NEET-UG काउंसलिंग में फर्जी 'स्वतंत्रता सेनानी कोटा' प्रमाण पत्र: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सत्यापन और दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह उन प्रमाण पत्रों का सत्यापन करे, जिनका इस्तेमाल स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए आरक्षित कोटे के तहत प्रवेश पाने और सरकारी नौकरियों में भर्ती होने के लिए किया गया। यह निर्देश ऐसे समय में आया, जब विशेष रूप से 2026 की NEET-UG काउंसलिंग में फर्जी प्रमाण पत्रों के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के आरोप लगे हैं।
एक्टिंग चीफ जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने गृह और राजस्व विभाग के सचिवों को चार सप्ताह के भीतर एक समिति गठित करने का निर्देश दिया। यह समिति प्रमाण पत्रों की जांच करेगी और यह भी देखेगी कि इन्हें जारी करने में किन अधिकारियों की भूमिका रही है। समिति को अपने गठन के छह महीने के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा गया। इसके बाद राज्य सरकार उन लोगों के खिलाफ उचित कानूनी कार्रवाई करेगी, जिन्होंने गलत तरीके से आरक्षित सीटें या पद हासिल किए।
यह निर्देश 'नेशनल पब्लिक सर्विस ट्रस्ट' द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) पर आया। याचिका में मांग की गई कि राज्य के गठन के बाद से उत्तराखंड में इस्तेमाल किए गए आरक्षण और पात्रता प्रमाण पत्रों का सत्यापन किया जाए। साथ ही इन फर्जी प्रमाण पत्रों को हासिल करने और उनके इस्तेमाल के आरोपों की CBI जांच की भी मांग की गई।
ट्रस्ट ने मांग की कि प्रवेश, सरकारी नौकरियों और अन्य लाभों के लिए इस्तेमाल किए गए 'स्वतंत्रता सेनानी' और 'स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित' प्रमाण पत्रों का पूरे राज्य में सत्यापन किया जाए। इसके साथ ही इनसे जुड़े मूल निवास, वंशावली, जाति/श्रेणी और राजस्व रिकॉर्ड की भी जांच होनी चाहिए। ट्रस्ट ने यह भी मांग की कि 2026 की NEET-UG काउंसलिंग प्रक्रिया में (डुप्लिकेट प्रविष्टियों को हटाने के बाद) राउंड-1 में शामिल 195 और राउंड-2 में शामिल 329 उम्मीदवारों द्वारा जमा किए गए प्रमाण पत्रों का सत्यापन किया जाए।
याचिकाकर्ता ने बताया कि केवल 2026 की NEET-UG काउंसलिंग में ही स्वतंत्रता सेनानी के आश्रित के रूप में आरक्षण का दावा करने वाले 24 में से 16 उम्मीदवारों के प्रमाण पत्र फर्जी पाए गए। इसके बावजूद, इन उम्मीदवारों को काउंसलिंग के पहले और दूसरे दौर में शामिल होने की अनुमति दी गई।
याचिका में यह तर्क दिया गया कि फर्जी प्रमाण पत्र जारी होने के मामले से निपटने के लिए CSC (कॉमन सर्विस सेंटर), ई-सर्विस ऑपरेटरों, राजस्व निरीक्षकों, लेखपालों, तहसीलदारों और राजस्व विभाग के अन्य अधिकारियों की भूमिका की गहन जांच आवश्यक है।
याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि उन लोगों की पहचान करने के लिए सत्यापन जरूरी है जिन्होंने गलत तरीके से आरक्षण का लाभ उठाया है, ताकि उनके खिलाफ उचित कार्रवाई की जा सके।
राज्य ने कोर्ट को बताया कि फर्जी प्रमाणपत्रों के मामले की जांच के लिए पहले ही विशेष जांच दल (SIT) का गठन किया जा चुका है। इस दल में छह पुलिस अधिकारी शामिल हैं और इसका नेतृत्व एक पुलिस अधीक्षक (SP) कर रहे हैं। राज्य ने बताया कि जांच चल रही है और SIT की रिपोर्ट के आधार पर आगे की कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
जनहित को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने गृह और राजस्व विभागों के सचिवों को समिति गठित करने का निर्देश दिया। यह समिति उन लोगों के प्रमाणपत्रों की जांच करेगी, जिन्होंने स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों के लिए आरक्षित सीटों या पदों पर प्रवेश या नियुक्ति प्राप्त की। समिति को यह भी निर्देश दिया गया कि वह ऐसे प्रमाणपत्र जारी करने में CSC, ई-सेवा ऑपरेटरों, राजस्व निरीक्षकों, लेखपालों, तहसीलदारों और अन्य सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच करे।
इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य सरकार से स्थायी समिति बनाने पर विचार करने का अनुरोध किया। यह समिति 'उत्तराखंड लोक सेवा (अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1994' और 'उत्तराखंड लोक सेवा (शारीरिक रूप से विकलांग, स्वतंत्रता सेनानियों के आश्रितों और पूर्व सैनिकों के लिए आरक्षण) अधिनियम, 1993' के तहत आरक्षण की पात्रता से जुड़े संदेहों की जांच करेगी।
इस प्रस्तावित स्थायी समिति को प्रमाणपत्रों के रैंडम सत्यापन (Random Verification) का काम भी सौंपा जा सकता है, ताकि उन लोगों की पहचान की जा सके जिन्होंने आरक्षित सीटों या पदों पर गलत तरीके से प्रवेश या नियुक्ति हासिल की।
इसके साथ ही यह जनहित याचिका (PIL) निस्तारित की गई।
Case Title : National Public Service Trust Versus State of Uttarakhand & Others [WPPIL/144/2026]