उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि आबकारी आयुक्त किसी लाइसेंस-धारक की शराब की सब-शॉप को सिर्फ़ इस आधार पर दूसरी जगह नहीं भेज सकते कि इससे किसी दूसरी शराब की दुकान की कमाई पर बुरा असर पड़ रहा है। कोर्ट ने पाया कि उत्तराखंड आबकारी नीति के नियम 28.4(b) के तहत दुकान को दूसरी जगह भेजने का अधिकार ज़िला मजिस्ट्रेट के पास है, न कि आबकारी आयुक्त के पास।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी उस रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें प्रतिवादी नंबर 5 की अपील पर आबकारी आयुक्त द्वारा 31 मार्च, 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी गई। अपील में चमोली ज़िले के लोल्टी में याचिकाकर्ता की शराब की सब-शॉप खोलने पर सवाल उठाया गया, इस आधार पर कि थराली में प्रतिवादी नंबर 5 की शराब की दुकान के कारोबार पर बुरा असर पड़ रहा था। आयुक्त ने अपील मंज़ूर कर ली और निर्देश दिया कि सब-शॉप को ग्वालदम के पास किसी दूसरी जगह भेज दिया जाए, जहाँ याचिकाकर्ता की मुख्य शराब की दुकान आवंटित की गई।

याचिकाकर्ता का तर्क था कि आबकारी अधिनियम, आबकारी नियमों या आबकारी नीति में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो लाइसेंस-धारक द्वारा खोली गई मुख्य दुकान और सब-शॉप के बीच अधिकतम दूरी तय करता हो, और यह कि किसी दूसरी शराब की दुकान के लाइसेंस-धारक की कमाई का नुकसान, अपने आप में सब-शॉप को हटाने का आधार नहीं हो सकता।

कोर्ट ने पाया कि लागू आबकारी नीति के अनुसार 8 अगस्त, 2024 के आदेश से याचिकाकर्ता को सब-शॉप खोलने की अनुमति दी गई। कोर्ट को याचिकाकर्ता के इस तर्क में दम लगा कि अपील समय-सीमा के कारण वर्जित है और सुनवाई योग्य भी नहीं है, क्योंकि अपील में किसी ऐसे आदेश को चुनौती नहीं दी गई, जिसके ख़िलाफ़ अपील की जा सके।

कोर्ट ने आगे कहा कि नियम 28.4(b), जिसका ज़िक्र विवादित आदेश में किया गया, ज़िला मजिस्ट्रेट को ज़िले के भीतर एक जगह से दूसरी जगह दुकान भेजने का अधिकार देता है। इस प्रकार, उक्त प्रावधान के तहत अधिकार आबकारी आयुक्त के पास नहीं था।

कोर्ट ने आगे कहा कि आबकारी विभाग याचिकाकर्ता की सब-शॉप में सिर्फ़ इस आधार पर दखल नहीं दे सकता कि प्रतिवादी नंबर 5 द्वारा चलाई जा रही दुकान की कमाई पर बुरा असर पड़ रहा था।

कोर्ट ने कहा,

“आबकारी अधिनियम, आबकारी नियमों या आबकारी नीति में दो शराब की दुकानों (मुख्य दुकान या उप-दुकान) के बीच की दूरी के बारे में कोई प्रावधान नहीं होने के कारण, आबकारी आयुक्त केवल इस आधार पर याचिकाकर्ता की उप-दुकान के मामले में दखल नहीं दे सकते थे कि प्रतिवादी संख्या 5 द्वारा चलाई जा रही दुकान के राजस्व पर बुरा असर पड़ रहा है।”

इसके अनुसार, कोर्ट ने विवादित आदेश रद्द किया और रिट याचिका को मंज़ूरी दी।

Case Title: Vivek Shah v. State of Uttarakhand [WPMS No. 862 of 2026]

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