व्यभिचार साबित करने के लिए DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, बच्चे की वैधता की धारणा ही मान्य होनी चाहिए: उत्तराखंड हाईकोर्ट
उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए किसी बच्चे के DNA टेस्ट का आदेश आम तौर पर नहीं दिया जा सकता, खासकर तब जब साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के तहत बच्चे की वैधता की कानूनी धारणा को चुनौती देने के लिए कोई दलीलें या सबूत मौजूद न हों।
कोर्ट ने टिप्पणी की कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे टेस्ट की अनुमति देना एक वैध विवाह से जन्मे बच्चे को प्राप्त कानूनी सुरक्षा को कमज़ोर करेगा और बच्चे की गरिमा और निजता में अनावश्यक दखल माना जाएगा। इसी आधार पर कोर्ट ने वैवाहिक मामलों में DNA टेस्ट का आदेश देने से इनकार करने के फैसले को चुनौती देने वाली अपील खारिज की।
जस्टिस मनोज कुमार तिवारी और जस्टिस पंकज पुरोहित की डिवीज़न बेंच पति द्वारा दायर अपील पर सुनवाई कर रही थी, जिसकी नाबालिग बच्चे के DNA टेस्ट की अर्जी को फैमिली कोर्ट ने खारिज किया था।
अपीलकर्ता-पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत वैवाहिक कार्यवाही शुरू की थी, जिसमें उसने अपनी पत्नी पर दुराचार, जिसमें व्यभिचार भी शामिल है, उसने आरोप लगाया। कार्यवाही के दौरान, उसने अपने आरोपों को साबित करने के लिए नाबालिग बच्चे के DNA टेस्ट की मांग करते हुए एक अर्जी दायर की।
फैमिली कोर्ट ने इस अर्जी को खारिज किया, यह कहते हुए कि ऐसा टेस्ट बच्चे के पितृत्व (पिता होने) का निर्धारण करने जैसा होगा और इससे बच्चे के अधिकारों और भविष्य पर बुरा असर पड़ सकता है। इससे व्यथित होकर पति ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
अपीलकर्ता ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट ने उसकी अर्जी को पितृत्व निर्धारण की अर्जी मानकर गलती की है, जबकि उसकी सीमित मांग केवल व्यभिचार के आरोपों को साबित करने के लिए वैज्ञानिक सबूत हासिल करना था।
यह तर्क दिया गया कि वैवाहिक विवादों में व्यभिचार का सीधा सबूत शायद ही कभी उपलब्ध होता है। वैज्ञानिक प्रमाण के तौर पर DNA टेस्ट ज़रूरी हो सकता है। अपीलकर्ता ने आगे कहा कि बच्चे की गरिमा और हितों की रक्षा के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए जा सकते हैं।
कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में DNA टेस्ट से जुड़े कानूनी पहलुओं की जांच की और दोहराया कि साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 एक वैध विवाह से जन्मे बच्चे की वैधता की निर्णायक धारणा स्थापित करती है, जिसे केवल पति-पत्नी के बीच शारीरिक संबंध न होने के सबूत से ही चुनौती दी जा सकती है।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि DNA टेस्ट का आदेश "आम तौर पर" नहीं दिया जा सकता और इसकी अनुमति केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जा सकती है, जब कोई मज़बूत प्रथम दृष्टया (Prima Facie) सबूत उपलब्ध हो। मौजूदा मामले में कोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता ने न तो उस प्रासंगिक अवधि के दौरान अपने और अपनी पत्नी के बीच 'संपर्क न होने' (Non-Access) का दावा किया, और न ही इसे साबित करने की कोई कोशिश की।
कोर्ट ने तर्क दिया,
“शुरुआत में यह ध्यान देना ज़रूरी है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112, 'pater est uem nuptiae demonstrant' के सिद्धांत पर आधारित है, जिसका अर्थ है कि "पिता वह है जिसे विवाह इंगित करता है"। यह सिद्धांत बच्चों को बेसहारा होने, नाजायज़ ठहराए जाने और आवारागर्दी के सामाजिक परिणामों से बचाने का प्रयास करता है। यह प्रावधान तब वैधता की एक निर्णायक उपधारणा (Conclusive Presumption) स्थापित करता है, जब किसी वैध विवाह के जारी रहने के दौरान किसी बच्चे का जन्म होता है। इस संबंध में कानून पूरी तरह से स्थापित है कि ऐसी उपधारणा को केवल तभी खारिज किया जा सकता है, जब उस प्रासंगिक समय पर पति-पत्नी के बीच 'संपर्क न होने' को साबित कर दिया जाए। 'संपर्क न होने' को साबित करने का भारी दायित्व उस व्यक्ति पर होता है, जो इस वैधानिक उपधारणा को चुनौती देना चाहता है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 की व्याख्या करने वाले और भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के साथ पढ़े जाने वाले न्यायिक निर्णयों में लगातार यह माना गया कि DNA परीक्षण का निर्देश देने से पहले, कोर्ट को पक्षों के अधिकारों के बीच सावधानीपूर्वक संतुलन बनाना चाहिए—विशेष रूप से बच्चे के कल्याण, गरिमा और निजता को ध्यान में रखते हुए।”
कोर्ट ने आगे यह भी माना कि ऐसी परिस्थितियों में DNA टेस्ट की अनुमति देना, प्रभावी रूप से वैधानिक उपधारणा को दरकिनार करना होगा। इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं—जिसमें बच्चे पर कलंक लगना भी शामिल है। कोर्ट ने आगे यह भी टिप्पणी की कि ऐसा कोई भी निर्देश, नाबालिग की निजता और गरिमा में हस्तक्षेप के समान होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित हैं।
परिणामस्वरूप, फैमिली कोर्ट के आदेश में कोई भी अवैधता न पाते हुए हाईकोर्ट ने अपील खारिज की और DNA परीक्षण की मांग करने वाले आवेदन को अस्वीकार करने के निर्णय को सही ठहराया।
कोर्ट ने यह माना कि वैधता की उपधारणा को चुनौती देने के लिए आवश्यक बुनियादी दावों (Foundational Pleadings) और सामग्री के अभाव में DNA टेस्ट के लिए कोई भी निर्देश जारी नहीं किया जा सकता।
Case Name: Sunil Singh v Anju Gupta Singh and Another