उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी कॉम्प्रिहेन्सिव/पैकेज इंश्योरेंस पॉलिसी में खास तौर पर यात्रियों को कवर किया गया है तो यात्री के तौर पर यात्रा कर रहे वाहन मालिक को सिर्फ़ इसलिए मुआवज़े से वंचित नहीं किया जा सकता, क्योंकि वह वाहन का मालिक है। कोर्ट ने पाया कि उस खास इंश्योरेंस पॉलिसी की शर्तों में नौ यात्रियों के लिए साफ़ तौर पर कवरेज दिया गया, जिसके लिए अलग से प्रीमियम लिया गया।

जस्टिस पंकज पुरोहित मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील पर सुनवाई कर रहे थे, जिसने सड़क दुर्घटना में लक्ष्मण सिंह की मौत से जुड़े मुआवज़े का दावा खारिज कर दिया था।

प्रतिवादी-इंश्योरेंस कंपनी ने तर्क दिया कि चूंकि मृतक खुद वाहन का मालिक था, इसलिए वह 'थर्ड पार्टी' (तीसरा पक्ष) नहीं था। इसलिए पॉलिसी के तहत मुआवज़े का दावा करने का हकदार नहीं है।

कोर्ट ने माना कि वाहन का मालिक 'थर्ड पार्टी' नहीं होता है और अगर खास कवरेज न हो तो इंश्योरेंस कंपनी मालिक की अपनी मौत के लिए ज़िम्मेदार नहीं होगी। हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि टाटा स्पैसियो के लिए यह पॉलिसी "पैसेंजर्स कैरिंग कमर्शियल व्हीकल पॉलिसी बी पैकेज" थी, जिसमें नौ लोगों के बैठने की क्षमता थी। इस तरह पॉलिसी में वाहन में यात्रा करने वाले यात्रियों के प्रति दायित्व (Liability) पर खास तौर पर विचार किया गया।

कोर्ट ने आगे कहा कि दुर्घटना के समय मृतक वाहन नहीं चला रहा था और उसमें यात्रा कर रहा था, जबकि कोई और व्यक्ति गाड़ी चला रहा था। कोर्ट ने माना कि सिर्फ़ इसलिए कि मृतक वाहन का मालिक था, यात्री/सवार के तौर पर उसकी स्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने टिप्पणी की,

"...सिर्फ़ इसलिए कि मृतक वाहन का मालिक था, यात्री/सवार के तौर पर उसकी स्थिति को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब पॉलिसी में ही यात्रियों के लिए खास तौर पर कवरेज दिया गया हो।"

धनराज बनाम न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (2004) के मामले से अंतर बताते हुए कोर्ट ने कहा कि उस मामले में ऐसा कोई सबूत नहीं था, जिससे पता चले कि पॉलिसी में मालिक की मौत और चोट के जोखिम को खास तौर पर कवर किया गया, जबकि मौजूदा पॉलिसी में नौ यात्रियों के प्रति दायित्व से संबंधित स्पष्ट प्रावधान है।

कोर्ट ने नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम श्रीमती थुंगाला धना लक्ष्मी मामले में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया और कहा कि यह कॉम्प्रिहेन्सिव/पैकेज पॉलिसी के तहत कवरेज को लागू करने का समर्थन करता है, जहां मालिक सवार के तौर पर यात्रा कर रहा हो। इसलिए कोर्ट ने माना कि ट्रिब्यूनल ने मृतक के मालिकाना हक को ही दावा खारिज करने के लिए काफी मानकर गलती की। कोर्ट ने कुल मुआवज़ा ₹8,34,800 तय किया।

Case Title: Smt. Poonam Devi & Ors. v. The New India Assurance Company & Anr. [Appeal from Order No. 208 of 2013]

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