहीं लगा सकता राज्य: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि राज्य के बाहर से कृषि उपज को किसी मार्केट एरिया में केवल विनिर्माण (Manufacturing) या आगे की प्रोसेसिंग के लिए लाने पर, यदि उस मार्केट एरिया में उसकी कोई बिक्री या खरीद नहीं होती है, तो उस पर डेवलपमेंट सेस (विकास उपकर) नहीं लगाया जा सकता।
चीफ जस्टिस मनोज कुमार गुप्ता और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की डिवीजन बेंच ने कहा कि उत्तराखंड कृषि उपज विपणन (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 2011 की धारा 27(c)(v) के पहले प्रावधान में इस तरह के कृषि उत्पाद पर विकास उपकर लगाने की अनुमति, राज्य विधानमंडल की विधायी क्षमता से बाहर है।
क्या था मामला?
हाईकोर्ट के समक्ष कई रिट याचिकाएं दायर की गई थीं। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि वे उत्तराखंड के बाहर से अधिसूचित कृषि उपज लाकर राज्य के मार्केट एरिया में उसका विनिर्माण या प्रोसेसिंग करते हैं।
हालांकि, यह कृषि उपज मार्केट एरिया में बिक्री या खरीद के लिए नहीं लाई गई थी।
इसके बावजूद अधिकारियों ने नोटिस जारी कर विकास उपकर की मांग की। अधिकारियों का तर्क था कि बाहर से कृषि उपज को प्रोसेसिंग या मैन्युफैक्चरिंग के लिए मार्केट एरिया में लाना “Other Secondary Arrival” के अंतर्गत आता है और इसलिए उस पर विकास उपकर लगाया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले का दिया हवाला
याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के Gujarat Ambuja Exports Ltd. v. State of Uttarakhand फैसले पर भरोसा किया।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कहा था कि राज्य के बाहर से कृषि उपज को किसी मार्केट एरिया में बिक्री या खरीद के लिए नहीं बल्कि मैन्युफैक्चरिंग या आगे की प्रोसेसिंग के लिए लाने पर मार्केट फीस और विकास उपकर लगाने की राज्य की शक्ति नहीं है।
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने भले ही विशेष रूप से धारा 27(c)(iii) को असंवैधानिक ठहराया था, लेकिन इसका यह मतलब नहीं निकाला जा सकता कि धारा 27(c)(v) या उसका पहला प्रावधान स्वतः वैध ठहर गया।
सिर्फ मार्केट एरिया में प्रवेश से टैक्स नहीं
कोर्ट ने कहा कि कृषि उपज का किसी अधिसूचित मार्केट एरिया में सिर्फ भौतिक रूप से प्रवेश करना, अपने आप में ऐसी गतिविधि नहीं बन जाता जो “मार्केट” से संबंधित हो।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की Entry 28 में बाजार और मेले शामिल हैं, जबकि Entry 66 राज्य को फीस लगाने की शक्ति देती है। हालांकि, Entry 66 अपने आप में कोई स्वतंत्र विधायी क्षेत्र नहीं है। फीस का संबंध ऐसे विषय से होना चाहिए जिस पर राज्य को पहले से कानून बनाने की शक्ति प्राप्त हो।
'डेवलपमेंट सेस' नाम रखने से levy वैध नहीं होगी
हाईकोर्ट ने राज्य की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि यहां मार्केट फीस नहीं बल्कि केवल डेवलपमेंट सेस लगाया जा रहा है।
कोर्ट ने कहा कि किसी लेवी की वैधता तय करते समय उसका वास्तविक स्वरूप और प्रभाव देखा जाता है, केवल उसका नाम नहीं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि मार्केट कमेटियों द्वारा बनाए गए सड़क, पुल या अन्य बुनियादी ढांचे का इस्तेमाल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट करती हैं, तो इससे राज्य को ऐसी लेवी लगाने की विधायी शक्ति नहीं मिल जाती।
विकास कार्यों में पैसा खर्च होना अलग बात
कोर्ट ने कहा कि लेवी से प्राप्त राशि का इस्तेमाल किस उद्देश्य के लिए किया जाता है और लेवी लगाने की विधायी शक्ति का स्रोत क्या है, ये दो अलग-अलग प्रश्न हैं।
सिर्फ इसलिए कि वसूली गई राशि का इस्तेमाल मार्केट इंफ्रास्ट्रक्चर के विकास में किया जाता है, ऐसी कृषि उपज पर उपकर लगाने की शक्ति पैदा नहीं हो जाती, जिस पर राज्य को कानून बनाने की संवैधानिक क्षमता ही नहीं है।
नोटिस और मांग रद्द
अंततः हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 27(c)(v) के पहले प्रावधान में राज्य के बाहर से कृषि उपज को मार्केट एरिया में केवल मैन्युफैक्चरिंग या आगे की प्रोसेसिंग के लिए लाने और वहां कोई बिक्री या खरीद नहीं होने की स्थिति में डेवलपमेंट सेस लगाने की सीमा तक प्रावधान विधायी क्षमता से बाहर है।
इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं के खिलाफ जारी मांग नोटिस और संबंधित डिमांड को रद्द कर दिया।