नैनीताल में दूषित पानी पर हाईकोर्ट सख्त, 24 घंटे में हेल्पलाइन बनाने का आदेश
नैनीताल जिले के कई इलाकों में दूषित पेयजल और जलजनित बीमारियों के फैलने के मामले में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने नैनीताल के जिलाधिकारी को 24 घंटे के भीतर आम लोगों के लिए हेल्पलाइन नंबर शुरू करने और उसका व्यापक प्रचार-प्रसार करने का निर्देश दिया। इस हेल्पलाइन के जरिए लोग दूषित पानी से जुड़ी शिकायतें दर्ज करा सकेंगे।
जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस सिद्धार्थ साह की खंडपीठ ने वकील रवि बिष्ट की ओर से दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश दिए। अदालत के सामने खबरों के माध्यम से यह मामला आया था कि नैनीताल के आसपास दूषित पेयजल की वजह से दो लोगों की मौत हो चुकी है और कई अन्य लोगों को अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने 7 सितंबर 2026 के आदेश में नैनीताल के जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और उत्तराखंड जल संस्थान समेत संबंधित विभागों के अधिकारियों को अदालत के समक्ष व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर दूषित पेयजल और जलजनित बीमारियों से निपटने की कार्ययोजना पेश करने का निर्देश दिया था।
इसके बाद 8 सितंबर को जिलाधिकारी, मुख्य चिकित्सा अधिकारी और अन्य संबंधित अधिकारी अदालत के सामने पेश हुए। जिलाधिकारी ने हाईकोर्ट को बताया कि संक्रमित लोगों की रक्त संबंधी जांच निजी जांच प्रयोगशालाओं के माध्यम से कराने के लिए असंबद्ध निधि से चार लाख रुपये जारी किए गए। उन्होंने अदालत को भरोसा दिलाया कि जरूरत पड़ने पर आगे भी धनराशि जारी की जाएगी।
मुख्य चिकित्सा अधिकारी ने भी अदालत को बताया कि दूषित पानी से फैली बीमारी से निपटने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से अब तक क्या-क्या कदम उठाए गए। अदालत ने अधिकारियों से मिली जानकारी और मामले की स्थिति को देखते हुए प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव कार्य को प्रभावी तरीके से जारी रखने के निर्देश दिए।
हाईकोर्ट ने पेयजल आपूर्ति की पाइपलाइनों के रखरखाव की जिम्मेदारी संभालने वाली एजेंसी को यह सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि आगे पेयजल किसी भी स्थिति में दूषित न हो। अदालत ने साफ कहा कि प्रभावित क्षेत्रों में दूषित पानी की समस्या को रोकना संबंधित एजेंसी की प्राथमिक जिम्मेदारी है।
अदालत ने नैनीताल के जिलाधिकारी को राहत कार्यों की निगरानी करने और सभी संबंधित विभागों के बीच बेहतर समन्वय सुनिश्चित करने का निर्देश दिया। साथ ही जिलाधिकारी को 24 घंटे के भीतर हेल्पलाइन नंबर स्थापित करने और उसका प्रचार करने को कहा गया, ताकि आम लोग दूषित पेयजल से जुड़ी अपनी शिकायतें प्रशासन तक पहुंचा सकें।
मामले में उत्तराखंड प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की नैनीताल इकाई को भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई। बोर्ड के क्षेत्रीय अधिकारी को नैनीताल शहर के साथ-साथ दूषित पानी से प्रभावित सभी गांवों में अलग-अलग जलस्रोतों से पानी के नमूने लेने और उनकी जांच कर रिपोर्ट एक सप्ताह के भीतर अदालत में पेश करने का निर्देश दिया गया।
जिलाधिकारी ने अदालत को यह भी आश्वासन दिया कि प्रभावित गांवों और स्कूलों में टैंकरों के माध्यम से साफ और दूषित रहित पेयजल उपलब्ध कराया जाएगा। अदालत ने इस व्यवस्था को प्रभावी तरीके से लागू करने को कहा, ताकि प्रभावित इलाकों में लोगों और बच्चों को सुरक्षित पानी मिल सके।
हाईकोर्ट ने कुमाऊं क्षेत्र में जल जांच प्रयोगशाला स्थापित करने के प्रस्ताव पर भी गंभीरता दिखाई। अदालत ने पेयजल सचिव को उत्तराखंड जल संस्थान की ओर से भेजे गए प्रस्ताव पर चार सप्ताह के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया। अदालत के इस कदम का उद्देश्य क्षेत्र में पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए स्थायी व्यवस्था तैयार करना है, ताकि भविष्य में दूषित पेयजल की स्थिति सामने आने पर उसकी तत्काल जांच की जा सके।
हाईकोर्ट ने पूरे मामले में जिला प्रशासन और संबंधित विभागों को आपसी समन्वय के साथ काम करने और प्रभावित लोगों को तत्काल राहत देने पर जोर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल कागजी कार्रवाई के बजाय जमीन पर प्रभावी कदम उठाए जाने चाहिए।
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को होगी। तब तक जिलाधिकारी की ओर से हेल्पलाइन शुरू करने, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से पानी के नमूनों की जांच और प्रभावित इलाकों में स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति समेत उठाए गए कदमों की स्थिति अदालत के सामने रखी जाएगी।