सरकारी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 5 साल पुराना निलंबन रद्द किया

Update: 2026-05-19 06:47 GMT

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि किसी सरकारी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता। अदालत ने करीब पांच वर्षों से निलंबित चल रहे कर्मचारी का निलंबन आदेश रद्द किया।

जस्टिस मनोज कुमार तिवारी उस याचिका पर सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उधम सिंह नगर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक द्वारा जुलाई 2021 में जारी निलंबन आदेश को चुनौती दी गई थी।

मामले में याचिकाकर्ता के खिलाफ विभागीय कार्यवाही चल रही थी। उस पर ड्यूटी से अनधिकृत अनुपस्थिति और फर्जी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप लगाए गए।

याचिकाकर्ता ने अदालत में कहा कि निलंबन आदेश में शुरुआत में केवल एक आरोप था कि वह 13 जून 2021 के बाद से बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहा।

बाद में 31 अक्टूबर 2025 को जारी आरोपपत्र में एक नया आरोप जोड़ा गया कि वह वास्तव में अन्य पिछड़ा वर्ग से संबंध रखता है लेकिन उसने फर्जी अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के आधार पर नियुक्ति प्राप्त की।

याचिकाकर्ता ने दलील दी कि निलंबन आदेश बिना उचित जांच और तथ्यों के सत्यापन के जल्दबाजी में जारी किया गया। उसने यह भी कहा कि मूल आरोप इतना गंभीर नहीं था कि उस पर बड़ी सजा दी जा सके, इसलिए बाद में फर्जी जाति प्रमाणपत्र का आरोप जोड़ा गया।

राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि उधम सिंह नगर के सीनियर पुलिस अधीक्षक ने गोरखपुर के जिलाधिकारी को पत्र लिखकर याचिकाकर्ता के अनुसूचित जनजाति प्रमाणपत्र के संबंध में जाति जांच समिति की रिपोर्ट मांगी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता की यह दलील सही प्रतीत होती है कि किसी सरकारी कर्मचारी को अनिश्चितकाल तक निलंबित नहीं रखा जा सकता।

अदालत ने कहा,

“याचिकाकर्ता को 17 जुलाई 2021 को निलंबित किया गया और तब से लगभग पांच वर्ष बीत चुके हैं। विभागीय जांच निकट भविष्य में पूरी होती नहीं दिख रही, क्योंकि जाति जांच समिति की रिपोर्ट अभी भी प्रतीक्षित है।”

अदालत ने मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए 17 जुलाई 2021 का निलंबन आदेश रद्द किया।

साथ ही हाईकोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता की राज्य के 13 जिलों में से किसी भी जिले में नई तैनाती संबंधी आदेश जारी किया जाए।

हालांकि, अदालत ने विभागीय प्राधिकारी को यह स्वतंत्रता भी दी कि वह विभागीय जांच को कानून के अनुसार जारी रखे और उसे जल्द से जल्द पूरा करे।

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