उत्तराखंड ज़मींदारी उन्मूलन अधिनियम: गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए किसी सोसाइटी को ज़मीन हस्तांतरित करने हेतु पूर्व अनुमति अनिवार्य - हाईकोर्ट

Update: 2026-05-11 15:45 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि उत्तराखंड में लागू 'उत्तर प्रदेश ज़मींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार अधिनियम, 1950' की धारा 154 के तहत, गैर-कृषि उद्देश्यों के लिए किसी सोसाइटी के पक्ष में ज़मीन का हस्तांतरण करने हेतु राज्य सरकार की पूर्व अनुमति अनिवार्य है; भले ही यह हस्तांतरण 'उपहार विलेख' (Gift Deed) के माध्यम से किया गया हो। कोर्ट ने टिप्पणी की कि धारा 154 के तहत वैधानिक प्रतिबंध केवल 'बिक्री' के माध्यम से होने वाले हस्तांतरण तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि हस्तांतरण के सभी मान्यता प्राप्त तरीकों पर लागू होते हैं, जिसमें 'उपहार' भी शामिल है।

जस्टिस पंकज पुरोहित 'शिष्य सोसाइटी' द्वारा दायर रिट याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। इस याचिका में अधिकारियों को यह निर्देश देने की मांग की गई कि वे 17 जुलाई 2018 को निष्पादित एक 'गिफ्ट डीड' को रजिस्टर्ड करें। यह डीड एक अन्य सोसाइटी द्वारा, 300 वर्ग मीटर ज़मीन के संबंध में याचिकाकर्ता सोसाइटी के पक्ष में निष्पादित किया गया था।

याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि पंजीकरण की सभी औपचारिकताएं पूरी करने और पंजीकरण शुल्क जमा करने के बावजूद, सब-रजिस्ट्रार ने न तो दस्तावेज़ को पंजीकृत किया और न ही पंजीकरण से इनकार करने का कोई औपचारिक आदेश पारित किया।

यह भी तर्क दिया गया कि अधिनियम की धारा 154 इस मामले पर लागू नहीं होगी, क्योंकि यह लेन-देन एक 'गिफ्ट' था, न कि 'बिक्री'। राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यद्यपि इस लेन-देन को 'गिफ्ट' का नाम दिया गया, फिर भी यह 'अचल संपत्ति का हस्तांतरण' ही है, जो अधिनियम की धारा 154 के दायरे में आता है।

कोर्ट ने अधिनियम की धारा 154 की रूपरेखा की जांच की। साथ ही 'संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम, 1882' की धारा 5 और 122 का भी अवलोकन किया। कोर्ट ने पाया कि धारा 122 विशेष रूप से 'उपहार' को संपत्ति के "हस्तांतरण" के रूप में परिभाषित करती है, और धारा 154(1) में स्पष्ट रूप से "सेल या गिफ्ट" शब्दों का प्रयोग किया गया; जिससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह वैधानिक प्रतिबंध हस्तांतरण के दोनों ही तरीकों पर लागू होता है।

कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि धारा 154 ज़मीन के हस्तांतरण को विनियमित करने वाला समग्र वैधानिक ढांचा है। इसकी व्याख्या इतने संकीर्ण अर्थ में नहीं की जा सकती कि केवल इसलिए 'गिफ्ट' संबंधी लेन-देन को इसके दायरे से बाहर कर दिया जाए, क्योंकि इसकी कुछ उप-धाराओं में "खरीद" (Purchase) शब्द का प्रयोग किया गया।

कोर्ट ने यह टिप्पणी की,

"...जब यह एक्ट ज़मीन के 'हस्तांतरण' को रेगुलेट करता है और उप-धारा (1) के तहत स्पष्ट रूप से 'गिफ्ट' को भी इसमें शामिल करता है तो धारा 154 के तहत रेगुलेटरी व्यवस्था को सिर्फ़ इसलिए लागू न होने वाला नहीं माना जा सकता कि किसी खास उप-खंड में 'खरीद' शब्द का इस्तेमाल किया गया।"

कोर्ट ने फ़ैसला दिया कि 250 वर्ग मीटर तक ज़मीन बिना अनुमति के हासिल करने की छूट सिर्फ़ उन व्यक्तियों पर लागू होती है, जो आवासीय उद्देश्यों के लिए ज़मीन लेते हैं, न कि सोसायटियों जैसे संस्थागत निकायों पर।

कोर्ट ने आगे कहा कि यह एक्ट सामाजिक-आर्थिक कानून है, जिसका मकसद ज़मीन की जोत को रेगुलेट करना और कानूनी पाबंदियों से बचने की कोशिशों को रोकना है। अगर याचिकाकर्ता की व्याख्या को मान लिया जाए तो कोई भी पक्ष 'गिफ्ट' का सहारा लेकर बिक्री पर लगी पाबंदियों को दरकिनार कर सकेगा, जिससे कानूनी नियंत्रण बेमानी हो जाएगा।

सब-रजिस्ट्रार के रवैये पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि संबंधित अधिकारी ने कानूनी व्यवस्था के विपरीत काम किया है; उसने न तो दस्तावेज़ का पंजीकरण किया, न ही औपचारिक रूप से पंजीकरण से इनकार किया, और न ही एक्ट की धारा 154(5)(a) और (b) के तहत मामले को सक्षम अधिकारी के पास भेजा। हालांकि, कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रक्रिया में हुई इस चूक से याचिकाकर्ता को ऐसा कोई अधिकार नहीं मिल जाता कि वह 'मैंडेमस' (आदेश) जारी करवाकर दस्तावेज़ के पंजीकरण की मांग कर सके।

तदनुसार, कोर्ट ने रिट याचिका खारिज की। साथ ही सब-रजिस्ट्रार को निर्देश दिया कि वह एक्ट की धारा 154(5)(a) और (b) के अनुसार आगे की कार्रवाई करे और उचित कार्रवाई के लिए मामले को कलेक्टर के पास भेजे।

Case Title: Shishya Society, Atak Farm v. State of Uttarakhand & Ors. [Writ Petition Misc. Single No. 1722 of 2020]

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