उत्तराखंड हाईकोर्ट ने देहरादून की फास्ट ट्रैक स्पेशल कोर्ट (POCSO) का वह आदेश रद्द किया, जिसमें पूरी तरह से अंधे आरोपी से गवाह से जिरह (Cross-Examination) करने का मौका छीन लिया गया।

कोर्ट ने कहा,

“आसानी से समझ में आने वाले या इस्तेमाल करने लायक रूप (Accessible Form) में सामग्री उपलब्ध कराना आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार से सीधे तौर पर जुड़ा है।”

जस्टिस आलोक महरा क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें ट्रायल कोर्ट के 9 सितंबर, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी गई, जिसके तहत आरोपी से गवाह से जिरह करने का मौका छीन लिया गया।

कोर्ट ने गौर किया कि यह मामला पहले आरोपी की सज़ा के खिलाफ अपील के तौर पर डिवीज़न बेंच के सामने आया था। उस अपील को 18 जून, 2025 को मंज़ूरी दी गई और सज़ा रद्द की गई। डिवीज़न बेंच ने ट्रायल कोर्ट को 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' की धारा 12 का पालन करते हुए आरोपी को ज़रूरी सामग्री उपलब्ध कराने के बाद दोबारा सुनवाई (Re-trial) करने का निर्देश दिया। बेंच ने पाया कि आरोपी को ज़रूरी सामग्री ऐसे रूप में नहीं दी गई, जिसे वह आसानी से समझ या इस्तेमाल कर सके, जिससे उसे अपना बचाव करने का सार्थक मौका नहीं मिल पाया।

कोर्ट ने अधिनियम की धारा 12(4)(a), (b) और (c) का ज़िक्र किया, जिसके तहत संबंधित सरकार को यह सुनिश्चित करना होता है कि सार्वजनिक दस्तावेज़ आसानी से इस्तेमाल करने लायक रूप में उपलब्ध हों; दस्तावेज़ों और सबूतों को आसानी से इस्तेमाल करने लायक रूप में फाइल करने, स्टोर करने और उनका संदर्भ लेने के लिए ज़रूरी उपकरण उपलब्ध कराए जाएं; और दिव्यांग लोगों द्वारा अपनी पसंद की भाषा और संचार के माध्यम से दी गई गवाही, दलीलों या राय को रिकॉर्ड करने में मदद के लिए सुविधाएं और उपकरण उपलब्ध कराए जाएं।

कोर्ट को बताया गया कि मामले के वापस भेजे जाने (Remand) के बाद ट्रायल कोर्ट के सामने गवाह का बयान दर्ज किया गया। इसके बाद आरोपी ने अपने वकील के ज़रिए PW-1 की मुख्य परीक्षा (Examination-in-Chief) की कॉपी ब्रेल में मांगी, ताकि वह सबूतों को समझ सके और जिरह के लिए अपने वकील को सही निर्देश दे सके। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने इस आधार पर अनुरोध ठुकरा दिया कि CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज PW-1 का बयान आरोपी को पहले ही ब्रेल लिपि में दिया जा चुका था। नतीजतन, PW-1 से जिरह (Cross-Examine) करने का मौका खत्म कर दिया गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि इस विवाद पर डिवीज़न बेंच के पिछले फैसले को ध्यान में रखते हुए विचार किया जाना चाहिए। कोर्ट ने माना कि आरोपी का पूरी तरह से अंधा होना निर्विवाद है और धारा 12 के अनुपालन में सामग्री उपलब्ध कराने के पिछले निर्देश का मकसद उसे ऐसी स्थिति में लाना है, जहां वह अपने खिलाफ इस्तेमाल की जा रही सामग्री और सबूतों को समझ सके, कार्यवाही में प्रभावी ढंग से भाग ले सके और अपना बचाव पेश कर सके।

कोर्ट ने कहा,

"उक्त निर्देश का मकसद यह सुनिश्चित करना था कि रिवीजन करने वाले व्यक्ति (Revisionist) को, उसकी दृष्टि-बाधा के कारण, ऐसी स्थिति में रखा जाए जहाँ वह अपने खिलाफ इस्तेमाल की जा रही सामग्री और सबूतों को समझ सके और नतीजतन कार्यवाही में प्रभावी ढंग से भाग ले सके और अपना बचाव पेश कर सके। इसलिए सुलभ रूप में सामग्री उपलब्ध कराना केवल प्रक्रियात्मक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह निष्पक्ष सुनवाई के आरोपी के अधिकार से गहराई से जुड़ा हुआ है।"

कोर्ट ने आगे कहा कि PW-1 से जिरह करने के आरोपी के मौके को खत्म करने से पहले ट्रायल कोर्ट को 18 जून, 2025 के फैसले में दिए गए निर्देशों का पालन सुनिश्चित करना चाहिए।

इसके अनुसार, हाई कोर्ट ने 9 सितंबर, 2026 के विवादित आदेश को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह आरोपी को ब्रेल लिपि में PW-1 की मुख्य परीक्षा (Examination-in-Chief) की एक प्रति उपलब्ध कराए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि पिछले डिवीज़न बेंच के फैसले और 'दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016' की धारा 12 के अनुपालन में, दोबारा सुनवाई (Re-Trial) के दौरान दर्ज अभियोजन पक्ष के अन्य गवाहों के बयान और सबूत आरोपी को सुलभ रूप में उपलब्ध कराए जाएं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने अभियोजन पक्ष के मामले के गुण-दोष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है और तदनुसार आपराधिक पुनरीक्षण (Criminal Revision) स्वीकार किया।

Case Title : Suchit Narang v State of Uttarakhand

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