साइन किया हुआ खाली चेक, भले विवरण किसी और ने भरे हों, कानूनी देनदारी की धारणा बनेगी: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कहा कि चेक पर हस्ताक्षर किए जाने की बात स्वीकार होने पर परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (NI Act) की धारा 118(ए) और 139 के तहत कानूनी धारणा लागू हो जाती है। चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति द्वारा भरे जाने या हस्ताक्षर और अन्य लिखावट में अंतर होने से यह धारणा अपने आप समाप्त नहीं होती।
जस्टिस आलोक महरा एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें धारा 138 के तहत दोषसिद्धि और सत्र अदालत द्वारा अपील खारिज किए जाने को चुनौती दी गई। ट्रायल कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक साल के साधारण कारावास और 2.20 लाख रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई थी।
मामला दो लाख रुपये के चेक से जुड़ा था, जो याचिकाकर्ता ने प्रतिवादी संख्या-2 के पक्ष में जारी किया। बैंक ने चेक को 'पर्याप्त धनराशि नहीं' टिप्पणी के साथ लौटा दिया। कानूनी नोटिस भेजे जाने के बावजूद चेक की राशि का भुगतान नहीं किया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि उसने एक खाली चेक पर केवल हस्ताक्षर करके उसे कुलदीप बिष्ट को दिया और बाद में उस चेक का दुरुपयोग किया गया। उसका कहना था कि चेक के बाकी विवरण प्रतिवादी संख्या-2 ने खुद भरे थे और चेक पर लिखावट उसके हस्ताक्षर से अलग है।
हाईकोर्ट ने पाया कि चेक पर याचिकाकर्ता के हस्ताक्षर होने की बात विवादित नहीं थी। अदालत ने कहा कि केवल यह दावा कि चेक के बाकी विवरण किसी अन्य व्यक्ति ने भरे थे, याचिकाकर्ता को कानूनी दायित्व से मुक्त नहीं करता।
पीठ ने सुप्रीम कोर्ट के बीर सिंह बनाम मुकेश कुमार फैसले का हवाला देते हुए कहा कि जो व्यक्ति चेक पर हस्ताक्षर करके उसे स्वेच्छा से भुगतानकर्ता को सौंपता है, वह इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकता कि चेक के अन्य विवरण किसी और ने भरे थे।
अदालत ने कहा कि केवल यह तथ्य कि चेक के विवरण बाद में भुगतानकर्ता या किसी अन्य व्यक्ति ने भरे, चेक को अमान्य नहीं बनाता और न ही चेक जारी करने वाले को दायित्व से मुक्त करता है।
एक्ट की धारा 139 के तहत यह धारणा बनी रहती है कि चेक किसी कर्ज या अन्य कानूनी रूप से वसूल योग्य देनदारी के पूर्ण या आंशिक भुगतान के लिए प्राप्त हुआ था, जब तक आरोपी संभावित बचाव के आधार पर इस धारणा को खारिज करने में सफल न हो।
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल इनकार कर देना या खाली चेक के दुरुपयोग का सामान्य आरोप लगा देना पर्याप्त बचाव नहीं है।
याचिकाकर्ता ऐसा कोई ठोस और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि चेक कुलदीप बिष्ट को प्रतिवादी संख्या-2 के प्रति किसी देनदारी से पूरी तरह असंबंधित उद्देश्य के लिए दिया गया या बाद में उसे अवैध तरीके से हासिल कर उसका दुरुपयोग किया गया।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जब चेक पर हस्ताक्षर स्वीकार हों तो हस्ताक्षर और चेक के अन्य विवरणों की लिखावट में अंतर मात्र से धारा 118(ए) और 139 के तहत बनने वाली कानूनी धारणा समाप्त नहीं होती।
इन आधारों पर हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका खारिज की।